अयोध्या दीपोत्सव विवाद : जब पोल खुली तो नहीं मिली मुंह छुपाने की जगह

वर्तमान उदाहरण से सिद्ध होता है कि श्री राम नाम से एलर्जी बढ़ने पर आदमी इतना पगला जाता है कि खुले आम अंट शंट बकने लगता है, बिना हया बिना शर्म, बिना अपनी विश्वसनीयता की चिंता किए। ये एक प्रकार का दौरा होता है जो श्री राम नाम आने पर बहुतों को आता रहता है।

ऐसा ही दौरा कुछ चैनल और मीडिया वालों को भी आया, लिहाज़ा इन्होंने अयोध्या में मनाए गए दीपोत्सव का खर्च 1.33 करोड़ की जगह 133 करोड़ पब्लिश कर दिया… माने सौ गुना बढ़ा के और डंका पीट पीट के चिल्ला रहे थे।

जब पोल खुली तो मुंह छुपाने की जगह नहीं मिल रही इन्हें। कुछ ने माफी मांगी, कुछ वैसे ही निर्लज्ज झूठ पे झूठ बोले पड़े हैं। नरेटिव गढ़ने का सिलसिला जारी है कि इतना पैसा गरीबों को दे दिया जाता तो उनका भला होता।

कोई बताए कि 1.33 करोड़ (एक करोड़ 33 लाख रूपए) के व्यय धन से किसका भला हुआ…? लाखों के संख्या में दीए, बाती और उसके लिए कई लीटर तेल खरीदा गया… अर्थात कुंभकारों, मध्यम-मझोले उद्यमियों को सीधा लाभ हुआ, उनकी दीवाली मन गई।

दूसरे आयोजन में जो दर्शनार्थी पधारे, उन्होंने होटल, ढाबे, ऑटो रिक्शा आदि को व्यापार दिया, उनकी भी दीवाली मन गई।

इवेंट मैनेजमेंट कंपनी ने भी कईयों को काम दिया होगा, उनकी भी दीवाली मन गई।

रही बात रास्ते पर भटकने वाले अत्यंत गरीब की, जिसके नाम की दुहाई दी जा रही है, तो वो भी मंदिर के पास ही बैठता है क्योंकि उसे भी पता है कि कोई श्रद्धालु ही उनकी झोली भरेगा। अयोध्या में इतने बड़े आयोजन से उनकी भी झोली भरपूर भरी। उनकी भी दीवाली मनी, इसमें भी शंका नहीं।

इसलिए आधी अधूरी फोटो लेने के बजाय, उस क्षेत्र के किसी गरीब का वीडियो दिखाओ जो इस आयोजन से खुश नहीं हैं। वो भी जय श्री राम जपते मिलेगा।

माने प्रभु श्री राम के अयोध्या वापसी के उपलक्ष्य में जो उत्सव मनाया गया उससे वैसे ही हर वर्ग के लोगों का आर्थिक कल्याण हुआ है, इसमें कोई दो राय नहीं है। ये रहा आर्थिक बिंदु। आध्यात्मिक बिंदु में मुझे जाना नहीं, वो दूसरा विषय है।

लेकिन गरीब के लिए चिंतित लोग कभी ये बहस क्यों नहीं करते कि जितने की शराब पीते हो, उतना धन शराब न पीकर गरीबों को दान कर दो, उनका भला होगा? कभी सुना है किसी बुद्धिजीवी को ऐसा बोलते हुए? माने जहां से वास्तव में गरीबों का भला हो सकता है वहां बुद्धिजीवी की बुद्धि को लकवा मार जाता है।

मालूम हो भारत में वर्तमान में 600 करोड़ लीटर शराब की खपत होती है जो 2022 तक 1700 करोड़ लीटर हो जाएगी, ऐसा आधिकारिक रिपोर्ट कहती है। एक लीटर शराब की कीमत औसतन 500 रुपया प्रति लीटर भी लगा दें तो वर्तमान में पूरे देश में तीन लाख करोड़ की शराब खरीदी की जाती है जो वर्ष 2022 में दस लाख करोड़ के आसपास पहुंच जाएगी। और ये धन गरीबों के पास नहीं, बल्कि बड़ी-बड़ी कंपनियों के पास जाता है। शराब इंपोर्टेड हो तो विदेशों में जाता है।

शराब क्यों पीना, लगा दो इतना धन गरीबों पर। है कोई गरीबों का पत्रकार जो इसपर बात करे, इसे प्राइम टाइम में दिखाए? क्यों नहीं दिखाते? ये ढोंग क्यों?

अतः दीपोत्सव पर ज्ञान देने के बजाए अपनी एलर्जी और पागलपन का इलाज करो, श्री राम भला करें।

।।जय श्री राम।।

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