जम्मू कश्मीर की विशेष राज्य से केंद्रशासित प्रदेश की यात्रा: वैश्विक भौगौलिक पुनर्निर्माण की संरचना : भाग 1

जम्मू कश्मीर को लेकर इतना ऐतिहासिक घट चुका है कि उस पर अब लिखने का वैसे तो कोई औचित्य नहीं रह गया है। लेकिन इस घटना के इतने परिमाण है कि विभिन्न स्तर पर इसकी मीमांसा की जा सकती है।

ऐसे में मेरा भी एक दृष्टिकोण है जो वर्तमान में कश्मीर की घाटी में दिख रही प्रसव वेदना और उसको लेकर भविष्य की आशंकाओं और संभावनाओं की कहानी कहती है।

मैं समझता हूँ कि जब 5 अगस्त 2019 को राज्यसभा में गृह मंत्री अमित शाह ने जम्मू कश्मीर की धारा 370 के सभी अनुच्छेदों, सिवाय पहले के, हटाये जाने व सम्पूर्ण जम्मू कश्मीर राज्य को दो भागों में केंद्र शासित प्रदेश बनाये जाने की घोषणा की तो वह स्वतंत्रता के बाद से आधुनिक भारत का सबसे बड़ा कदम था।

इसमें भी कोई संदेह नहीं की इस पूरी प्रक्रिया की गोपनीयता प्रशंसनीय है लेकिन जब राज्यसभा में इस निर्णय को गृह मंत्री अमित शाह सामने लाये थे उससे पहले ही, जम्मू कश्मीर में बढ़ती सैनिक संख्या व यात्रियों को घाटी खाली कर देने का युद्ध स्तर पर जो काम हुआ था, लोगों को यह अंदेशा तो अवश्य हो गया था कि कश्मीर की घाटी और एलओसी पर कुछ अप्रत्याशित होने वाला है।

इसी के साथ अफवाहों का यह भी बाज़ार गर्म था कि धारा 370 हटाई जा सकती है या प्रदेश को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है।

मैंने स्वयं यह आशंका जताई थी कि ऐसा कुछ नहीं होगा, उसके विपरीत पाक अधिकृत कश्मीर को लेकर कोई संवैधानिक व्यवस्था सामने आ सकती है। लेकिन मेरा पूर्व अनुमान गलत निकला और मोदी सरकार ऐसा कुछ कर बैठी जिसका मुझे 2020 में होने का विश्वास था।

अब जब यह हो गया है तो यह बात अवश्य महत्व की है कि यह जम्मू कश्मीर से धारा 370 को निर्मूल करने की शुरुआत कब से हुई? इसकी समय सारणी 2020 में परिवर्तन कर, अभी क्यों किया गया और भविष्य में यह भारतीय उपमहाद्वीप व सम्पूर्ण विश्व को कैसे प्रभावित करेगा?

जम्मू कश्मीर राज्य में जो भी हुआ है, वह हमारे लिए भारत का सम्पूर्ण रूप से एकीकृत होना है, जिसे नरेंद्र मोदी की भारत के प्रति प्रतिबद्धता व अमित शाह के क्रियान्वयन की श्रेष्ठता ने उपार्जित किया है।

लेकिन पाकिस्तान व शेष जगत के वैश्विक राजनैतिक विशेषज्ञों के लिए यह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की ‘रक्षात्मक आक्रमकता’ (ऑफेंसिव डिफेंसिव) नीति का व्यवहारिक निष्पादन है। इसी लिए इस घटनाक्रम को पाकिस्तान समेत विश्व की अन्य गुप्तचर संस्थाएं व थिंक टैंक, इसे ‘डोभाल डॉक्ट्रिन’ के नाम से सम्बोधित कर रहे है।

ऐसा क्यों है और इसका निहितार्थ क्या हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि किसी भी पथप्रवर्तक नीति का धरातल में सम्पन्न होना, नये तत्वों और नई संभावनाओं को जन्म देता है, जिसके कारण विश्व को भविष्य के आभासों और आकलनों के द्वंद्व से जूझना पड़ता है।

यहीं पर प्रश्न यह है कि इसकी शुरुआत कहाँ से है? बहुत से लोग यह लिख रहे हैं कि इसका जन्म, मोदी सरकार की उस द्यूतक्रीड़ा के प्राम्भ से हुआ है जब बीजेपी ने महबूबा मुफ्ती के साथ चल रही साझा की सरकार से किनारा कर लिया था। मैं ऐसा मानने वाले विद्वानों को सिरे से नकारता हूँ क्योंकि उन्हें धेले का कुछ नहीं पता था और न अब है।

मैं शुरू से, जब से बीजेपी ने अपनी वैचारिक विरोधी पीडीपी के साथ जम्मू और कश्मीर की सरकार चलाने का निर्णय किया था, उसका समर्थन किया था। मैंने उस वक्त बड़े बड़े हिंदुत्ववादी और राष्ट्रवादियों को इसका भरपूर विरोध करते हुए देखा है।

मैने इसके समर्थन में तब लिखा था कि मोदी जी की बीजेपी का निर्णय महत्वपूर्ण है क्योंकि जम्मू कश्मीर, बीजेपी के लिए अछूता है। जब तक बीजेपी उसके शासन के तन्त्र को नहीं जानेगी तब तक, जम्मू कश्मीर को नाथना असम्भव है।

उत्तरप्रदेश में तो 2 दशकों में ही शासनतंत्र बिगड़ गया था, जम्मू कश्मीर तो 7 दशकों से एक ही वातावरण में तन्त्र फला फूला था। जिस प्रदेश में 90% नौकरियां राज्य की हों और शेष 10% निजी क्षेत्र में रही हों, वहां बिना उस गंदगी में उतरे, कुछ भी हासिल नहीं होना था।

इस पूरे समय, अजित डोभाल की निगरानी में जम्मू कश्मीर के शासन तंत्र में लगे जम्मू कश्मीर के अधिकारियों और कर्मचारियों की छान बीन होती रही और उसमें से उनको चिन्हित गया जिनकी भारत के प्रति निष्ठा में कोई संदेह नहीं था।

इस तैयारी के बाद ही, बीजेपी ने पूर्व में सुनियोजित योजना अनुसार, पीडीपी के साथ चल रही जम्मू कश्मीर की सरकार से अपने को अलग किया और मोदी जी द्वारा व्यक्तिगत रूप से चुने गए व्यक्ति सतपाल मलिक को राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया।

मोदी सरकार की जम्मू कश्मीर में धारा 370 को लेकर बनी योजना का प्रथम चरण तो महबूब मुफ़्ती के मुख्यमंत्री बने रहते ही हो गया था लेकिन उसका दूसरा चरण, जो भारत की सरकार के लिए बहुत संवेदनशील व दूरगामी परिणाम देने वाला था, वह राज्यपाल शासन में हुआ।

वहां के 35 हज़ार 96 पंच निर्वाचन क्षेत्र में पंचायती चुनाव कराना बड़ा निर्णय था। यहां मोदी सरकार ने इस बात की कोई कसर नहीं छोड़ी कि किसी भी तरह पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस इसमें भाग लेने को तैयार न हो।

नरेंद्र मोदी, महबूबा और अब्दुल्ला की आत्ममुग्धता को अच्छी तरह समझ चुके थे और इसका भी अनुभव हो चुका था कि गांधियों की तरह यह दोनों ही परिवार, जम्मू कश्मीर की गरीब जनता व उनकी संवेदनाओं से पूरी तरह कट चुके हैं। उनको यह पूर्ण विश्वास था कि अहंकारवश व अलगावाद को लेकर, दिल्ली में बैठी सरकार को ब्लैकमेल करने की पुरानी परंपरा निर्वाह करते हुए, पँचायत चुनाव का बहिष्कार कर, उसे विश्व के सामने असफल प्रयास के रूप में प्रचारित करने के लोभ से अपने को बचा नहीं पाएंगे।

इसका परिणाम यह हुआ कि जम्मू कश्मीर की दोनो राजनैतिक दलों ने इसमें भाग नहीं लिया और मोदी सरकार, राज्यपाल के शासन में सफलतापूर्वक चुनाव कराने में सफल हो गयी।

इस सफलता से उत्साहित राज्यपाल ने पंचायतों को विकास के लिए पहली बार सीधे पैसा पहुंचाया और यह भी निश्चित किया कि ज़िले के सभी विभागों के अधिकारी उन पंचायतों में पहुंच कर उनकी आवश्यकता के अनरूप विकास के कार्यों को शुरू करें।

जम्मू कश्मीर के इतिहास में यह एक ऐसा कदम था, जो पहले कभी नहीं हुआ था। इसी कदम ने कश्मीर की घाटी के गांवों में रहने वालों को बीजेपी शासन की कार्यपद्धति का संज्ञान हुआ और खुद केंद्र सरकार का सीधे कश्मीरियों से संवाद स्थापित हुआ था।

इसकी सफलता व राज्यपाल शासन में आंतरिक सुरक्षा पर पकड़ बना लेने के बाद, एक ऐसा भी क्षण आया था जब बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने 2019 के चुनाव से पहले ही जम्मू कश्मीर से धारा 370 के मूल में परिवर्तन व 35A हटाने का मन बना लिया था। लेकिन फरवरी 2019 में पुलवामा और फिर बालाकोट में हुए आक्रमण ने सभी समीकरणों को ही बदल डाला और इस कार्य को 2019 के चुनाव के बाद के लिए स्थगित कर दिया था।

2019 के चुनाव में जब नरेंद्र मोदी सरकार, और बड़े बहुमत से वापस आयी तब बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व से जो सुगबुगाहट मिल रही थी, उससे मुझे यह विश्वास हो चला था कि जम्मू कश्मीर में धारा 370 को लेकर काम अब 2020 में होगा। इसीलिए जब 5 अगस्त को धारा के पहले अनुच्छेद को छोड़ सभी को हटाया गया और राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेश में बांटा गया, तो यह घटना मेरे साथ साथ, विश्व के लिए अप्रत्याशित थी।

मोदी सरकार द्वारा दृढ़ता व आत्मविश्वास से लिये गये इस निर्णय से यह तो स्पष्ट हो गया था कि यह निर्णय भले ही भारत के भौगौलिक संप्रभुता के अधीन है लेकिन इसकी कड़ी वैश्विक राजनीति और भविष्य में होने वाले भौगोलिक पुनर्निर्माण से जुड़ी हुई है।

क्रमशः

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