तब मानवाधिकारों के वकील कहां थे, जब घाटी से खदेड़ दिये गए 4 लाख कश्मीरी हिन्दू

सुनंदा वशिष्ठ ने अमेरिकी काँग्रेस में मानवाधिकार को लेकर हुई सुनवाई के दौरान कहा कि जब ’90 के दशक में पाकिस्तान-समर्थक आतंकवादियों ने कश्मीरी हिन्दुओं को निशाना बनाना शुरू किया था, और लगभग 4,00,000 कश्मीरी हिन्दुओं को घाटी से खदेड़ दिया गया था, तब “मानवाधिकारों के वकील उस वक्त कहां थे, जब मेरे अधिकार छीन लिए गए थे…? मानवता के रक्षक उस वक्त कहां थे, जब मेरी बेहद कमज़ोर दादी अपने हाथ में रसोई में इस्तेमाल होने वाले चाकू और एक पुरानी ज़ंग लगी कुल्हाड़ी लिए मुझे और मेरी मां को मार डालने के लिए तत्पर खड़ी थी, ताकि हमें उससे भी कहीं ज़्यादा बुरे अंजाम से बचाया जा सके…?”

जगमोहन अपनी पुस्तक ‘कश्मीर में मेरी बर्फीली अशांति’ (My Frozen Turbulence in Kashmir) में लिखते है कि 17-18 जनवरी 1990 की मध्य रात्रि में वी पी सिंह सरकार में विदेश मंत्री आई के गुजराल ने फोन करके उन्हें जगाया और गृह मंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद के घर एक इमरजेंसी मीटिंग अटेंड करने को कहा।

मुफ़्ती के घर में जगमोहन को कश्मीर घाटी में व्याप्त गंभीर स्थिति से अवगत कराया गया और उन्हें तुरंत BSF के प्लेन से कश्मीर में जाने और गवर्नर का पद संभालने को कहा गया।

क्या थी वह गंभीर स्थिति?

जगमोहन लिखते है कि समाचार पत्रों के अनुसार 15 अगस्त 1989 को कश्मीर में राष्ट्रीय ध्वज जलाया गया; प्रतिदिन बम धमाकों से सहमा हुआ कश्मीर; भाजपा के उपाध्यक्ष टीकालाल टपलू की श्रीनगर में हत्या; न्यायाधीश गंजू की नृशंस हत्या; पत्रकार पी एन भट की हत्या; केंद्रीय गृह मंत्री की पुत्री का अपहरण; पुलिस अफसर की हत्या; कश्मीर में आतंवादियों का शासन… इत्यादि।

20 जनवरी की रात्रि को जब वे राजभवन में सो रहे थे, तब उनके बिस्तर के सिरहाने रखे दो टेलीफोन के रिंग एक साथ बजने लगे। दोनों टेलीफोन से डरी हुई, सहमी सी आवाज आ रही थी। दो पुरुष इतने डरे हुए थे कि वह बोल नहीं पा रहे थे।

“आज की रात हमारी आखिरी रात होगी”, उनमें से एक आवाज़ ने कहा। “अगली सुबह तक हम सभी कश्मीरी पंडितों की हत्या कर दी जाएगी। कृपया हमें घाटी से बाहर ले जाएं। आज ही रात हमें सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दें, नहीं तो सुबह हमारी लाशें देखने को मिलेंगी। हमारी महिलाएं, बहनें, माताएं, उन सब का अपहरण हो जाएगा तथा सभी पुरुषों को काट दिया जाएगा।”

उन व्यक्तियों ने टेलीफोन का रिसीवर बाहर की तरफ कर दिया जिससे कि जगमोहन सैकड़ों मस्जिदों के लाउडस्पीकर से आ रही आवाजों को सुन सकें।

जगमोहन आगे लिखते हैं कि आतंकवादियों का प्लान था कि 26 जनवरी, जो शुक्रवार था, को लगभग 10 लाख व्यक्ति ईदगाह पर इकट्ठा होंगे और नमाज के बाद वह स्वतंत्रता की घोषणा कर देंगे। राष्ट्रीय ध्वज को जला दिया जाएगा तथा इस्लामिक रिपब्लिक का झंडा फहरा दिया जाएगा। विदेशी पत्रकारों और फोटोग्राफरों के सामने इस करतूत को अंजाम दिया जाना था।

षड्यंत्रकारियों का यह मानना था कि गणतंत्र दिवस के कारण सरकार लोगों के आने जाने में कोई बाधा नहीं लगाएगी। इसके अलावा सभी नेता तथा ब्यूरोक्रेट्स जम्मू में सेल्यूट लेने में व्यस्त होंगे, जिस कारण वह कोई कार्रवाई नहीं कर पाएंगे।

जगमोहन मन ही मन कुछ निर्णय ले चुके थे लेकिन इसकी जानकारी उन्होंने अपने सलाहकारों को भी नहीं दी। एकाएक 25 जनवरी की शाम को उन्होंने अपने ब्यूरोक्रेट्स को बताया कि वह जम्मू में होने वाले 26 जनवरी के उत्सव में सम्मिलित नहीं होंगे और एकदम से उन्होंने पूरी घाटी में कठोर कर्फ्यू की घोषणा कर दी।

हर सड़क और गली में कर्फ्यू को कठोरता से लागू करना था। उनका उद्देश्य था कि किसी भी तरीके से भीड़ इकट्ठा ना होने पाए। क्योंकि अगर भीड़ इकट्ठा हो जाती तो वे इस्लाम के नाम पर स्वतंत्रता की घोषणा कर देते; हथियारों से लैस आतंकवादी इस बात को सुनिश्चित करते कि सुरक्षा बल इस भीड़ के खिलाफ कोई कार्रवाई ना कर सके।

आतंकवादियों ने कभी सपने में नहीं सोचा था कि जगमोहन गणतंत्र दिवस के अवसर पर कर्फ्यू की घोषणा कर देंगे तथा हर सड़क और गली के मुहाने पर सुरक्षाबलों की तैनाती कर देंगे जिससे कोई भी व्यक्ति घर के बाहर ना निकल सके। उनकी इस कार्रवाई ने आतंकवादियों तथा उनके समर्थकों के प्लान को विफल कर दिया।

जम्मू कश्मीर का गवर्नर बनने के बाद 26 जनवरी की रात्रि को जगमोहन को पहली बार गहरी नींद आयी।

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