मोदी, ट्रम्प और ह्यूस्टन : वैश्विक संदेश

कहा नहीं जा सकता कि हमारी पीढ़ी को इस बात का पता है या नहीं कि वे संधिकाल यात्री है। वे उस काल से गुजर रहे हैं जो विश्व के इतिहास को उलटने वाली घटनाओं को, या तो जन्म दे रहा है या फिर वह परिणामों की तरफ बढ रहा है।

इतिहास में जाएं तो समझ में आता है कि हमारी पीढ़ी उसी अनुभूति से गुज़र रही है, जिससे पहले 1910 और 1930 के दशक की पीढ़ी गुज़री थी।

वैसे तो किसी भी वैश्विक प्रभाव वाली घटना को लेकर अमेरिका का राष्ट्रपति हमेशा से ही महत्वपूर्ण होता है, भले ही उसकी उपस्थिति ज्यादातर सांकेतिक या प्रतीकात्मक हो, लेकिन जब विश्व के एक क्षेत्र में उथल पथल हो रही हो और उससे उठे धुंए के भीतर घटनाक्रम नाटकीय रूप से बदल रहे हों, तब अमेरिकी राष्ट्रपति का उस क्षेत्र में हो रही उथल पथल के एक महत्वपूर्ण पात्र के साथ, बार बार विश्व को अपनी उपस्थिति दिखाना, बहुत ही गुणागुणज्ञ व संवेदनशील रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है।

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसी माह संयुक्त राष्ट्रसंघ के संयुक्त अधिवेशन में भाग लेने, न्यूयॉर्क अमेरिका जाना था और फिर उन्हें 22 सितंबर को तेल व ऊर्जा कम्पनियों के शीर्ष अधिकारियों से मिलने ह्यूस्टन, टेक्सास जाना है। इसी दिन वहां रह रहे भारतीय प्रवासियों से उनका सम्बोधन भी है।

मोदी की इस यात्रा को एक व्यवसायिक यात्रा कहा जा सकता है क्योंकि उनकी यह यात्रा, अमेरिका की कोई आधिकारिक यात्रा नहीं है। वैसे, जी-7 समिट में जब मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प के बीच 26 अगस्त को बैठक हुई थी, तब ट्रम्प ने अमेरिकी ऊर्जा विभाग के अधिकारियों को निर्देश दे दिया था कि वे भी मोदी और अमेरिकी तेल व ऊर्जा कम्पनियों के बीच होने वाली वार्ता का हिस्सा होंगे ताकि जो व्यवसायिक सौदे होने हैं, उनमें कोई अवरोध नहीं हो।

अब आज अमेरिकी राष्ट्रपति के आधिकारिक निवास स्थान व्हाइट हाउस से प्रेस सेक्रेटरी ने एक विज्ञप्ति जारी कर सूचना दी है कि राष्ट्रपति ट्रम्प 22 सितंबर 2019 को ह्यूस्टन जाएंगे और वे भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रवासी भारतीयों के सम्बोधन वाले कार्यक्रम में उपस्थित होंगे।

इस समाचार के आते ही वैश्विक जगत में लोगों के कान खड़े हो गए और विदेश मामलों के विशेषज्ञ, इस उपस्थिति के निहितार्थ खोजने में लग गए हैं। 20 जून 2019 को ओसाका, जापान में जी-20 समिट से अलग एकाकी वार्ता, फिर दो महीने बाद 26 अगस्त 2019 को बिररिट्ज़, फ्रांस में जी-7 समिट में एकाकी वार्ता और अब 20 दिन बाद में ही 17 सितंबर 2019 को ह्यूस्टन, अमेरिका में मिलना बहुत कुछ संकेत दे जाता है।

प्रत्यक्ष रूप से यह मुलाकातें निश्चित रूप से व्यवसायिक हितों के लिए है, जिसकी परिणति भारत व अमेरिका के बीच होने वाली व्यापारिक समझौते के रुप में अगले कुछ महीनों में सामने आ जायेगा। लेकिन, जो कुछ भारतीय उपमहाद्वीप में पिछले डेढ़ महीने से घट रहा है, उस परिदृश्य में इन दोनों की यह एकाकी वार्ताएं शेष विश्व के साथ, पाकिस्तान व चीन के लिए बिल्कुल अलग मायने रख रही है।

यह दोनों ही राष्ट्र मानते है कि इन वार्ताओं का विषय सिर्फ व्यावसायिक नहीं है बल्कि उसका परिणाम जम्मू कश्मीर का भारत में एकीकृत होना व अफगानिस्तान शांति वार्ता का रुकना है।

इन निर्णयों से पाकिस्तान में जो कश्मीर को लेकर कोहराम मचा है और अफगानिस्तान को लेकर तालिबान से होने वाली अमेरिकी वार्ता में जो विराम लगा है, उससे पाकिस्तान के अपने कथानक ध्वस्त होते जा रहे हैं और वह पिसता जा रहा है।

चीन भी इन घटनाओं से प्रभावित हो रहा है। अफगानिस्तान से अभी अमेरिका की वापसी टलने से, उसकी तालिबान के सहारे अफगानिस्तान को सिपेक (CPEC) से जोड़ने की योजना को धक्का लगा है।

इसके अलावा, स्वयं अमेरिका भी प्रभावित है। 2020 में वहां राष्ट्रपति का चुनाव है और भारतीय मूल के अमेरिकी लोगों की कम संख्या होने के बाद भी वे धन व प्रत्यक्ष समर्थन देने में महत्वपूर्ण है।

2016 से पहले भारतीय मूल के अमेरिकी परंपरागत रूप से डेमोक्रेट्स को ही वोट करते आये हैं, इसलिये ट्रम्प इन वोटों को संयुक्त रखना चाहते हैं। ट्रम्प को यह अच्छी तरह मालूम है कि इस बार डेमोक्रेट्स से राष्ट्रपति के लिए चुनाव में नामांकन के लिए तुलसी गब्बार्ड, जो कांग्रेस में एक मात्र हिन्दू रिप्रेजेंटेटिव हैं, भी दौड़ में है और अमेरिका के हिन्दू नागरिक उनसे प्रभावित हो रहे हैं।

जब किसी भी चुनाव में एक एक वोट महत्वपूर्ण होता है तब ट्रम्प के लिए इस बिखराव को रोकने के लिए, मोदी से अधिक प्रभावी शस्त्र और क्या होगा?

वहां करीब 50,000 भारतीय मूल का समागम होगा जो किसी आयोजन में अमेरिका के लिए बड़ी संख्या है। इनके बीच मोदी के साथ मंच को साझा करना, चुनावी वातावरण में न सिर्फ यह भारतीय मूल के अमेरिकियों के लिए बल्कि शेष विश्व के लिए भी एक नए विश्व व्यवस्था के दृढ़ होने का संदेश है।

धीरे धीरे 2019 अपने अस्ताचल को जाने वाला है और उसके साथ धीरे धीरे एक नई विश्व व्यवस्था का उदय हो रहा है। जिस प्रकार सागर में एक नए द्वीप का उदय, ज्वालामुखी के विस्फोट, आग, लावा और सुनामी के साथ होता है वैसे ही, जब नई विश्व व्यवस्था का उदय होता है तो वह अपने साथ रक्त, युद्ध और भूमंडलीय टूटन भी लाता है। इस सृजन में जो विनाश छिपा है वह सब न सिर्फ आवश्यक है बल्कि विधान भी है।

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