अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का निर्णय : भारत और कुलभूषण जाधव का सत्य

जब से हेग से यह समाचार मीडिया में आया है कि पाकिस्तान में बंदी, भारतीय नागरिक व पूर्व नेवी कमांडर कुलभूषण जाधव की फांसी पर रोक लग गयी है और वहां स्थित अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने 15-1 से भारत के पक्ष में निर्णय दिया है, तब से भारतीय सरकार को बधाइयां मिल रही हैं व मीडिया से लेकर सोशल मीडिया में हर व्यक्ति दिवाली मना रहा है।

इसी के सापेक्ष पाकिस्तान में भी उनकी सरकार ताल ठोक कर इस निर्णय को अपनी जीत बता रही है और उनकी मीडिया व सोशल मीडिया ईद मना रही है। बड़ा विचित्र विरोधाभास है और यह पहली बार देख रहा हूँ कि एक ही निर्णय को लेकर, दोनों तरफ, भारत व पाकिस्तान में स्वागत हो रहा है।

मैं समझता हूँ कि भारत व पाकिस्तान में दोनों ही तरफ ब्रेकिंग न्यूज़ की हैडलाइन पर नाचने और रोने वालों की भरमार हो गयी है। मुझे लगता है कि दोनों ही तरफ जो लोग खुश हो रहे है, वे इस न्यायिक मामले की ऊपरी सतह को देख रहे है और उसमे अपनी अपनी खुशी ढूंढ रहे है।

जहां तक मेरा प्रश्न है, मैं कुलभूषण जाधव के मामले पर 2016 से ही बड़ी बारीक दृष्टि रखे हूँ और पूर्व में, इस पर दो-तीन बार इस विषय पर लिखा भी है। मैं आज एक बार फिर बड़े तटस्थ भाव से यह कह सकता हूँ मेरे लिए कुलभूषण जाधव का मामला संवेदनशील अवश्य है लेकिन मेरे लिए कुलभूषण जाधव को लेकर अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के परिदृश्य में भारत द्वारा दूरगामी परिणामों के लिए लाभ लेने में उसका सफल होना ज्यादा है।

भारत में ज्यादातर उल्लास इस बात का मनाया जा रहा है कि अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के निर्णय के बाद कुलभूषण जाधव बच जाएंगे और सकुशल भारत वापस लौट आएंगे। लेकिन मैं ऐसे किसी भ्रम में नहीं जी रहा हूँ क्योंकि मेरे लिए कुलभूषण जाधव (एक भारतीय होने के नाते मेरी उनसे और उनके परिवार से सहानभूति है), जीवन और मृत्यु की परिधि से निकल कर, भारत के इतिहास के एक गौरवमयी अध्याय बन चुके हैं।

कुलभूषण जाधव अब सिर्फ एक व्यक्ति नहीं है, वह भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण एशिया में होने वाले राजनीतिक और भौगोलिक बदलाव के एक चरण बन चुके हैं। आज इससे फर्क नहीं पड़ता है कि वह जीवित हैं या रहेंगे। आज इससे भी फर्क नहीं पड़ता की वे जीवित भारत वापस आएंगे या फिर पाकिस्तान में ही शहीद कर दिए जाएंगे।

यदि जीवन व मृत्यु की परिधि से अलग हट कर हेग से आये निर्णय की विवेचना की जाए तो व्यक्तिगत रुप से मुझे अन्य लोगों की तरह प्रसन्नता तो नहीं है, लेकिन है, इस निर्णय से संतोष है।

मेरे पास यह सब कहने के पीछे ठोस कारण है। क्या जनमानस को कुलभूषण जाधव को लेकर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में चल रहे वाद के मूल बिंदु मालूम है? चलिए देखते हैं कि वास्तविकता में, भारत और पाकिस्तान दोनों ही जगह क्यों पटाखे फोड़े जा रहे हैं।

जब पाकिस्तान की सैन्य अदालत ने जासूसी और आतंकवादी गतिविधियों के लिए भारतीय नागरिक व पूर्व नेवी कमांडर कुलभूषण जाधव, जिन्हें विवादास्पद तरीके से पाकिस्तान की सीमा में पकड़ा दिखाया गया था, को मृत्यु दंड दिया गया था, तब भारत ने कुलभूषण के भारत का जासूस होने का इनकार किया और मृत्युदंड के निर्णय के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय इस मामले को लेकर गया था।

भारत ने 4 मुख्य मांगों को सामने रखा था, पहला कि मृत्युदंड के निर्णय को निरस्त किया जाए, दूसरा नये सिरे से मुकदमा चले (सैन्य अदालत से अलग), तीसरा भारतीय राजनयिकों को कुलभूषण जाधव से मिलने दिया जाए और चौथा कि कुलभूषण को भारत भेजा जाए।

पाकिस्तान ने भारतीय मांग का विरोध करते दो बातों पर ज़ोर दिया था। पहला कि यह कुलभूषण जाधव का मामला अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की परिधि से बाहर है और दूसरा जो उसकी सैन्य अदालत ने निर्णय दिया है, वह यथावत रहे।

अब तटस्थ भाव से अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का निर्णय पढ़ें तो उन्होंने कहा है कि यह मामला उनकी परिधि में आता है, जो पाकिस्तान की हार है और भारत के राजनयिकों को कुलभूषण जाधव से मिलने दिया जाए और पूरे मामले का पाकिस्तान पुनरावलोकन करे, यह भारत की जीत है। इस के बाद भी पाकिस्तान जीत का दावा इस लिए कर रहा है क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने कुलभूषण जाधव को छोड़े जाने की भारत की मांग को नहीं स्वीकारा है।

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने पूरा मामला वियना कन्वेंशन के आधार पर सुना है। अपने निर्णय देने का मुख्य आधार उन्होंने पाकिस्तान द्वारा वियना संधि की अवेहलना करना बताया है। इसीलिए पाकिस्तानी सैन्य न्यायालय द्वारा सुनाए गए निर्णय पर कोई निर्णय नहीं दिया है क्योंकि वह उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। पाकिस्तान ने क्योंकि वियना संधि का पालन नहीं किया था, इसलिये 15-1 (यह एक विरोधी पाकिस्तानी न्यायाधीश है) से यह निर्णय भारत के हक में आया है।

जितना मैं समझ पाया हूँ, उससे यही लगता है कि भारत के राजनयिक कुलभूषण जाधव से मिलेंगे और भारत में इस संदेह का अंत करेंगे कि कुलभूषण जीवित नहीं है। लेकिन क्या कुलभूषण, पाकिस्तानी न्यायालय द्वारा पुनरावलोकन किये जाने पर, मृत्युदंड की सज़ा से बचेंगे, उसकी मैं उम्मीद नहीं करता हूँ। इसका कारण यह है कि पाकिस्तान का कोई भी न्यायालय, भले साक्ष्य हों या न हों, मृत्युदंड के निर्णय को नहीं बदल सकता है, क्योंकि यह प्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तानी सैनिक नेतृत्व की हार होगी और इसके परिणामस्वरूप, पाकिस्तान के तन्त्र पर उनकी अजगरी जकड़ कसमसा जाएगी।

मेरा आंकलन है कि कुलभूषण जाधव अब अंतर्राष्ट्रीय शतरंज की बिसात में वह मोहरा है, जिससे भारत ने पाकिस्तान को शह दी है। मैं, इससे ज्यादा नहीं समझता हूँ क्योंकि मेरे लिये सामरिक केन्द्रवत कूटनीति और उससे जुड़ी हुयी गुप्तचारिता ऐसे विषय हैं, जिनमें भावना का कोई स्थान नहीं होता है। यह ऐसे विषय हैं जिन्हें राष्ट्र द्वारा निर्धारित वैश्विक नीति के परिप्रेक्ष्य में ही देखा और समझा जा सकता है। इसमें न कुछ गलत होता है और न सही, क्योंकि इसका एक मात्र उद्देश्य, राष्ट्र द्वारा निर्धारित दूरगामी लक्ष्य को प्राप्त करना होता है।

अब, इस सबके बाद पाकिस्तान, कुलभूषण जाधव को सज़ा सुनाने से आगे जाकर, उसे फांसी देने की हिम्मत कर पायेगा, उसमें मुझे संदेह है। इसका कारण यह है कि इस सबके बाद भी मृत्युदंड दिया जाना, पाकिस्तान के लिए व्यवहारिक रूप से बहुत भारी पड़ेगा। हां, यह अवश्य है कि पाकिस्तान, कुलभूषण जाधव को एक मोहरे की तरह इस्तेमाल कर, भारत को पाकिस्तान से फिर से बातचीत शुरू किए जाने को बाध्य करने की अपेक्षा कर सकता है। लेकिन मेरी अंतर्राष्ट्रीय मामलों की समझ यही कह रही है कि कुलभूषण जाधव को लेकर भारत कोई कमज़ोरी नहीं दिखायेगा।

आज के भारत के लिए, कुलभूषण जाधव एक संकल्प है। यह संकल्प यही है कि भारत की सरकार, विदेश में फंसे या फँसाये गये, हर भारतीय नागरिक की सुरक्षा व उनकी वापसी के लिए, बिना परिणाम की चिंता किये कटिबद्ध है। यह जो बिल्ली चूहे का खेल चला है, यह कुलभूषण जाधव को जीवित भारत आने देगा कि नहीं, यह भविष्य ही बतायेगा।

मेरा सुझाव तो यही है कि सब लोग शांत बैठें और इस बात को लेकर भारत को सराहें कि मोदी सरकार, भारत की प्रथम ऐसी सरकार है, जो विश्व में अपने नागरिकों की रक्षा के लिए, सभी उपलब्ध माध्यमों और कूटनीति का उपयोग करती है।

हमारे सामने सर्बजीत का जीता जागता उदाहरण है कि जब वह इन्ही परिस्थितियों में पाकिस्तान द्वारा आरोपित किया गया था तब तत्कालीन सोनिया गांधी की कांग्रेस की यूपीए सरकार द्वारा, उसको बचाने का कोई सार्थक प्रयास नहीं किया था और उसके परिणामस्वरूप सर्बजीत को पाकिस्तान की जेल में ही मार डाला गया था।

आज सर्बजीत की बहन भी यही कह रही है कि जो आज मोदी सरकार, कुलभूषण जाधव के लिए सब कुछ कर रही है यदि वही उसके भाई के लिए किया गया होता, तो परिणाम दूसरे होते।

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