महज़ आना जाना भी जहां खतरे से खाली नहीं, ऐसी जगह है ही क्यों आपके शहर में

डॉ प्रियंका की हत्या के पश्चात कई सुझाव सामने लाये हैं। उसमें एक rhetoric किस्म का सुझाव मैंने भी दिया था। कहना चाहूँगा कि इनमें एक भी सुझाव व्यावहारिक नहीं है क्योंकि सभी सुझाव मूल समस्या को टालकर बात कर रहे हैं।

दुर्घटना के समय दिमाग शांत रखना, मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग, दौड़ने का अभ्यास, साथ में कोई शस्त्र रखना, सभी बेमतलब की बातें हैं क्योंकि ये कोई बचाव हैं ही नहीं।

दिमाग शांत रखकर पुलिस को फोन किया – क्या पुलिस वाकई सहायता कर सकती है? समय रहते पहुँच सकती है?

मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग – चारों तरफ से घिरे हो तब बहुत काम नहीं आती।

भागने का अभ्यास – कितनी दूरी तक भागना होगा सुरक्षा के लिए? सौ यार्ड (300 फीट) से अधिक व्यवहारिक नहीं होता और ऐसे डेंजर ज़ोन की व्यापकता सौ यार्ड से काफी अधिक होती है। सौ यार्ड कुछ मायने नहीं रखता।

शस्त्र – जहां पीछे से वार हो सकता है, और जिन लोगों में दगाबाज़ी से वार करना धर्मसम्मत है वहाँ शस्त्र बहुत काम नहीं आयेगा।

मसलन, कुछ भी काम नहीं आयेगा अगर आप वहाँ फँसते हैं।

यही समस्या है, कि आप के शहर में ऐसी जगह है ही क्यों जहां से महज आना जाना भी खतरे से खाली नहीं?

कोई भी क्षेत्र ऐसी जगह में तब्दील न हो यह देखना प्रशासन और सरकार की ज़िम्मेदारी है लेकिन कुछ ज़िम्मेदारी हमारी भी है। सरकार को कोसकर हम हमारी ज़िम्मेदारी को झटक नहीं सकते।

प्रशासन पैसों से खरीदा जाता है और सरकार वोटों से। लेकिन प्रशासन के लोग भी तो सामाजिक ही हैं। हम अपनी भावनाएँ उन तक पहुंचाते नहीं, बल्कि उनसे जुडने की हर कीमत पर कोशिश करते रहते हैं व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए।

घूस दे कर भी काम तो हो जाएगा ही, वह आदमी तो केवल घूस देखता है, नौकरी भी उसी के लिए करता है, देश सेवा के लिए प्रशासन वाली सरकारी नौकरी करने की बात मज़ाक भी नहीं लगती। लेकिन इज्जत देने से बचें, सामाजिक व्यवहार न रखें तो फर्क पड़ेगा। लेकिन कोई करना नहीं चाहता, बल्कि हर कोई चाहता है कि दूसरे किसी का पत्ता काटकर अफसर की मर्ज़ी सम्पादन करें।

नोटा (NOTA) दबाकर कुछ नहीं होना, उससे बड़ी मूर्खता नहीं है। नोटा जिस स्वरूप में है, काँग्रेस का रचाया हुआ ‘booby trap’ है और काँग्रेस अगर दुर्भाग्य से दुबारा केंद्र में आई तो तुरंत इसे हटा देगी।

प्रशासन के लोगों पर सामाजिक दबाव के कई आसान तरीके हैं लेकिन अब लिखने का समय नहीं, अलग से बात करेंगे।

सरकार याने नेता, पक्ष।

मतदाता, विशेषकर हिन्दू मतदाता जब सामाजिक हित को व्यक्तिगत हित या जातिगत हित के ऊपर रखने लगेगा तब क्या करना है यह समझ जाएगा।

यह बस इंडिकेटर्स हैं, समस्या को याद रखिए – आप के शहर में ऐसी जगह है ही क्यों जहां से आना जाना खतरे से खाली नहीं? जब तक आप समस्या को इतनी स्पष्टता से रखेंगे नहीं, आप हाथी को परिभाषित करनेवाले अंधे ही बने रहेंगे।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यवहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति मेकिंग इंडिया (makingindiaonline.in) उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार मेकिंग इंडिया के नहीं हैं, तथा मेकिंग इंडिया उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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