आप अपनी बताएं! मैंने तो काँग्रेस का घोषणापत्र पढ़कर दिया था भाजपा को वोट

हम लोग सब से अधिक मेहनत, असफलता का ठीकरा फोड़ने के लिए व्यक्ति तलाशने की करते हैं। एक बार सर्व सहमति से व्यक्ति तय हो गया कि बस वो ही सार्वजनिक कूड़ेदान बन जाता है जिसमें हर कोई, अपने आक्षेपों का कूड़ा फेंक कर आता है।

एक ही बात को समझ लेना आवश्यक है। भाजपा या मोदी को जिस बात से फर्क पड़ सकता था वह एक ही बात थी। वो था आप का वोट, जो आप दे चुके। अब वो लाख नाकारा निकले, घर बैठे नेट पर गालियां देना ब्रॉयलरों का कोलाहल मात्र है।

हर समस्या एक ही प्रश्न पूछती है – अब आप क्या करोगे? जहां कई बार simulation से टेस्ट किया जाता है वहाँ भी यही क्षमता की जांच होती है – अब आप क्या करोगे? मोबाइल या लैपटॉप पर आप जो वीडियो गेम खेलते हैं, वहाँ भी यही सवाल होता है – अब आप क्या करोगे?

यहाँ एक स्वयं बहुत ही करीब से देखी हुई बात याद आती है। निजता के कारण नाम नहीं लेने। पति पत्नी और तीन संतान। दो पुत्र और एक पुत्री। मंझला बेटा माँ का विशेष लाड़ला और वैसे कई बातों में कमज़ोर भी था।

कमज़ोरी का कारण माँ का उसका बचाव करना भी था क्योंकि वे उसकी अपनी ज़िद थी, जो किंचित कठोरता से तोड़ी जाती तो कमज़ोरी नहीं रहती। अक्षर गंदा था, आप लिखे खुदा बाँचे टाइप का, ऊपर से लेखनी पकड़ने की एक विचित्र सी पद्धति, जिससे अक्षर अच्छा आता तो चमत्कार कहलाता। उसके उपरांत वेल ड्रेस्ड रहना पसंद नहीं, बाल सँवारे रखना पसंद नहीं। पिता सरकारी कर्मचारी थे, जान पहचान अच्छी थी। मामा अच्छी कंपनी में थे।

इनकी माँ को ऐसे लोग मिले जो हमेशा उसको भरमाते रहे कि तुम्हारे पति/ भाई को तुम्हारे बेटे की नौकरी लगानी चाहिए। पति और भाई ने कई लोगों को नौकरी लगाई भी थी जिसका उदाहरण दे कर टोकते रहे कि ये दोनों दुनिया भर के लोगों की नौकरी लगाते हैं, अपने खून की क्यों नहीं।

यहाँ इन दोनों की दुविधा ये थी कि ये लड़के के ऐब जानते थे। पता था कि लोग एक हद तक ही लिहाज करेंगे, फिर मामला बिगड़ जाएगा। और ऊपर से अपना खून। दुखती रग की बीमारी लगा लेना नहीं चाहते थे दोनों। दूसरों को लगाया था तो कोई टेंशन नहीं थी। काम पसंद नहीं आया तो निकाल दो, पूछना क्या ?

फिर कहीं एक दवाई की कंपनी में सेल्समन लगे, लेकिन ड्रेस कोड न पालने के कारण निकाले गए। फिर कहीं किसी सेमी गवर्नमेंट उपक्रम में सेल्समैन लगे, वह कंपनी कुछ सालों बाद बंद हुई।

इनकी माताजी ने मुझे भी बताया था और अपने पतिदेव और भाई को बहुत गालियां निकाली थी। मैंने उन दोनों ला पक्ष लिया तो मेरा वहाँ जाना बंद हो गया। बाद में पता चला कि नौकरी जाने से ये सदमे में चले गए और उसी में चल बसे।

उनकी बहन कहीं अचानक मिल गयी तो उनसे पता चला। बहन का भी कहना था कि उनकी माँ कड़क रहती तो यह नहीं होता। लेकिन उनकी माताजी को तो ऐसे लोगों का साथ पसंद था जो भाई को लेकर उनके पिताजी और मामाजी को कोसे, और कहें कि दुर्बल की ही तो सहायता करनी चाहिए। मैं और बड़े भैया तो अपने दम पर खड़े हो गए, तो माँ को भाई से अधिक प्यार आता और वे भाई की ढाल बन जाती। क्या पाया अंत में?

मोदी के नाम रोनेवालों से यही कहना है – चलिये, मान लीजिये नाकारा निकला मोदी और उससे भी नाकारा निकली भाजपा। खुश? लेकिन उनको गाली दे कर समस्या हल होती थोड़े ही है? आप के दरवाजे पर आन खड़ी है समस्या!

अब आप क्या करोगे?

मेरी कहूँ तो मैंने मोदी जी को डिस्टर्बंस मुक्त समय दिलाने के लिए वोट दिया था। मेरी मेहनत हुई, काम नहीं हुआ। मेरी मेहनत चालू रहेगी, काम होगा या नहीं देखा जाएगा।

कर्मण्येवाधिकारस्ते।

बाकी मैंने मोदी जी को या और किसी भाजपा नेता को कभी हिन्दुत्व के मुद्दे पर वोट मांगते देखा या सुना नहीं और न ही घोषणापत्र में ऐसा था। आप ने देखा या सुना होगा तो पंद्रह लाख वाला वीडियो भी आप के पास होगा ही। धर्म का काम समाज का, सरकार का नहीं होता। समाज इसी लिए सरकार को लाता है ताकि सरकार धर्म के काम में आड़े न आए। लेकिन हम पड़े रहकर सरकार को ऑर्डर देना चाहते हैं कि ये करो और वो करो। “इनको वोट भी दो और लड़ो भी खुद?” इस सवाल को हिंदुओं को बेचने में भाजपा के विरोधी बहुत सफल हुए हैं।

मैंने तो काँग्रेस का घोषणापत्र पढ़कर भाजपा को वोट दिया था, आप अपनी बताएं।

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