भारत में आर्थिक मंदी की कहानी : भाग-1

आज की भारतीय अर्थव्यवस्था पर टिप्पणी करने से पहले कुछ तथ्यों को सामने रखना आवश्यक है।

स्वर्गीय वित्त मंत्री अरुण जेटली के अनुसार, वर्ष 2003-08 में वैश्विक अर्थव्यवस्था में तेजी का दौर देखा गया था जिसके कारण वैश्विक विकास में तेजी आई थी। अधिकांश अर्थव्यवस्थाएं अच्छा कर रही थीं और सभी उभरती अर्थव्यवस्थाओं ने उच्च विकास दर दिखाना शुरू कर दिया था।

सोनिया सरकार को 1991-2004 तक किये गए आर्थिक सुधारों का भी लाभ मिला था। वाजपेयी सरकार ने 2004 में 8% से अधिक की वृद्धि दर पर सत्ता सोनिया को सौंपी थी। चूंकि मांग अधिक थी, इसलिए निर्यात बढ़ रहा था, और इसलिए, भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए यह एक महान अवसर था।

सोनिया सरकार के दस वर्षो के दौरान कोई महत्वपूर्ण घरेलू सुधार नहीं किए गए थे। जब विकास दर कम हो गयी, तब सोनिया सरकार द्वारा दो महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। प्रथम, राजकोषीय (fiscal) अनुशासन से समझौता किया गया था और, द्वितीय, बैंकिंग प्रणाली को लापरवाही से ऋण देने के लिए प्रोत्साहित किया गया जिसने बैंकों को जोखिम में डाल दिया।

जब 2014 में यूपीए सत्ता से बाहर हो गई, तब पिछले तीन साल की जीडीपी विकास दर 2011-12 में 6.69%, 2012-13 में 4.47% और 2013-14 में 4.74% तक लुढ़क गई। वर्ष 2009-14 के दौरान मंहगाई दर 10.4% थी। पिछले तीन वर्षो (2016-19) से मंहगाई दर 4% से कम है।

सोनिया सरकार के पहले पांच वर्ष में बैंकों के लोन वृद्धि की दर 27 प्रतिशत से अधिक थी। अगले पांच वर्ष 17% थी। वाजपेयी सरकार के समय ने यह दर 18 प्रतिशत थी। मोदी सरकार के पहले पांच वर्ष में यह वृद्धि दर केवल 10 प्रतिशत थी। यह औसत भी इसलिए 10 पहुँच पाया क्योकि पिछले वर्ष वृद्धि दर 13% पार कर गयी थी।

ऐसा क्यों हुआ? क्योकि सोनिया सरकार के समय में दिल्ली से एक फोन के आधार पर उद्योगपतियों को लोन मिल जाते थे; यह नहीं देखा जाता था कि उनका उद्यम सक्षम है या वे लोन चुकाने की क्षमता रखते हैं।

अगर लोन चुकाने की क्षमता रखते भी थे, तो लोन चुकाने का इरादा नहीं था, क्योंकि उन्हें पता था कि वसूलने का तंत्र (सरकार, कानून, कोर्ट) पंगु था। फिर, उस लोन से दिल्ली को भारी चढ़ावा भी पहुँच जाता था। एक तरह से बैंकों का लोन क़ानूनी रूप से घूस लेने का सिस्टम बन गया था। परिणामस्वरूप, बैंकिंग व्यवस्था ध्वस्त होने के कगार पर पहुंच गयी थी।

इसी प्रकार, सोनिया सरकार ने 2009 का चुनाव जीतने के लिए वर्ष 2008-09 राजकोषीय घाटा एकाएक बढ़ाकर 6% कर दिया जो अगले वर्ष (2009-10) में 6.5% पहुँच गया।

सरल भाषा में, आमदनी 100 रुपये, खर्चा 106 रुपये। अगर इसे लाखों-करोड़ों रुपये के बजट के सन्दर्भ में देखे तो उस समय चार लाख करोड़ रुपये से अधिक का राजकोषीय घाटा था। जबकि कुल रक्षा बजट डेढ़ लाख करोड़ रुपये से भी कम था।

यह सब मानते है कि सोनिया सरकार ने 9 लाख करोड़ से अधिक का एनपीए (बैंकों का न चुकने वाला लोन) छोड़ा था, 1.44 लाख करोड़ रुपया ऑयल बॉन्ड (उधार पर तेल) का ऋण ले रखा था, 6.5 अरब डॉलर ईरान का बकाया छोड़ रखा है, और 34 लाख करोड़ रुपया ऋण के रूप में बांटा था।

यह लोन कौन चुकाता?

सरकार को अपने साधनों से परे लापरवाही से खर्च नहीं करना चाहिए। यदि वे ऐसा करते हैं, तो वे भविष्य की पीढ़ी को कर्ज में छोड़ देंगे। आने वाले वर्षों में विकास के लिए खर्च करने के बजाय, अर्थव्यवस्था केवल पुराने ऋण की सेवा करेगी, जो अब पाकिस्तान और वेनेज़ुएला कर रहे हैं।

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