2340 वर्ष के बाद मिली है हमें नरेंद्र मोदी सरकार

चाणक्य ने अपनी पुस्तक – अर्थशास्त्र – में यातायात के नियमों और उनका उल्लंघन करने पर दंड के बारे में विस्तार से लिखा था।

उदाहरण के लिए, बैलगाड़ी या घोड़ागाड़ी मार्ग पर बिना चालक के नहीं चल सकती। एक नाबालिग गाड़ी को केवल तभी चला सकता है जब उसके साथ कोई वयस्क बैठा हो।

अगर किसी गाड़ी को बिना किसी वयस्क के, नाबालिग व्यक्ति चलाता हुआ पाया गया तो उस गाड़ी को राजा ज़ब्त कर लेगा।

अगर खतरनाक तरीके से गाड़ी चलाई जाए तो उसके लिए भारी वित्तीय दंड का प्रावधान है। अगर हाथी या सींग वाले पशु से किसी यात्री की मृत्यु हो जाती है, तो उसके मालिक या चालक को सबसे कठोर दंड दिया जायेगा।

इस दंड की व्यवस्था लगभग 2340 वर्ष पूर्व महाराज चंद्रगुप्त मौर्य के समय की है जब भारतवर्ष की सीमाएं ईरान, अफगानिस्तान, सेंट्रल एशिया से होते हुए भारत के दक्षिण तक थीं। मगध, पाटलिपुत्र, तक्षशिला जैसे भव्य शहरों में यातायात के नियमों का उल्लंघन करने पर ऐसे दंड की व्यवस्था थी।

राजनीति शास्त्र में ऐसा माना जाता है कि राज्य (राष्ट्र) की उत्पत्ति और उसकी वैधता का आधार प्रत्येक व्यक्ति के मध्य social contract या सामाजिक अनुबंध है।

सभी व्यक्तियों ने अपनी स्वयं की और सम्पति की सुरक्षा, एवं अपने मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए आपस में अपनी स्वेच्छा या वास्तविक इच्छा से यह करार किया कि हर व्यक्ति एक-दूसरे के अधिकारों का हनन नहीं करेगा, एक दूसरे की जान नहीं लेगा और इस करार को लागू करने ले लिए वह अपने कुछ अधिकारों का त्याग कर देगा। इसी कॉन्ट्रैक्ट ने संविधान का रूप लिया।

और यह कोई बाज़ारू या लेन-देन का कॉन्ट्रैक्ट नहीं है; बल्कि इस कॉन्ट्रैक्ट का आधार नैतिक है।

यातायात के नियमों का पालन करना और उन नियमों को तोड़ने पर दंड देना इसी सामाजिक अनुबंध का भाग है।

इस सामाजिक अनुबंध को ना मानने के कारण हमारी सड़कों पर अफरा-तफरी फैली रहती है। सभी एक-दूसरे को रौंदकर आगे निकलने के प्रयास में लगे रहते हैं। हर जगह ऐसे हॉर्न बजाया जाता है कि हम बहरों की दुनिया में रह रहे हैं।

हम भारी पेनाल्टी देने की आलोचना करते हैं, लेकिन हमारी गलती से अगर स्वयं को या किसी अन्य व्यक्ति को चोट लग जाए या मृत्यु हो जाए तो उस हानि के बारे में नहीं सोचते।

दुर्घटना होने पर पुलिस आती है; किसी सरकारी अस्पताल में पहला इलाज होता है। दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति कुछ दिन काम नहीं कर सकता। जिस व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, उसके परिवार की दुनिया ही एक तरह से उजड़ जाती है।

क्या हर एक दुर्घटना की कोई सामाजिक कीमत नहीं है? क्या यातायात के नियमों का उल्लंघन केवल दुर्घटनाग्रस्त व्यक्तियों को ही प्रभावित करती है? उस परिवार, खेत-खलिहान, दुकान, कार्यालय, कारखाने इत्यादि का क्या होगा जो उस व्यक्ति की कुशलता पर निर्भर था? देश और समाज के निवेश का क्या होगा जो उस दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति की शिक्षा, स्वास्थ्य, नौकरी, रोज़गार इत्यादि में टैक्स के द्वारा किया गया था?

जब तक हम नियमों को तोड़ने पर घूस देकर या कम पेनाल्टी देकर बच जाते हैं तब तक हम उच्च स्तर की सरकारी सेवाओं की मांग भी नहीं कर सकते। हम एक दुष्चक्र में फंस जाते हैं, क्योंकि सरकार दोयम दर्ज़े की सेवाएं उपलब्ध कराती है – जैसे टूटी-फूटी सड़कें – और हम दोयम दर्ज़े के दंड या घूस देकर उन टूटी-फूटी सड़कों को एक तरह से स्वीकार कर लेते हैं।

जब तक हम स्वयं इस बात को स्वीकार नहीं करते कि मानव जान की कीमत किसी भी दंड से अधिक है, तब तक हम अपना व्यवहार नहीं बदल सकते।

अगर इस तर्क को मान लिया जाए कि सरकार पहले उच्च स्तर की सड़कें उपलब्ध कराएं, तभी हम से नियमों का उल्लंघन करने पर तगड़ी पेनाल्टी ले, तो क्या हम यह भी कह सकते हैं कि हर उस परिवार को बच्चे नहीं पैदा करना चाहिए, जो अपने बच्चों की उच्च स्तर की परवरिश, शिक्षा तथा स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा सकता?

एक फ्रेंच दार्शनिक ने कहा था कि हर देश को वह सरकार मिलती है जो इसके योग्य है।

2340 वर्ष पूर्व हमें महाराज चंद्रगुप्त मौर्य, महाराज बिन्दुसार और सम्राट अशोक मिले थे।

हज़ारों वर्षो से सतत सनातनधर्मी, सबसे पुरानी और परिष्कृत सभ्यता के उत्तराधिकारी, स्वतंत्र भारत के निवासियों को अंततः नरेंद्र मोदी सरकार मिली है।

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