पत्थर से दीजिये, इनकी हर ईंट का जवाब

नव वर्ष पर खुशियाँ मनाइये कि हर बदलते वर्ष के साथ दुनिया और बेहतर होती चली गयी।

वामपंथियों के ‘नैरेटिव’ पर मत जाइए। सच तो ये है कि सौ साल पहले दुनिया के चौवालिस प्रतिशत बच्चे पांच-वर्ष की आयु तक पहुंचते पहुंचते मौत की गोद में समा जाते थे, क्या यह प्रगति नहीं है कि यह संख्या आज केवल चार प्रतिशत रह गयी है?

तब प्रति एक लाख आबादी में दो सौ लोगों की जानें युद्ध में चली जाती थीं, आज प्रति एक लाख आबादी में केवल एक व्यक्ति युद्ध में अपनी जान गंवाता है। तब दुनिया के लगभग एक-सौ-सत्तर देशों में गुलामी वैध थी, आज केवल तीन देशों में। बाल-श्रम अट्ठाईस प्रतिशत से घट कर दस प्रतिशत पर आ गया।

तब अट्ठाईस प्रतिशत आबादी भुखमरी का शिकार थी, आज मात्र ग्यारह प्रतिशत। स्माल पॉक्स से जूझते देशों की संख्या एक-सौ-अडतालीस से घट कर शून्य हो गयी। दुनिया में चौंसठ हज़ार ‘न्युक्लीअर वॉर-हेड’ थे, अब केवल पंद्रह हज़ार रह गए। प्रति एक हज़ार मौतों में प्राकृतिक आपदाओं से मरने वालों की संख्या तब नौ-सौ-इकहत्तर हुआ करती थी, आज यह बहत्तर रह गयी।

साक्षरता पंद्रह प्रतिशत से बढ़ कर आज छियासी प्रतिशत, स्कूल में पढने वाली बच्चियों की संख्या पैंसठ प्रतिशत से बढ़ कर नब्बे प्रतिशत, टीका लगवा पाने वाले नवजात बच्चों का प्रतिशत बाईस से बढ़ कर अट्ठासी प्रतिशत, और सुरक्षित पानी पीने वाले लोग अट्ठावन प्रतिशत से बढ़ कर आज अट्ठासी प्रतिशत हो गए।

सौ साल पहले केवल एक देश में महिलाओं और पुरुषों को मत देने का समान अधिकार था, आज लगभग सभी सभी देशों में। प्रति हेक्टेयर उपज, लोकतांत्रिक देशों की संख्या, संरक्षित प्रकृति का प्रतिशत – लगभग सभी मानकों पर विश्व और मानव सभ्यता साल-दर-साल प्रगति करती चली गयी। भारत में भी कमोबेश यही प्रगति जारी रही है।

इस प्रगति को गौर से देखिये और सकारात्मक महसूस कीजिये। बचा हुआ सफ़र इस सकारात्मकता से और भी दक्षतापूर्वक सफलता से तय होगा। वामपंथियों के नैरेटिव पर मत जाईये – अफवाहगर्दी से निराशा का नैरेटिव खडा करना उस गिरोह का ‘धंधा’ है; मार्क्स भी अपने विफल सिद्धांतों को रचने के पहले अपने युवा-काल में ‘निराशा’ और ‘मौत’ की कविताएं ही लिखा करता था जिसकी छाप उसके विफल सिद्धांतों में झलकती रही।

हिन्दुस्तान की लुटियन मीडिया के भंवर में भी मत फंसिए – उसे अपने अखबार और टी-वी प्रोग्राम बेचने हैं; वो जानते हैं कि सनसनी बिकती है, अच्छी खबरें नहीं। मिथ्या नैरेटिव खड़े करने वाले और अफवाहगर्दी से लोगों को दिग्भ्रमित करने वाले इन वामपंथियों और लुटियन-मीडिया को सबक सिखाइए, इनकी हर ईंट का जवाब पत्थर से दीजिये।

ये गिरोह देश, विश्व, और समाज के लिए खतरनाक हैं। इनके साथ सख्ती से पेश आइये, बेहद सख्ती से। यह सब लेकिन खुश हो कर कीजिये। ये दुनिया खूबसूरत है। आनंद में रहिये। नव वर्ष सर्वदा मंगलमय ही होता है, इस बार पहले से अधिक मंगलमय हो।

[प्रयुक्त आंकड़े यूएनओ, यूनेस्को, विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व कृषि संगठन, यूसीडीपी, फ़ूड एंड एग्रीकल्चर आर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ यूएनओ, आदि से]

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यवहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति मेकिंग इंडिया (makingindiaonline.in) उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार मेकिंग इंडिया के नहीं हैं, तथा मेकिंग इंडिया उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY