…और चमक उठेगी भारतीय अर्थव्यवस्था

इस लेख में यह देखने का प्रयास करते हैं कि छोटे और मझोले व्यापारी और उद्यमी क्यों परेशान हैं? क्या कैश की क्राइसिस है और क्या डिमांड कम या आधी है? साथ ही यह भी आंकलन करेंगे कि कार, कमर्शियल व्हीकल सेल, और स्टील की बिक्री डाउन कैसे है।

पहले कैश की क्राइसिस लेते हैं। नोटबंदी के बाद सारा धन बैंकों में वापस आ गया है। चल, अचल संपत्ति – घर, दुकान, प्लाट, सोना, शेयर की वैल्यू, फिक्स्ड डिपाज़िट – में बढ़ोत्तरी ही हुई है। नए उद्यम लगातार खुल रहे हैं। अर्थव्यवस्था में वृद्धि हो रही है। फिर कैश की कमी की फीलिंग क्यों हो रही है?

इसका एक बहुत बड़ा कारण यह है कि माल्या, नीरव, जे पी ग्रुप, रूइआ, एस्सार इत्यादि पर बैंक डिफ़ॉल्ट और फ्रॉड के केस चल रहे हैं।

आमतौर पर छोटे व्यवसायों को शैडो बैंकिंग या गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (NBFC) – जैसे कि IL&FS – ऋण देती है। लेकिन IL&FS ख़राब लोन देने के कारण भरभरा के ढह गया। इस कंपनी का कुल बकाया कर्ज लगभग एक लाख करोड़ है।

इसका परिणाम यह हुआ कि लगभग हर बैंक के पास बकाया ऋण है, लेकिन लोन देने के लिए नया कैश नहीं है। हमारा और आप का छोटा कैश जो बैंक में जमा है, वह बैंक में उपलब्ध कुल कैश का चार प्रतिशत भी नहीं होगा जो बैंकों को RBI के पास रखना सुरक्षित रखना होता है।

एक तरह से बैंकों का बिज़नेस लोन से चलता है। मूल और ब्याज़ आता रहता है, जिससे वे नया लोन देते रहते हैं। अगर यह चक्र टूट जाए, तो नया लोन मिलना मुश्किल हो जाता है।

कैश की कमी का दूसरा कारण यह है कि भारत के शीर्ष 30 शहरों में लगभग 13 लाख घर और फ्लैट नहीं बिक पा रहे हैं। बिल्डर्स ने ग्राहकों का पैसा विमुद्रीकरण, आधार, GST के पहले के दौर में महँगी ज़मीन, महंगे लोन, घूस और फ्रॉड में लगा दिया था। अतः वे निर्माण को कम्पलीट नहीं कर पा रहे हैं, जिससे तीन तरफ (बैंक, बिल्डर और ग्राहक) का पैसा फंस गया है। विमुद्रीकरण, आधार, GST इत्यादि से काले धन का निवेश दुरूह हो गया है जिससे जो लोग काले धन का निवेश प्रॉपर्टी में करते थे, वे अब भाग गए है।

तभी वित्त मंत्री ने कुछ दिन पहले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को 70,000 करोड़ रुपये देने की घोषणा की जिससे बैंकों अतिरिक्त 5 लाख करोड़ रुपये तक का लोन (मूल, ब्याज और नए लोन के चक्र के द्वारा) कम ब्याज़ दर पर दे सकते हैं।

रही बात डिमांड की, तो व्हीकल की सेल में कमी आयी है। लेकिन व्हीकल की सेल अब सभी विकसित देशों में कम हो गयी है। एक कारण यह है कि अब हम शेयरिंग इकॉनमी के दौर में रह रहे हैं जहाँ कार (ओला, उबेर), साइकिल, मकान (OYO, AirBNB), डेटा, रसोई (क्लॉउड किचन), ऑफिस (WeWork – अमेरिका की सबसे बड़ी ऑफिस कंपनी जहाँ आप टाइम्स स्क्वायर पर एक घंटे के लिए भी ऑफिस किराए पर ले सकते हैं) – यहाँ तक की कपड़ा भी – शेयर हो रहा है। नयी पीढ़ी स्वामित्व में विश्वास नहीं करती।

GST के पहले भारत में 60 प्रतिशत समय ट्रक चलता ही नहीं था। कुल यात्रा का लगभग 15-20 प्रतिशत समय भोजन और विश्राम, टोल प्लाजा पर प्रतीक्षा लगभग 15 प्रतिशत; और यात्रा का लगभग एक चौथाई समय चेक पोस्ट पर इंतज़ार में गुज़र जाता था। एक तरह से पूँजी और लेबर का दुरुपयोग।

अब ट्रक लगभग 70-75 प्रतिशत समय चलता रहता है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि ट्रक के उपयोग में आयी कार्य कुशलता के अनुसार ढुलाई के लिए माल ही उपलब्ध न हो? फिर, मोदी सरकार ने गुड्स ट्रेन के लिए कुछ जगहों पर अलग से रेलवे लाइन बना दी है, कई ऐसी लाइने बन रही हैं; मौजूदा गुड्स ट्रेन में अतिरिक्त इंजिन लगाकर माल ढोने की क्षमता बढ़ाई जा रही है। ट्रक उद्योग को इन सभी के प्रभावों का आंकलन करना होगा।

अप्रैल-जुलाई 2019 के दौरान भारत में स्टील की खपत 33.706 मिलियन टन थी, जो एक साल पहले दर्ज किए गए इसी समय के दौरान 31.607 मिलियन टन से लगभग 6.6% अधिक थी। लेकिन अप्रैल-जुलाई 2018 की खपत 2017 के इन्हीं महीनों में देखे गए 28.820 मिलियन टन से 9.7% अधिक थी। दूसरे शब्दों में स्टील की खपत बढ़ रही है, लेकिन वृद्धि दर कम हो गयी है।

15 अगस्त को प्रधानमंत्री मोदी ने आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास पर 100 लाख करोड़ रूपए के निवेश की घोषणा कर दी है जिसका व्यापक प्रभाव स्टील और सीमेंट की खपत में देखने को मिलेगा।

भारत में पिछले महीने तक मानसून की वर्षा में भारी कमी दिखाई दे रही थी। आज पूरे भारत में मानसून अधिकता में है। इसके कारण आर्थिक गतिविधि में वृद्धि देखने को मिलेगी। वैसे भी अक्टूबर और नवंबर भारतीयों के त्योहारों से भरा हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी की नीतियां, रिज़र्व बैंक से आए हज़ारों करोड़ का अतिरिक्त बोनस तथा खुशियों और उत्साह से भरे हमारे उत्सव अर्थव्यवस्था को चमका देंगे।

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