सरल समाधान से मज़ा नहीं आता!

प्रसिद्ध चित्रकार पाबलो पिकासो से संबन्धित यह किस्सा पहले भी लिख चुका हूँ, आज इसका एंगल ज़रा अलग है। लेकिन इसके लिए किस्सा फिर से संक्षेप में ही, लेकिन भुगतना ज़रूरी है।

पिकासो तब प्रसिद्ध हुए थे और उनके चित्र महंगे दामों बिकते थे। तो हुआ यूं कि वे एक रैस्टौरां में गए थे खाना खाने। एक धनवान महिला ने उन्हें पहचाना और उनसे एक अलग से चित्र की मांग की।

पिकासो ने वहीं पड़ा एक डिनर नैप्किन उठाया और उससे लिपस्टिक मांगी। महिला ने भी खुशी से पर्स उलट दिया, चार-पाँच लिपस्टिक्स टेबल पर गिरी। पिकासो ने उन लिपस्टिक्स को लेकर ही एक चित्र बनाया और उसके नीचे अपनी विश्वप्रसिद्ध (वाकई थी) सिग्नेचर कर दी। फिर वो नैप्किन उस महिला के सामने अदा से धरा और बोले – इसके दस हज़ार डॉलर्स हुए, मदाम।

महिला उनका मुंह ताकती रह गयी। फिर बोली – आप को तो ये बनाने में तीस सेकंड भी नहीं लगे!

पिकासो ने शांति से उत्तर दिया – नहीं, मदाम, पूरे चालीस साल लगे हैं।

धारा 370 को लेकर भारत की जनता को यही कथा रट्टा मार कर याद रखनी चाहिए। पिछले पाँच सालों में भी यह मांग को लेकर क्या क्या ताने दिये जाते रहे। और वैसे तो जहां मेरा आंकलन रहा, क्रियान्वयन तो तीन सालों से शुरू हुआ जब सुरक्षा दलों के मार खाते वीडियो आने शुरू हुए। साथ साथ कई और तैयारियां करनी पड़ी है तब जाकर दूसरी इनिंग में फल आया है।

खास कर के याद हैं विरोधियों के ताने जिससे सोशल मीडिया पर राष्ट्रवादी उद्वेलित होना नहीं चूकते थे। वे तीली लगाकर फिर दूर से मज़े लेते थे इन पटाखों का । बीच बीच में लाफिंग इमोजी चेप कर तंज़ दर्ज करना इनका शौक रहा। अस्तु।

भविष्य के लिए यह याद रखा जाये। खास कर ये बात याद रखी जाये कि इतना समय हमारे ही एकता के अभाव के कारण तथा वैयक्तिक स्वार्थ के मुद्दों को लेकर शीघ्र बंट जाने का आभारी है।

संख्या प्रदर्शन का अभाव भी कारण है ही, जो कि विरोधियों की हथकंडा ताकत है, चुटकी में पचास हज़ार की भीड़ कहीं भी खड़ी हो जाती है। हमें संडे के अलावा समय नहीं मिलता और तब भी अगर मालकिन ने कहीं घूमने का मूड ज़ाहिर किया तो वो ही सर्वोच्च प्राथमिकता का मुद्दा हो जाता है।

मंदिर के मुद्दे पर इतने वर्षों के बाद एक रैली में जितने लोग आए थे उतने तो वहाँ दो दिन के नोटिस पर आ जाते हैं – शायद दो दिन भी ज़्यादह हो गया, आधा दिन भी उतने लोगों को काम छोड़कर आने को दिक्कत नहीं होती। स्वरोजगार उनके पंख हैं, हमने करियर को अपनी बेड़ी बना ली है, और मेरी बेड़ी सोने की है और तेरी लोहे की इसपर ही एक दूसरे को नीचा दिखाने में आनंद लेते रहते हैं।

मांगे बहुत हैं, लेकिन हर मांग पूरी करने में कई पापड़ कई साल बेलने पड़ते हैं तब जाकर हो पाता है। पाँच साल ब्यूरोक्रेसी और कोर्ट ने जनता को अपमानित करने का एक भी मौका नहीं छोड़ा। जहां भी हो, सरकार की भद्द पिटवाने का मौका नहीं छोड़ा। Sabotage करने का कोई मौका नहीं छोड़ा, और हम हर समय हिम्मत हारकर अपने ही दल को कोसते रहे। या कभी इनको ही हराने में खुद को ताकतवर समझते रहे। विरोधी हम से अलग नहीं थे, वही नाम, और कहीं नाते भी, लेकिन ताना मारने का मौका नहीं छोड़ा। साथ साथ प्रलोभन भी दिया जाता रहा कि साड्डे नाल रहोगे तो….

खैर, जो है सो है, सभी काम मोदी-शाह से नहीं होने वाले। लड़ाई पीढ़ियों की है और कम से कम हमें मैदान में उतरने का मौका तो मिला है। इसके पहले वह भी नहीं मिलता था। मोदी-शाह भी जाएँगे, अमर कोई नहीं। ‘उनके बाद क्या’, इस पर वे काम कर रहे हैं और हमारे विरोधी भी। सोचना है आप को, क्योंकि उतना समय तो मेरे पास भी बचा नहीं।

‘भारत की खोज’ लिखने वाले के पास भारत की सोच नहीं थी, इसलिए उसने तो भारत को लगभग खो ही दिया था। जाने दीजिये… भविष्य की सोचिए, मिलेनियम विज़न आवश्यक है वह भी आर्थिक और रणनीतिक। तभी टिक पाएंगे।

समृद्धि हमेशा युद्ध का न्योता है दूसरों को। इसलिए युद्ध-सन्नद्धता ही शांति रख सकती है। सन्नद्धता में निवेश आवश्यक है, जो भी युद्ध-सन्नद्धता की निंदा करता है वो या तो कायर है या भीतरघाती है। सर उठाकर वो ही जी सकता है जो आत्मगौरव के लिए लड़ने का माद्दा रखता हो। शांति के सभी फायदे उसी के साथ मिल सकते हैं।

अपने गरीबों को ऊपर उठने में साथ देना होगा ताकि वे हमारे साथ रहें। साधारण सी चीजें हैं लेकिन हमें मसलों को पेचीदा बनाने का ही शौक है तो सरल समाधान से मज़ा नहीं आता।

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