हर चीज़ का धर्म है यहां, बादलों का धर्म पानी बरसाना और आग का धर्म है जलाना

विदेशी सोच रखने वाले कैफे कॉफी डे के मालिक वी जी सिद्धार्थ ने एक बिज़नेस मॉडल बनाया। उन्होंने सोचा कि मैं मुख्यमंत्री का दामाद हूँ, बैंकों से आसानी से फाइनांस मिल जाएगा। मैं देश के हर गाँव शहर में रेस्टोरेंट खोल दूंगा। भारत के छोटे शहरों के लोग मेरे रेस्टोरेंट में 10 रुपये की एक कप कॉफी 100-200 रुपये में पीने आएंगे, साथ मे 400 रुपये प्लेट विदेशी स्नैक्स (गार्लिक ब्रेड, गौरमेट, फ्रोप्पे, टोसिज़्जा आदि) खाएंगे। खूब कमाई होगी।

मगर भारत की जनता की समझ और भारत की संस्कृति से दूर मिशनरी शिक्षित सिद्धार्थ का बिज़नेस मॉडल फेल हो गया। उन पर 1200 करोड़ का कर्ज हो गया था और इस तनाव को वे बर्दाश्त नहीं कर पाए। फलस्वरूप सिद्धार्थ ने आत्महत्या कर ली। वी जी सिद्धार्थ से ज्यादा अच्छी बिज़नेस समझ चाट फुल्की का ठेला लगाने वाला रखता है, उसे अपने कस्टमर की पसंद और जेब का सटीक अंदाज़ होता है।

ऐसे ही एक और बिज़नेस शख्स हैं, ज़ोमाटो वाले दीपिन्दर गोयल। विदेशी संस्कृति में जन्मे पढ़े हुए, इनको भारत के लोगो की पसंद और उनकी संस्कृति का कोई अंदाज़ नही। ये कहते हैं कि खाने का कोई धर्म नहीं होता। जबकि भारत में जैन भोजन, मारवाड़ी होटल, उडुपी होटल, वैष्णव भोजनालय, पारसी होटल, आदि सैकड़ों तरह के फ़ूड उपलब्ध है, वही हलाल, झटका, मुगलई आदि धार्मिक आधार पर अनेक भोजन शैलियां पाई जाती है। किसी धर्म में सुअर का मांस वर्जित है तो किसी धर्म में गाय का।

भारत में आज भी समाज का बड़ा वर्ग भोजन में शुचिता को महत्व देता है। अपने घर के किचन में शुद्धता से बनाये खाने को भारतीय ज्यादा महत्व देता है न कि बाहर के खाने को।

फ़ूड डिलीवर कंपनियों के विदेशी सोच रखने वाले मालिक सोचते हैं कि 130 करोड़ की जनसंख्या वाले देश मे हमें 50 करोड़ ग्राहक आसानी से मिल जाएंगे जो अपनी पाक रसोई में खाना न बना कर हमसे रोज रोज खाना मंगवाएंगे। खूब कमाई होगी।

समाज और संस्कृति की समझ न होने के कारण इन कंपनियों को ग्राहक की पसंद और संस्कृति का कोई आइडिया नहीं। फलस्वरूप स्विग्गी ज़ोमाटो आदि का घाटा साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है।

ज़ोमाटो का घाटा 2012 -13 में 10 करोड़ था, जो 2013 -14 में 41 करोड़, 2014 -15 में 136 करोड़ हो गया था। 2018-19 में ज़ोमाटो का घाटा 295 मिलियन डॉलर अर्थात 2000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा हो गया है।

घाटे के कारण कंपनी ने सस्ते डिलेवरी बॉय रखना शुरू किए। जो लड़के पंचर बनाने, रुई धुनने, कसाई खाने में काम करके बड़ी मुश्किल से 5 हज़ार महीना कमा पाते थे, अब वही लाल ड्रेस पहन कर बाइक से चलते है, 10 हज़ार रुपये कमा लेते हैं और मल्टीनेशनल कंपनी के डिलीवरी बॉय कहलाते है।

घाटे, कर्ज़ और तनाव के कारण कंपनी का प्रोमोटर व फाउंडर दीपिन्दर गोयल का दिमाग पागलपन की सीमा की ओर जा रहा है। इन्होंने 2017 में एक द्विअर्थी MC BC विज्ञापन निकाला था, जिसकी खूब आलोचना हुई और इनको माफी मांग कर विज्ञापन हटाना पड़ा। इनके खिलाफ 500 छोटे रेस्टोरेंटों ने मोनोपोली और धोखे का कोर्ट केस भी कर रखा है।

अगर आपके लाखों ग्राहकों में से शुचिता को महत्व देने वाले एक ग्राहक ने किसी एक दिन फूड डिलीवरी बॉय को धर्म के आधार पर नापसंद कर दिया तो कंपनी पर कौन सा पहाड़ टूट गया था। चुपचाप अपना व्यापार देखो।

मगर इनको राई का पहाड़ बना कर खुद को सेकुलर बताना था। सो इन्होंने उस ग्राहक को रिट्वीट कर देश की जनता को नया ज्ञान दिया कि खाने का कोई धर्म नही होता। इनको न तो धर्म की परिभाषा मालूम है और न ही ज्ञान। बादलों का धर्म पानी बरसाना है, आग का धर्म जलाना है। हर चीज़ का धर्म है यहां।

दीपिन्दर गोयल भी वी जी सिद्धार्थ की राह पर चल पड़े हैं। 2000 करोड़ के घाटे से भी अक्ल नहीं आ रही। कहीं ये भी कुछ गलत न कर बैठें। भगवान इन्हें सद्बुद्धि दे।

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