जम्मू कश्मीर की विशेष राज्य से केंद्रशासित प्रदेश की यात्रा: वैश्विक भौगोलिक पुनर्निर्माण की संरचना: भाग 4

भारत द्वारा, जम्मू और कश्मीर राज्य का विशेष दर्जा समाप्त कर उसको दो केंद्रशासित राज्य बना कर भारत को सम्पूर्ण रूप से जहां एकीकृत किया, वहीं यह आभास हो रहा है कि यह घटना दक्षिण एशिया या कहिए भारतीय उपमहाद्वीप के पुनर्गठित होने के संकेत भी दे रहा है।

पिछले 25 दिनों में पाकिस्तान व शेष विश्व से जो संकेत मिल रहे हैं वे यही बता रहे हैं कि विश्व किसी अनहोनी की प्रतीक्षा में सन्नाटा खींचे हुये है।

मुझे यहां पर जो पाकिस्तान व भारत के एक वर्ग से कश्मीर को लेकर जो शोर सुनाई पड़ रहा है, उसका दीर्घकालीन व्यवस्था में कोई अर्थ नहीं दिखाई पड़ रहा है। धारा 370 की विरलता के बाद, यह कोलाहल जो भारत व पाकिस्तान से निकलता सुनाई पड़ रहा है वह अपरिहार्य है और निश्चित रूप से भारत की सरकार ने अपने निर्णय को क्रियान्वित करने से पहले इसके होने का संज्ञान व निवारण के उपायों को अपनी योजना में उचित स्थान दिया होगा।

भारत मे जो विरोध के स्वर उठ रहे हैं, ये वे हैं जिन्होंने पिछले 7 दशकों से जम्मू कश्मीर को लूटा है। जहां राजनीतिक स्तर पर विशेष राज्य की आड़ में जो अंध लूटपाट हुई है उसमें अब्दुल्ला, मुफ़्ती व गांधी परिवार व उनके करीबियों ने बंदरबाट की है।

विशेष राज्य का दर्जा समाप्त होते ही वहां वित्तीय पारदर्शिता आ गयी है, जिससे इन लोगों की जवाबदेही तय होने की शुरुआत होगी। यह वर्ग जहां अपनी राजनीतिक व आर्थिक शक्ति के ह्रास व पूर्व में किये गए कुकर्मो के खुलने के डर से विरोध कर रहा है, वहीं जम्मू कश्मीर के तंत्रों में इस व्यवस्था से पूरी तरह भ्रष्ट हो चुका वर्ग भी चिंघाड़ रहा है।

इसके अतिरिक्त कश्मीर घाटी के अतिवादियों व अलगावादियों के प्रवक्ता बने, जो लोग राजनीतिक दलों, मीडिया व बुद्धिजीवी का मुखौटा पहने हैं, वे भी विरोध कर रहे हैं, क्योंकि ये सब जम्मू कश्मीर के नाम पर जो लूटपाट हुई, उससे पोषित वर्ग हैं।

इनको पिछले 30 वर्षों से जहां पाकिस्तान की आईएसआई से वित्तीय सहयोग मिलता था वहीं स्वयं भारत की सरकार द्वारा पोषित किया गया है। आज तो यह भी सामने आ गया है कि आईबी को इस काम के लिए अपार धन दिया जाता था और उस धन को लेकर आईबी और जम्मू कश्मीर पुलिस में भयंकर भ्रष्टाचार हुआ है।

यह सब 5 अगस्त 2019 के बाद पूरी तरह बंद हो चुका है।

अब जो पाकिस्तान से विरोध हो रहा है वह उसके शासकों व उसकी जनता का आक्रोश व साथ ही रुदन समझ में आता है, यह बड़ा स्वाभाविक है। वहीं भारत से जो विरोध व आक्रोश के स्वर सुनाई पड़ रहे हैं, वह ज्यादातर या तो राजनीतिक विवशता का आर्तनाद है या फिर आर्थिक व अस्तित्व के स्रोतों के लुप्त होने का प्रलाप है।

पाकिस्तान में जो हो रहा है, वह तो पिछले 70 वर्षों से पाकिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का परिणाम है लेकिन भारत में जो हो रहा है वह पिछले 40 वर्षों से कश्मीर को लेकर, दिल्ली व श्रीनगर के राजनीतिक व शासकीय तन्त्र की पाकिस्तान व इस्लाम के नाम पर की गई धूर्तता व छल है।

पाकिस्तान ने 22 अक्टूबर 1947 में जब जम्मू कश्मीर राज्य को कबीलाई आक्रांताओं की ओट में, कब्ज़ा करने की कोशिश की, जिसमें वे 1/3 भूखंड पर अवैध रूप से कब्ज़ा करने में सफल भी रहे, तभी से पाकिस्तानी शासकों व सैन्य नेतृत्व को ‘कश्मीर बनेगा पाकिस्तान’ के नारे पर जिलाया है।

1950 के दशक से ही मार्शल लॉ और सैन्य शासकों की छत्रछाया में पाकिस्तान की मानसिकता आरंभ से ही दूषित, अविवेकी और ईर्ष्यालु हो गयी थी। इसी कारण कालांतर में, भारत व उसके हिन्दुओं से जन्मजात शत्रुता के भाव से खड़ा हुआ पाकिस्तान, अपनी जनता में शुरू से ही भारत के प्रति अविश्वास व भय को ढालने में सफल हुआ है।

इसी को अपनी नींव बनाते हुए, श्रीनगर में पाकिस्तान का झंडा फहराने के लालच में, वहां के तत्कालीन शासकों व सैन्य नेतृत्व ने पाकिस्तान को एक ‘सिक्युरिटी स्टेट’ बना दिया है।

पाकिस्तान की जनता वहां के राजनीतिज्ञों व सेना द्वारा दिखाए गए इस सपने पर, पीढ़ी दर पीढ़ी इसी को देखते जीती रही है। यह वहां के राजनीतिज्ञों व पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व के लिए, अलग अलग कारणों से सुविधाजनक था। एक तरफ कश्मीर के सपने के आगे पाकिस्तानी शासकों को वहां की जनता की मूल समस्याओं की तरफ ध्यान न दे कर सामाजिक व लोकतांत्रिक सुधार से बचते हुए व्यक्तिगत स्वार्थों को पूरा करना सुविधाजनक था, वहीं दूसरी तरफ सेना को वहां के राजनीतिक तन्त्र को भ्रष्ट व अक्षम सिद्ध कर, सभी तन्त्रो पर अपना कब्जा जमा कर जनता के बीच पाकिस्तान के अस्तित्व का एक मात्र रक्षक हो कर प्रतिष्ठित होने में सुविधा हुई है।

पाकिस्तान में जिया उल हक के बाद जो भी चुनाव हुए है, उसमें सेना का हमेशा से हस्तक्षेप रहा है। वहां कोई भी प्रधानमंत्री तभी तक बना रह सकता है जब तक सेनाध्यक्ष का उसे समर्थन प्राप्त रहता है। आज तो स्थिति यह है कि पीटीआई का इमरान खान, सेना द्वारा ही जिताया गया पाकिस्तान का प्रधानमंत्री है।

ऐसे में जब जम्मू कश्मीर पूरी तरह भारत में एकीकृत हो गया है तब उनका कष्ट असहनीय है। आज पाकिस्तान से इमरान खान समेत अन्य नेता जो गाली गलौज की भाषा का प्रयोग कर परमाणु युद्ध की धमकी दे रहे हैं वह भारत से ज्यादा अपनी जनता के लिए बोल रहे हैं। उसका कारण यह है कि कश्मीर की अफीम को चटा चटा कर तैयार हुई पाकिस्तान की जनता में युद्धोन्माद चरम पर है क्योंकि उसको दृढ़ विश्वास है कि उनकी सेना अजेय है और युद्ध कर के ‘कश्मीर बनेगा पाकिस्तान’ के स्वप्न को पूरा कर लेगी।

लेकिन इमरान खान से लेकर पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा को यह सत्य मालूम है कि इस वक्त यदि युद्ध हुआ तो आर्थिक रूप से दिवालियापन के कगार पर खड़ा पाकिस्तान हार जाएगा।

इसके दुष्परिणाम यह होंगे कि एक तो पाकिस्तान सेना ने जो अपनी रक्षक वाली छवि बनाई है वह टूट जाएगी जिससे उनका पाकिस्तान में जो राज चलता है, वह समाप्त हो जाएगा और दूसरा स्वयं सेना के साथ, पाकिस्तान के अस्तित्व पर वास्तविक संकट आ खड़ा हो जाएगा।

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