जम्मू कश्मीर की विशेष राज्य से केंद्रशासित प्रदेश की यात्रा: वैश्विक भौगोलिक पुनर्निर्माण की संरचना: भाग 2

मोदी सरकार के गृहमंत्री अमित शाह ने धारा 370 व जम्मू कश्मीर के विभाजन को लेकर जब राज्यसभा में 5 अगस्त 2019 को बिल प्रस्तुत किया था तब पूरा भारत स्तब्ध रह गया था।

यह इतना बड़ा निर्णय था कि यह माना गया था कि इस पर तीव्र प्रतिक्रियाएं शेष विश्व से आएंगी लेकिन आज 2 सप्ताह से ऊपर हो जाने के बाद भी पाकिस्तान और चीन व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की कश्मीर में मध्यस्थता की रट के अलावा भारतीय हितों के विपरीत कोई भी प्रतिक्रियाएं नहीं आई है।

मेरे लिए जम्मू कश्मीर के संवैधानिक चरित्र को बदल देना एक ऐसी घटना है जिसने न सिर्फ दक्षिण एशिया के सभी समीकरणों को बदल दिया है बल्कि विश्व के सामरिक व भौगोलिक संतुलन की संरचना को हमेशा के लिए बदल दिया है।

अब ऐसी घटना के हो जाने के बाद भी विश्व में सन्नाटा बहुत कुछ कहता है। यहां पर मैं, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान और उनकी सेना द्वारा ट्विटर पर छेड़े गये सोशल मीडिया युद्ध व बेतहाशा रुदाली और चीन द्वारा लद्दाख को लेकर दी गयी तीव्र प्रतिक्रिया, दोनों को ही महत्व नहीं दे रहा हूँ क्योंकि वास्तविक धरातल पर इसकी थाप नहीं सुनाई पड़ रही है।

मैं समझता हूँ कि पाकिस्तान की तरफ से जो प्रतिक्रिया आयी है वो उसकी आवश्यकता है। यदि वह यह भी नहीं करेगा तो वह अपनी उस जनता को, जिसे पिछले 70 वर्षों से ‘कश्मीर बनेगा पाकिस्तान’ के सपने तले जिलाये रखा गया है, उनकी आहत भावनाओं को लेप कैसे लगाएगा?

भारत द्वारा जम्मू कश्मीर राज्य को भारत में पूर्णरूप से एकीकृत किये जाने से पाकिस्तान की जनता आक्रोशित तो ही है, उसके साथ नपुंसकता के भाव से ग्रसित भी है। वो अपनी पाकिस्तानी सेना को अजेय मानते हुए, यह अभिलाषा पाले हुए है कि पाकिस्तान, कश्मीर पर कब्ज़ा करने के लिए भारत से युद्ध करेगा या फिर कश्मीर को भारत से छीनने के लिए, आक्रमण करने के लिए जिहादियों का सार्वजनिक आह्वान करेगी, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है।

जहां तक चीन की प्रतिक्रिया है, उसकी प्रतिक्रिया भी बनती है क्योंकि लद्दाख के कुछ क्षेत्र पर वह अपना अधिकार मानता आया है। भारत ने लद्दाख को जम्मू कश्मीर से अलग करके उसकी परिभाषिकी ही बदल डाली है।

इतना ही नहीं, सदन में गृहमंत्री अमित शाह ने पाक अधिकृत कश्मीर के साथ 1962 में चीन द्वारा कब्ज़ा किये गये क्षेत्र अक्साई चीन को भी वापस लिए जाने के प्रति भारत सरकार की प्रतिबद्धता की घोषणा की है।

भारत में एक बड़े वर्ग को पूर्व की तरह यह अपेक्षा थी कि चीन, पाकिस्तान को मनोबल देने व अपनी स्थिति को और स्पष्टता देने के लिए भारत को धमकायेगा व भारतीय सीमाओं पर कुछ शक्तिप्रदर्शन करेगा, लेकिन अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है।

इन दोनों राष्ट्रों की प्रतिक्रियाओं के अलावा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भी बराबर टिप्पणी आ रही थीं जिसमें वो अपनी तरफ से कश्मीर मामले में भारत और पाकिस्तान की मध्यस्थता करने की इच्छा व्यक्त कर रहे थे।

एक तरफ ट्रम्प अपनी इच्छा दिखा रहे थे, वहीं दूसरी ओर भारत उनकी इस इच्छा को अस्वीकार कर रहा था। इतना ही नहीं, एक तरफ ट्रम्प की कश्मीर में मध्यस्थता के लिए टिप्पणी है वहीं दूसरी तरफ अमेरिका का स्टेट डिपार्टमेंट व डिफेंस डिपार्टमेंट भारत को संदेश दे रहा है कि अमेरिका की कश्मीर को लेकर नीति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, यह भारत का अंदरूनी मामला है।

यदि भारत द्वारा जम्मू कश्मीर को लेकर लिए गए निर्णय पर हम तटस्थ भाव से विश्व की शक्तियों के साथ पाकिस्तान, चीन और अमेरिका के व्यवहार को समझें, उससे निकल रहे भावों को पढ़ें और अनकही की गूढ़ार्थना करें, तो यह स्पष्ट है कि जो दिख रहा है, वह है नहीं। जो कहानी भारत और पाकिस्तान में चल रही है, वह असली सत्य नहीं है।

यह जो कुछ भी हुआ है, वह सिर्फ जम्मू कश्मीर तक सीमित नहीं है, यह भविष्य में होने वाली घटनाओं को जन्म देने के लिए किया गया गर्भधारण है, जिसके केंद्र में भारत है। जैसा कि हर गर्भ के ठहरने पर, यह तो निश्चित होता है कि आज का भ्रूण, पल पल बढ़ता जाएगा लेकिन क्या जन्म लेगा और किस किस की आशा अनुरूप होगा यह भविष्य के गर्भ में ही छिपा होता है।

मेरे लिए भारतीय उपमहाद्वीप में जो आज अनकहा और अदृश्य है, वह कल की संरचना कर रहा है लेकिन इसमें मुझे जहां सृजन की अनुभूति हो रही है वही विध्वंस को भी निमंत्रण प्रेषित होता दिख रहा है।

क्रमशः

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