ग़लत बात पर ग़लत प्रतिक्रिया… कब तक?

कमलेश तिवारी की हत्या (क्योंकि, यूपी और गुजरात की पुलिस ने यह मान लिया है और त्वरित कार्रवाई कर मामले को सुलझाने का भी दावा किया है) के बाद मैं बस प्रतिक्रियाएं देख रहा था।

दरअसल, हरेक भोले सनातनी की तरह मुझे इस बार भी यह गलतफहमी थी कि शायद इस देश के सनातनी सही सवाल उठाएंगे, सही प्रतिक्रिया देंगे, लेकिन अफसोस… सब कुछ जस का तस है।

…कमलेश तिवारी को मरना ही था। आज नहीं तो कल। यह तयशुदा है। आप आज ज़रा तसलीमा नसरीन और सलमान रश्दी से सुरक्षा हटाकर देख लीजिए। या फिर, ज़रा याद कीजिए जब तसलीमा हैदराबाद में एक सेमिनार अटेंड कर रही थीं और जिहादी आतंकियों ने उन पर हमला किया था, या फिर याद कीजिए कि राजस्थान में एक तथाकथित बुक-फेयर में किस तरह अंतिम वक्त पर सलमान रश्दी को आने से मान कर दिया गया।

आपको याद नहीं है, क्योंकि आप भुलक्कड़ हैं। कमलेश तिवारी को जिन लोगों ने मारा है, उन्होंने अपना काम किया है, आप अपना काम नहीं कर पा रहे हैं।

आइए, एक बार फिर से आपको सबक याद करवाता हूं –

नीचे दिए गए पहले चित्र को देखिए। ये उन हिंदुओं की तस्वीरें हैं, जिनको मुसलमान भीड़ ने हलाक किया। फिर भी, मॉब-लिंचिंग की जवाबदेही किस पर…?
हिंदुओं पर ही न…।

आप गंगा-जमनी तहज़ीब का मनका फेरते रहिए, पर वे बस इंतज़ार करते हैं, कर रहे हैं। जैसे ही उनकी संख्या बढ़ी, वे दारुल-हर्ब को दारुल-इस्लाम बनाने पर आमादा हो जाते हैं। इसमें उनकी गलती भी नहीं है। जैसा कि मैं हमेशा कहता आया हूं, ग़लती मुसलमानों की है ही नहीं। यदि आपको ऊंगली उठानी है, सुधार करना है, तो इस्लाम में कीजिए। मुसलमान तो केवल वही कर रहे हैं, जो उनको इस्लाम सिखाता है। यदि मेरी बात का यकीन नहीं तो किसी भी मदरसे में (चाहे वह किसी भी फिरके का हो) जाकर उनका सिलेबस देख लीजिए। उनकी चार जो मुख्य सीख हैं, उनको देखकर या तो आपकी आंखें खुल जाएंगी या गलतफहमी दूर हो जाएगी।

जिहाद, वाजिबुल-क़त्ल काफिर और इस्लाम की हुकूमत – ये सारी बातें बिल्कुल सच हैं और आप इसे कितना भी नकारें, यह उससे खत्म नहीं हो जाएगा। अभी आप तुर्की को देख लीजिए। कमाल-अतातुर्क ने जिसे बड़ी मुश्किल से इस्लाम के (कु)प्रभाव से मुक्त किया था, वह एर्दोगन के नेतृत्व में फिर से खिलाफत और आक्रमण के रास्ते पर है।

पूरे विश्व में 50 के करीब इस्लामिक देश हैं। आप यह बता दीजिए कि शांति कहां है? यह बात स्वतःसिद्ध है कि इस्लाम और शांति विपरीतार्थक हैं। यदि इन्हें काफिर नहीं मिलेंगे, तो खुद के फिरकों में ही मार कर लेंगे।

  • आप पूछेंगे, उपाय क्या है…। उपाय एक ही है। आप इस्लाम पर बात कीजिए, जैसे आज ट्विटर पर लोगों का डर ही ख़त्म हो गया है। कहावत है न, इतना न डराओ किसी को कि उसका डर ही खत्म हो जाए। ट्विटर पर जो कुछ भी ट्रेंड कराया जा रहा है, वह कहीं से ठीक नहीं है, स्वागत योग्य नहीं है, पर वह क्रिया की प्रतिक्रिया है।

आज मुसलमानों ने हज़ारों कमलेश तिवारी पैदा कर दिए हैं। कहने का मतलब यह है कि इस्लाम खुद से अपनी समीक्षा तो करेगा नहीं। उसे अगर बारहां घेरा जाए, तो शायद उसके अंदर से एक-दो साहसी हों, जो मूल मुद्दे पर बहस करें, उसपर बात करें। अभी तो हम लोग, अच्छा इस्लाम, बुरा इस्लाम, ये सच्चा इस्लाम नहीं है, भटके हुए लोग, आतंक का मज़हब नहीं होता, हमारा इस्लाम तो ये है… आदि-अनादि के भूलभुलैया में ही घूम रहे हैं।

  • अंततः जान लीजिए कि सेकुलर और मुसलमान होना विपरीतार्थक हैं। आप जिन गिने-चुने मुसलमानों, यथा अबुल कलाम या आरिफ मुहम्मद खान आदि का उदाहरण देते हैं, ज़रा खुद उनके हम-बिरादर मुसलमानों से उनके बारे में राय पूछ लीजिएगा। वैसे, यदि वे इस्लाम को ‘एज़ इट इज़’ स्वीकार कर लेते, तो शायद वे वही नहीं रहते, और हां, अपवाद नियम को सिद्ध मात्र करते हैं, नियम नहीं होते।

यहां आप दूसरे चित्र को देखिए, जो आपके कोलकाता का है। इसमें शामिल बच्चों को देखिए। क्या पाकिस्तानी जिहादी किशोरों का जो वीडियो अभी हाल में वायरल हुआ है, उससे यह किसी कदर अलग है…

सोचिएगा और अगर बत्ती जले तो कुछ कीजिएगा…

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