‘एशिया 2025’ स्टडी : भविष्य की संभावना पर अमेरिकी तैयारी और मोदी

काफी समय से, विशेषतः 5 अगस्त 2019 के बाद से विश्व और वैश्विक राजनीति, कूटनीति और सामरिक समीकरण बहुत परिवर्तित हो गए हैं।

वैश्विक जगत में यह मूलभूत परिवर्तन इतना बड़ा है कि जहां भारत का रूपांतरण हुआ है वहीं पाकिस्तान और चीन भी इससे अछूते नही रहे हैं। आज वह भारत जो पिछले दशकों तक कश्मीर के खोने की संभावनाओं से ग्रसित था, वह आज पाकिस्तान के साथ चीन के लिए यही प्रश्न खड़ा कर चुका है कि क्या उसके द्वारा अवैध रूप से कब्ज़ा किये गये पाकिस्तान अधिकृत जम्मू कश्मीर के हिस्से को खो देगा?

अब प्रश्न उठता है कि वह कौन सी एक घटना है जो इस परिवर्तन की कारक हुई है और इस सब मे अमेरिका कहाँ खड़ा है? वह अमेरिका जो विश्व में परिवर्तन लाता रहा है, वह इससे किस तरह प्रभावित है और क्या वह इस परिवर्तन की संभावना के प्रति सबसे सजग था?

यह परिवर्तन भारत में 2014 को नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद आया है, जिसके वैश्विक क्षितिज पर लक्षण अब दिखने लगे हैं। आज जो वास्तविकता दृष्टिगत हो रही है, वह भारत में हुए परिवर्तन के कारण हुआ है।

वैसे तो यह एक ऐसा परिवर्तन था जिसके लिए कई राष्ट्र तैयार नहीं थे लेकिन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित भारत के विरोधी पाकिस्तान व चीन हुये हैं। इसका कारण यह रहा है कि भारत को लेकर उनकी नीतियों में इस परिवर्तन का कोई स्थान नहीं था इसलिए इन दो राष्ट्रों की विदेश के साथ आंतरिक नीति में, जिस तरह भारत को लेकर अग्रसक्रियता दिखनी चाहिए थी उसका अभाव रहा है।

इस सब में, सिर्फ अमेरिका दशकों से तैयार था। यह सही है कि 2016 में डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति बन जाने से, अमेरिकी नीतियों में भारत ने बड़ी सहजता से अपना स्थान बना लिया है लेकिन अमेरिका ने बहुत पहले परिवर्तित होने वाली वैश्विक सत्यता की परिकल्पना कर रखी थी। वह भारत के इस परिवर्तन के स्थायित्व की प्रतीक्षा कर रहा था। आज अमेरिका विश्व की सबसे बड़ी शक्ति है भी इस लिए, क्योंकि विश्व में होने वाले परिवर्तन की संभावना को लेकर अमेरिका पहले से तैयार था।

अब मैं, उस विषय के बारे में लिख रहा हूँ जिस पर वर्ष 2000 के आसपास भारतीय पत्रकारों व कूटनैतिक विशेषज्ञों के बीच विचार विमर्श होता था लेकिन फिर अचानक लोगो ने उस पर मौन धारण कर लिया।

आज से ठीक 20 वर्ष पहले, 25 जुलाई से लेकर 4 अगस्त 1999 तक नेवल वॉर कॉलेज, न्यूपोर्ट, रोडे आइलैंड, अमेरिका में, अमेरिका के अंडर सेक्रेटरी रक्षा (नीति) द्वारा संचालित एक बैठक हुई थी जिसमें अमेरिका के 15 श्रेष्ठ नीतिकारों ने भाग लिया था। उनसे कहा गया था कि वे इस बात का अन्वेषण करें कि 2025 में एशिया कैसा होगा और अमेरिका के रक्षा व आंतरिक सुरक्षा के नीतिकारों के समक्ष क्या चुनौतियों आएंगी।

इस बैठक में भविष्य को लेकर जो 147 पेज का आंकलन किया गया था, वह आज ‘एशिया 2025’ स्टडी के नाम से जाना जाता है। इसको अमेरिका के विदेश व रक्षा विभाग में नीति बनाने वालों के बीच चिह्नित लोगों को दिया गया ताकि भविष्य के लिए अमेरिका अपनी विदेश व रक्षा नीति को लेकर तैयार हो सके।

इस अध्ययन में जो संभावनाएं बताई गईं थी, उसी के आधार पर अमेरिका के रक्षानीतिकारों ने दो दशक पहले से ही अपना ध्यान, योरप से हटा कर एशिया पर केंद्रित कर दिया था। इसी के आधार पर अमेरिका ने अपना मुख्य लक्ष्य इस्लामिस्ट पाकिस्तान से होने वाले खतरों व आर्थिक रूप से पुनरुत्थानशील चीन को रोकना निर्धारित किया था। अपने इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए वर्ष 2000 में ही अमेरिका ने भारत के साथ और करीबी रिश्ते बनाने का निर्णय कर लिया था।

1999 में हुये इस अध्ययन में भागी बने नीतिकारों ने भविष्यवाणी की थी कि वर्ष 2020 तक पूरा पाकिस्तान विश्व के भूगोल से गायब हो जाएगा और भारत एक परिसंघ के रूप में स्थापित होगा।

उन्होंने 1998 में अटलबिहारी बाजपेयी की सरकार द्वारा नाभकीय परीक्षण के बाद भारत एक नाभकीय शक्ति व उसके आईटी सेक्टर की वैश्विक संप्रभुता को स्वीकारते हुए परिकल्पना की थी कि 2012 के आस पास भारत और पाकिस्तान में युद्ध होगा, जिससे पाकिस्तान के विघटन का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा और अगले एक दशक में पाकिस्तान से बलूचिस्तान, सिंध व खैबर पख्तून इलाका अलग हो जाएगा।

उन्होंने उस वक्त यह नही सोचा था कि 2004 में बाजपेयी सरकार चुनाव हार जाएगी और कांग्रेस (यूपीए) सरकार एक दशक तक भारत में राज करेगी। इसी लिए इस एक दशक में, पाकिस्तान को लेकर, अमेरिका के लक्ष्य को लेकर कुछ नहीं हुआ लेकिन अमेरिका ने व्यापार बढ़ाया और भारत से परमाणु समझौता ज़रूर किया।

साल 2014 में भारत मे नरेंद्र मोदी के आने से सब बदल गया। उनके आने के बाद, सबसे पहले तेज़ गति से भारत अमेरिका के बीच सामरिक समझौते हुये और पिछले 5 वर्षों में, रुकी हुई योजना को तीव्र गति से उसके लक्ष्य तक पहुंचाने का चौतरफा प्रयास हुए हैं।

पहले भी लिख चुका हूँ कि 2020 अतिमहत्वपूर्ण वर्ष है और भारतीय उपमहाद्वीप का पुनर्गठन पूरा हो जाएगा। यह पुनर्गठन सिर्फ 1999 में की गई परिकल्पना पर आधारित नहीं है बल्कि इससे पहले भी एक और कल्पना की गई थी लेकिन उसकी संभावना का अंत 5 अगस्त 2019 को हो चुका है। इस पुनर्गठन का क्या स्वरूप 1990 के दशक में परिकल्पित था और वास्तविकता में यह किस रूप में होगा, यह फिर किसी अगले लेख में लिखूंगा।

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