सोशल मीडिया के धुरंधरों, औकात हो तो समझ लो

जैसे ज्ञानियों के ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती है, वैसे ही सोशल मीडिया के धुरंधरों के कनफ़्यूजन और मानसिक अस्थिरता की भी कोई सीमा नहीं है।

ख़ुद निष्क्रिय बैठे रहने और कुछ न करने के लिए दूसरों की आलोचना करने में अधिकांश लोग निपुण हैं।

जब केरल में बाढ़ आई, तो मदद करने की बजाय कुछ लोग सोशल मीडिया पर अभियान चला रहे थे कि केरल में सब जिहादी हैं और वहाँ वामपंथी सरकार है, इसलिए बाढ़ में उनकी कोई मदद न की जाए।

कुछ महीनों बाद सबरीमला वाला विवाद हुआ, तब केरल के लोगों का संघर्ष देखकर वही लोग सोशल मीडिया पर बताने लगे कि केरल वाले ही सच्चे हिन्दू हैं!

इन दिनों असम में बाढ़ आई हुई है। पिछले हफ़्ते लगभग रोज़ ही यहाँ सैकड़ों लोग पोस्ट लिख-लिखकर हिमा दास को मेडल जीतने पर बधाइयाँ दे रहे थे और उसे भारत की बेटी बता रहे थे। लेकिन इस बात को लगभग सभी ने बड़े आराम से अनदेखा कर दिया कि उसी हिमा दास के राज्य में लाखों लोग बाढ़ से उजड़ गए हैं और उसने अपील भी की है कि आप लोग मदद करें।

क्या आपने सिर्फ़ उसको बधाई देकर लाइक बटोरे या असम के लोगों की मदद के लिए वाक़ई कुछ किया भी? या इस बार बहाना ये है कि असम में सिर्फ़ बांग्लादेशी घुसपैठिए रहते हैं, इसलिए मदद न की जाए?

मोदी जी तो सोशल मीडिया वीरों के परमानेंट टार्गेट हैं। आजकल सबका विश्वास के बहाने उनकी आलोचना करने का ट्रेंड चल रहा है।

अच्छी बात ये है कि मोदी जी ऐसी बातों पर कोई ध्यान नहीं देते हैं। वैसे भी जो आदमी पिछले 17 सालों से आलोचना ही झेल रहा है और जिसे हत्यारा, हिटलर, तानाशाह, फेंकू, नीच आदि न जाने क्या क्या कहा जा चुका है, उसे अब नोबल पुरस्कार का लालची भी कह दिया जाए, तो उसे फ़र्क़ पड़ने वाला नहीं है।

मेरी जो राय पहले थी, वही आज भी क़ायम है कि मोदी जी जहाँ हैं और जैसे हैं, उस स्थिति और परिस्थिति में बिल्कुल ठीक काम कर रहे हैं। समस्या की जड़ मोदी नहीं है, समस्या की जड़ ये है कि शिकायत करने वाले चाहते हैं कि उन्हें ख़ुद कुछ भी न करना पड़े, सब-कुछ मोदी ही करे। हर शिकायत का मूल अंततः यही है।

मेरा सुझाव है कि शिकायत का पिटारा खोलने से पहले धूल साफ़ करके ज़रा आईना देख लीजिए। उसके बाद असम के बाढ़ पीड़ितों के लिए कुछ योगदान कीजिए। और उसके बाद अपनी शिकायतें और उनके समाधान के लिए सुझाव लिखकर प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजिए।

मोदी जी न तो आपकी फ़्रेंड लिस्ट में शामिल हैं और न अपना कामकाज छोड़कर आपकी पोस्ट पढ़ने बैठते हैं। इसलिए रोज़ सुबह शाम यहाँ मोदी-मोदी चिल्लाना अनावश्यक भी है और हास्यास्पद भी।

नोट :

  1. मैं असम के मुख्यमंत्री राहत कोष में आर्थिक योगदान भिजवा चुका हूँ। सोशल मीडिया पर कोरे उपदेश देने की बजाय मैं हमेशा ही कुछ वास्तविक प्रयासों में सहयोग देता हूँ। वही मैंने इस बार भी किया है।
  2. जो पिछले हफ़्ते लिखा था, वही फिर से दोहरा रहा हूँ : आप मोदी-शाह को पहचानने में अभी भी ग़लती कर रहे हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यवहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति मेकिंग इंडिया (makingindiaonline.in) उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार मेकिंग इंडिया के नहीं हैं, तथा मेकिंग इंडिया उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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