वो खुद कुछ ऐसा करेंगे जिससे ट्रैफ़िक रूल टूटें, और वे आपको धर दबोचें

बताने की ज़रूरत नहीं कि दिल्ली, नोएडा और ग़ाज़ियाबाद बिलकुल सटे हुए हैं। लेकिन राजधानी होने के चलते दिल्ली में ट्रैफ़िक नियमों के अनुपालन, और नोएडा और ग़ाज़ियाबाद में ट्रैफ़िक नियमों के अनुपालन में ज़मीन आसमान का अंतर है।

दिल्ली में हर चौक चौराहे पर ट्रैफ़िक पुलिस होती है। थोड़ी सी लापरवाही भारी पड़ जाती है। मसलन कोई लापरवाही नहीं करता। लाल बत्ती पर रुकना। पैदल को रास्ता देना। स्पीड लिमिट में रखना। हेलमेट, सीट बेल्ट आदि ये सारे नियमों का कड़ाई से पालन होता है।

वहीं नोएडा और ग़ाज़ियाबाद में चौराहों पर ट्रैफ़िक पुलिस की उपस्थिति तो छोड़ दीजिए, अक्सर चौराहों की लाल बत्ती या उसका टाइमर ही ख़राब होता है। लिहाज़ा 60-70% जनता जो कम से कम इलेक्ट्रॉनिक ट्रैफ़िक सिग्नल का पालन करती है वो भी भसड़ मच जाने से इसका पालन कर पाने में असमर्थ होती है।

‘पहले मैं-पहले मैं’ में पूरी ट्रैफ़िक की धज्जियाँ उड़ जाती है। तब कभी कभार कंट्रोल रूम से CCTV में चौराहे पर लगा हुआ जाम देख रही पुलिस आ धमकती है और रास्ता ख़ाली कराने का औपचारिक कर्तव्य निर्वहन करके किनारे हो जाती है।

कहने का मतलब, उपरोक्त दोनों ही परिस्थितियों में जुर्माने की राशि बराबर है फिर भी दिल्ली में ट्रैफ़िक नियमों का कड़ाई से पालन हो रहा है जबकि नोएडा और ग़ाज़ियाबाद में अधिकांशतः ट्रैफ़िक नियमों की धज्जियाँ उड़ जाती हैं। अब यदि जुर्माने की राशि बढ़ा भी दी जाए और Traffic Rules enforcement फटे हाल हो, तो भी क्या बदलाव आने वाला है?

हो सकता है शुरूवाती कुछ दिन हैवोक बने और जनता, भय की वजह से ट्रैफ़िक नियमों का पालन करे लेकिन बिना traffic Rules enforcement ये sustainable व्यवस्था नहीं होने वाली, इसमें संदेह नहीं।

ये डर भी वहाँ हवा हो जाएगा। जब ट्रैफ़िक लाइट ख़राब होगी और ‘पहले मैं-पहले मैं’ की भसड़ मचेगी, जब जाम लगा होगा, वहाँ ये डर काम नहीं आएगा।

कुल मिलाकर सीट बेल्ट, हेलमेट, RC, बीमा आदि के कम्प्लाइयन्स ही बढ़ेंगे लेकिन जाम से निजात मिलने के आसार नहीं हैं, क्योंकि जाम कोई जानबूझ के नहीं लगाता। जाम ख़राब सिग्नल, अतिक्रमण और ट्रैफ़िक पुलिस के अभाव में लगता है, वो अब भी वैसे ही रहना है। जाम का कारण पर्याप्त सड़क और फ़्लाईओवर न होना भी है।

ट्रैफ़िक नियम अनुपालन का मुख्य लक्ष्य सुचारू और सुरक्षित आवागमन है, जिसे प्राप्त होने की कोई सम्भावना नज़र नहीं आती। अर्थात बढ़ा जुर्माना मिथ्या है ये समय के साथ सिद्ध होगा।

बल्कि बढ़े हुए जुर्माने से जिस चीज़ की सम्भावना सबसे ज़्यादा है वो है पुलिस की कमाई में इज़ाफ़ा। गाहे बगाहे जब भी पुलिस को कमाई का अवसर मिलेगा या हाई कमान से वसूली का फ़रमान होगा तो वो कुछ ऐसा करेगी जिससे जाने अनजाने ट्रैफ़िक रूल टूटें और पुलिस आपको धर दबोचे।

उदाहरण के तौर पर नॉएडा में कई ऐसे रूट हैं जो दिन के समय वन-वे होते हैं। GPS नेवीगेटर से भ्रमित होकर अक्सर लोग उस रास्ते चले जाते हैं क्योंकि GPS नेवीगेटर में ये रास्ते वन-वे डिफ़ाइन नहीं है।

वन-वे का बड़ा सा बोर्ड लगाने के बजाए, कोने में छोटा सा बोर्ड लगा हुआ है जो लेंस से ही नज़र आएगा। होता ये है कि ग़लती से उस रास्ते पर गए लोगों को आख़िरी छोर में किसी कोने में छुपी खड़ी पुलिस ट्रैप करती है और जुर्माना या घूस वसूली करती है।

नि:संदेह मक़सद 100% वसूली ही होता है, ट्रैफ़िक रूल का अनुपालन नहीं। क्योंकि यदि मक़सद ट्रैफ़िक रूल का अनुपालन होता तो पुलिस वन-वे का बड़ा सा बोर्ड लगाती, GPS नेवीगेटर में उस रूट को वन वे परिभाषित करवाती और उस रूट के शुरूवाती मुहाने पर खड़ी होती ताकि आपको ग़लत जाने से पहले ही divert कर दे, आप ग़लती कर ही न सकें। जबकि जाम वाली जगहों और चौराहों को छोड़कर ख़ाली रहने वाले वन-वे रास्ते के आख़िर छोर में खड़े रहने से सिद्ध होता है कि ये ट्रैप है। जिसमें दुर्भाग्य से नॉएडा में शुरूवाती दिनों में मैं 3-4 बार पड़ा हूँ।

पुलिस वसूली करना चाहे तो बिना ट्रैफ़िक उल्लंघन आपका चालान काट सकती है क्योंकि बतौर प्रमाण उल्लंघन का स्नैप शॉट recommended है लेकिन आवश्यक नहीं है। आप हाथ पैर जोड़ते रहिए, वो बोलेगी अभी भरो या कोर्ट में जाकर भरो। और यहाँ कैश लेस सुविधा भी नहीं है। अतः आप मजबूरी में बिना जुर्म कैश जुर्माना भर के मामला रफ़ा दफ़ा करते हैं।

कुल मिलाकर यदि जुर्माना बढ़ाए जाने से देश की ट्रैफ़िक व्यवस्था दुरुस्त होती तो इसका स्वागत होता लेकिन इसके विपरीत ये सिवाए वसूली बढ़ाने के कुछ नहीं करेगा। पहले से भी ज़्यादा पुलिसिया शोषण होगा।

दिल्ली के उदाहरण से ये प्रमाणित है कि जब ट्रैफ़िक जाम के लिए ट्रैफ़िक पुलिस को ज़िम्मेदार बनाया जाता तो ट्रैफ़िक रूल बेहतर लागू होता है! शायद ट्रैफ़िक रूल और भी बेहतर लागू होता जब ट्रैफ़िक सिग्नल बेहतर काम करते, ट्रैफ़िक पुलिस प्रो ऐक्टिव होती और जुर्माने की राशि कम होती (ताकि घूस के बजाए व्यक्ति जुर्माना भरे) जिसे CCTV निगरानी में पुलिस नहीं, बल्कि पुलिस से अलग सरकार के थर्ड पार्टी कैशलेस काउंटर पे जमा कराया जाता। Paytm, Bhim, credit, debit सभी कार्ड मान्य होते! उल्लंघन का फ़ोटो प्रमाण ज़रूरी होता। ज़्यादा बार उल्लंघन पर DL कुछ वक़्त के लिए रद्द होता और पुनः ऑटोमैटिक शुरू होता। रद्द अवधि में ड्राइविंग पर जुर्माने की राशि 20 गुनी होती! पुलिस DL आपके फ़िंगर प्रिंट से चेक कर पाती। तब शायद ये सिस्टम बेहतर काम करता!

आधार के ज़माने में जबकि DL, RC, बीमा सभी दस्तावेज़ों को आधार से लिंक कर सकते हैं, उस समय DL, RC, बीमा न होने पर जुर्माने का कोई औचित्य समझ नहीं आता। आधार के ज़माने में तो फ़िंगर प्रिंट और कॉर्निया ही पर्याप्त डॉक्युमेंट प्रमाण होने चाहिए।

लेकिन दुर्भाग्य से कैशलेस, इंफ़ोरमेशन टेक्नॉलजी, आधार वगैरह सब जनता पर एक तरफ़ा लागू हैं। जहाँ जनता की सुविधा और सरकारी जवाबदारी की बात आती है वहाँ सब फुस्स हो जाता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यवहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति मेकिंग इंडिया (makingindiaonline.in) उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार मेकिंग इंडिया के नहीं हैं, तथा मेकिंग इंडिया उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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