तब आएगा इस खेल का असली मज़ा

चुनाव के बाद यह बताने वाले बहुत मिल जाते हैं कि उन्होंने यह पहले ही बता दिया था कि कौन क्या गलती कर रहा है और किसकी जीत-हार होगी। महाराष्ट्र चुनाव के बाद भी यह बताने वाले बहुत लोग प्रकट हो गए हैं कि भाजपा को अकेले लड़ना चाहिए था।

महाराष्ट्र विधानसभा में कुल 288 सीटें हैं और बहुमत के लिए 145 सीटों की आवश्यकता पड़ती है। 2014 के चुनाव में भाजपा ने शिवसेना से कहा था कि दोनों पार्टियाँ 144-144 सीटों का बंटवारा कर लें और अपनी-अपनी सीटों में से कुछ गठबंधन की अन्य पार्टियों को दे दें।

शिवसेना ने बात नहीं मानी। तब भाजपा 130 सीटों पर लड़ने के लिए सहमत हुई। लेकिन शिवसेना चाहती थी कि वह स्वयं 151 सीटों पर लड़े और भाजपा केवल 119 पर तथा 18 सीटें गठबंधन के अन्य 4 दलों को दे दी जाएँ।

स्वाभाविक है कि भाजपा को यह असन्तुलित गठबंधन मान्य नहीं था। परिणाम यह हुआ कि गठबंधन टूट गया और दोनों पार्टियां अलग-अलग लड़ीं।

2014 का वह चुनाव लोकसभा में मोदी सरकार की पहली जीत के कुछ ही महीनों बाद हुआ था और देश में मोदी लहर तब भी कायम थी। महाराष्ट्र में तब की काँग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के गठबंधन वाली सरकार के कुशासन से जनता बहुत नाराज़ भी थी।

इन दोनों बातों का फायदा भाजपा और शिवसेना दोनों को ही मिला। भाजपा की सीटें 46 से बढ़कर 122 हो गईं और शिवसेना की 45 से बढ़कर 63 हो गईं। लेकिन बहुमत किसी को भी नहीं मिला।

उस समय भी शिवसेना ने खूब शोर मचाया था, धमकियां दी थीं, शरद पवार के साथ मिलकर सरकार बनाने के दावे किए थे, खूब सौदेबाज़ी की थी और अंततः सत्ता में हिस्सा पाने के लिए भाजपा से ही हाथ मिला लिया था। इसके बाद इन दोनों पार्टियों ने एक-दूसरे की आलोचना करते हुए पाँच साल सरकार चलाई।

पिछली बार काँग्रेस और राष्ट्रवादी काँग्रेस पार्टी के खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर थी, और नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के कारण भाजपा के पक्ष में भी लहर थी, लेकिन इसके बावजूद भी भाजपा तब बहुमत से बहुत दूर रह गई थी।

इस बार के चुनाव में तो भाजपा स्वयं ही सत्ताधारी पार्टी थी, इसलिए इस बात की संभावना भी थी कि पिछली बार की तुलना में लोगों का समर्थन शायद कम मिलेगा क्योंकि सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ लोगों में थोड़ी-बहुत नाराज़गी रहती ही है।

शायद इसलिए भाजपा नेतृत्व ने सोचा हो कि इस बार अकेले लड़ने पर शायद नुकसान होगा और संभवतः पिछली बार से भी कम सीटें मिलेंगी। यह सोचकर अगर उन्होंने शिवसेना से गठबंधन करके चुनाव लड़ने की बात तय की थी, तो मैं इसे गलती नहीं, बल्कि समझदारी मानता हूँ। भाजपा और शिवसेना अगर साथ मिलकर लड़ने के बजाय आपस में ही लड़ते, तो दोनों के ही वोट कटते और इसका सीधा फायदा काँग्रेस और शरद पवार के गठबंधन को मिलता और उनकी सीटें बढ़ जातीं।

इस चुनाव में भाजपा 152 सीटों पर लड़ी और 105 पर जीती, जबकि शिवसेना 124 में से केवल 56 सीटें ही जीत पाई है। इसलिए यह कहना गलत है कि भाजपा को इस बार भारी नुकसान हुआ है या शिवसेना ने कोई ज़बरदस्त जीत हासिल की है।

पिछली बार की ही तरह इस बार भी शिवसेना सौदेबाज़ी में लगी हुई है और मैं इसे भी गलत नहीं मानता। राजनीति का भी यह स्वाभाविक नियम है कि आप अपने विरोधियों को निपटाएं, अन्यथा विरोधी आपको निपटाएंगे।

इसलिए यदि शिवसेना या कोई भी पार्टी स्वयं को सबसे महत्वपूर्ण और शक्तिशाली बताना चाहती है, तो यह उसकी इच्छा है। ये बात अलग है कि गलत समय पर गलत चाल चलने से आपकी राजनीति तबाह भी हो सकती है, जैसे राज ठाकरे की पार्टी की हुई है। शिवसेना की भी हो जाए, तो मुझे न कोई अचरज होगा और न अफसोस।

मैं चाहता हूँ कि इस बार महाराष्ट्र में काँग्रेस, शिवसेना और राष्ट्रवादी काँग्रेस के गठबंधन वाली सरकार बने। भाजपा को बेझिझक कुछ समय के लिए विपक्ष में बैठना चाहिए क्योंकि वैसे भी गठबंधन पाँच साल चलने वाला नहीं है। अगर भाजपा विपक्ष में रही, तो शायद साल भर में ही फिर चुनाव की नौबत आ जाएगी।

हालांकि लगता नहीं है कि ऐसा होगा। मेरा अनुमान है कि खूब हल्ला मचाने और सौदेबाज़ी करने के बाद शिवसेना फिर एक बार हिंदुत्व के नाम पर भाजपा का समर्थन करेगी और कुछ ‘कमाऊ’ मंत्रालय व कुछ अन्य मामलों में अधिकार अपने लिए रखकर फडणवीस के नेतृत्व वाली सरकार में शपथ ग्रहण कर लेगी।

लेकिन मैं वाकई चाहता हूँ कि इस बार मेरा अनुमान गलत हो और काँग्रेस व राष्ट्रवादी काँग्रेस के साथ गठबंधन करके शिवसेना सरकार में जाए। इस खेल का असली मज़ा तभी आएगा!

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