भक्त होने में भला क्यों न होगा गर्व

समुद्र की तरह गम्भीर गर्जन, जैसे दूर कहीं बादल गड़गड़ा रहे हों, सधी हुई वाणी, तर्जनी उठाकर समझाने का तरीका ऐसा… मानो वाणी से भी ज्यादा जवाब तो उनकी उँगली दे जाती है।

नरेंद्र मोदी के विराट व्यक्तित्व को छोड़ कर विचार करें तो अमित शाह निश्चय ही प्रकृति द्वारा भारत भूमि को दिया गया अमूल्य उपहार हैं!

इस चरित्र के जो आयाम दिख रहे हैं वह उनकी सम्पूर्ण क्षमता का दशांश भी नहीं है। आइसबर्ग की तरह।

भव्य ललाट पर छोटा सा तिलक, पारदर्शी उपनेत्र, सुंदर श्मश्रुमण्डल, सलीके से पहने शुभ्रवस्त्र, किसी ब्लैकहोल सी आंखें… कभी मासूम बच्चों जैसी भंगिमा में मधुर भाषण, कभी भीषण हुंकार से शत्रुदल की गर्भवती नारियों के गर्भस्राव करते दैत्य जैसे भयंकर… बहस करते और जवाब देते समय, सामने वाले के व्यक्तित्व पर पूरी तरह से हावी होकर, उसके प्रच्छन्न दिव्यत्व को उभारकर, उसमें छिपे असुरत्व को आतंकित कर… भीतरी पशुता का दमन करने वाली, एक भी निरर्थक शब्द के बिना, सटीक शब्दावली वाली संयत हिन्दी का ठिठकता अनुगूंज… अपनी संस्कृति, मानबिन्दुओं और महापुरुषों के मर्यादित चरित्र के प्रति अत्यंत समर्पण, बाबा सोमनाथ के अनन्य भक्त… और बस हो गए अमित शाह!

एक विषय को उठाना, फिर उसका विश्लेषण और उसके बाद अत्यंत सरल शब्दों में उसका एक दीर्घ वाक्य में जवाब… यह उनकी शैली है।

समुद्र से आती लहरों की तरह, जो हर आवर्तन में यह कौतुहल जगाती है कि इस बार न जाने क्या आने वाला है?

विशालकाय भव्य आकृति में इतनी सूक्ष्म बुद्धि कि छोटी से छोटी गलती को तुरंत पकड़ लेती है।

घात लगाए चीते की तरह नहीं, जो लपक कर पकड़ लेता है, अपितु इत्मीनान से बैठे शेर की तरह, जो जब भी पंजा मारता है, नीचे कुछ न कुछ चित्त पड़ा दिखाई देता है।

पूरे आत्मविश्वास से अपने शिकार का जायज़ा लेता है और उसका कोई भी एक छोटा सा हिस्सा पकड़ कर उठा कर पटक देता है।

वह ऊर्जा और समय के सदुपयोग और बचत में विश्वास करता है। उसे बिडाल की तरह अपने शिकार के साथ अठखेलियां पसंद नहीं।

जब सद्गति देनी ही है तो दे दो। कोई आडम्बर नहीं, कोई प्रदर्शन नहीं, इस बीच यदि कोई सहज हास्य या व्यंग्य का अवसर आया तो उसका भी प्रयोग करते हुए, स्मित हास्य में गम्भीरता बिखेरते हुए… अपना कार्य करने की अद्भुत कुशलता पाई है।

नरेंद्र मोदी के साथ उनकी गज़ब की केमिस्ट्री है।

किसी भारतीय धीरोदात्त चरित्र की भाँति, विषय में समरस होने की उनकी एकाग्रता शेषनाग को भी मात देती है। संवेदनशील विषय पर उनके भाव, शैली और शब्दचयन देखकर शारदा को भी ईर्ष्या होती है।

इतना सब कुछ होते हुए भी उनका धैर्य पृथ्वी जैसा है, तेज सूर्य जैसा है, शांति चन्द्रमा जैसी है, अविचलता पर्वत समान है, प्रवाह सरिता समान है, दृष्टि गिद्ध जैसी, झपट्टा बाज जैसा और उड़ान गरुड़ जैसी है।

आज करोड़ों देशवासियों को नरेंद्र मोदी में अपने घर के मुखिया जैसी छवि दिखती है तो अमित शाह किसी सधे हुए अभिभावक जैसे नज़र आते हैं।

न जाने कितने ही घात, आघात, प्रतिघात, अपमान, और अनुभवों के थपेड़े सहते सहते यह महाकाय किसी दिव्य योजना के अंश की तरह इस स्थान पर आकर विराजमान हो गया है।

भारतीयों! भक्त होने में क्यों न गर्व होगा?

राम के भक्त, हनुमानजी के भी तो बड़े भक्त जो होते हैं!

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