‘ब्राह्मण’ विधायक और ‘दलित की जीत’ जैसी फिल्मी स्टोरी ढूँढने वालों से तो बहस ही क्या करना?

आठ प्रकार के विवाहों में 5वां है गन्धर्व विवाह, और वह अधम श्रेणी का विवाह है।

मनुष्य की बुद्धि परिपक्व होने की आयु 50 वर्ष है, उससे पूर्व लिया गया निर्णय सदोष हो सकता है।

किन्तु लड़कियों को तो 14-15 वर्ष से ही नर की जरूरत अनुभव होने लगती है। 18वां वर्ष वर चयन का नहीं अपितु वर के साथ रहने का कानूनी प्रावधान है। चयन की प्रक्रिया वह इससे पूर्व ही शुरू कर सकती है।

अगर 5 साल की बच्ची को मनमर्जी पर छोड़ दिया जाए तो वह चॉकलेट चुनेगी।

10 साल की बच्ची गुड़िया, टॉफी, खिलौने, सेलफोन आदि चुनेगी।

15 वर्ष की बच्ची का निर्णय भी दुनिया की नज़र में कोई खास परिपक्व नहीं होता।

18 ही नहीं, 30-35 वर्ष की महिलाएं भी अपनी प्राथमिकता और ज़रूरत तय करने में गलती कर सकती है।

अतः विवाह जैसा महत्त्वपूर्ण निर्णय 50 वर्ष पार के लोग, सभी पहलुओं पर विचार कर करते हैं। भारतीय समाजों में 99.9% रिश्ते ऐसे ही तय होते हैं और वे आश्चर्यजनक रूप से सफल होते हैं, जबकि लगभग 1000 में से एक मामला प्रेम विवाह का होता है और उनमें भी 70%से ज्यादा विवाह सफल नहीं होते, वहाँ तलाक, डिप्रेशन, परित्याग, ड्रग सेवन और विवाहेतर सम्बन्धों की भरमार होती है।

या तो समाज में इतना खुलापन हो कि आरम्भ से ही नर-नारी पशुओं की तरह साथ रहे, कोई व्यंग्य-उपालम्भ नहीं हो और साथ ही लड़कियों को इतना योग्य और कुशल बनाया जाए कि वे इस सम्बंध में सही निर्णय ले सकें, या फिर परम्परागत तरीके से गुरुजनों की सहमति और सहयोग से सम्बंध तय हो।

दुर्भाग्य से कानून स्वयं एक बहुत बड़ी विडंबना लेकर चल रहा है। 18 वर्ष से छोटे बच्चे साथ रह सकते हैं, सम्बन्ध बना सकते हैं, मगर विवाह नहीं कर सकते। इस नियम की आड़ में बाज़ार अपना खेल खेलता है।

उसने प्यार नामक एक भ्रामक शब्द की स्थापना की है। बहुत सारे बुद्धिजीवी और लगभग सारी महिलाएं, इस प्यार नामक कल्पना लोक में विचरण करती हैं जो कि सिवाय भ्रम और संवेगात्मक क्षुधा के और कुछ नहीं है।

कठोर से कठोर लड़की को भी कुछ दिन की प्रक्रिया से पिघलाया जा सकता है और वह इसके बाद कुछ भी कर सकती है। यह पक्षियों को फंदे में फंसाने जितना ही सरल है। अत्यंत संस्कारी लड़की को भी भागने के लिए तैयार किया जा सकता है।

इस बीच, मुम्बइया फिल्में, टीवी सीरियल, विज्ञापन, वेबसीरीज़ और वयस्क चलचित्र, निरन्तर इन्हें कथित प्यार की मानसिकता के लिए उत्प्रेरित करता रहता है।

इंद्रियभोग का तो ऐसा है कि जब तक भड़की हुई अग्नि शांत नहीं होती, उसे अन्य कुछ सूझता ही नहीं। अपनी भोगेच्छा शांत करने के लिए इंद्रियों का स्वामी मन विविध इंद्रजाल बुनता रहता है और प्राणी इसे प्यार समझकर भटकता रहता है।

जेनरेशन गैप के मारे अभिभावक जब तक कुछ समझें, देर हो चुकी होती है।

खैर…

जब लड़की है तो विवाह भी करेगी, भोग भी करेगी और परिवार भी बनेगा, तो ऐसे में जो सर्वश्रेष्ठ मार्ग है वही अपनाना चाहिए। सभ्य, संस्कारी, जीवन में बड़ा लक्ष्य लेकर चलने वाले, एकाग्रचित्त युवक इन पचड़ों में पड़ते नहीं क्योंकि उन्हें बहुत आगे जाना होता है, तो जो लफंगे, आवारा, शातिर और कामुक लड़के होते हैं वे इनमें सिद्धहस्त होते हैं और बाज़ी मार लेते हैं।

अगर भारत में कोई ऐसी कानूनन छूट का नियम आ जाए कि कोई व्यक्ति कितने ही जीवन साथी रख सकता है, तो अनेक लोगों को कुंवारे ही मरना पड़ेगा क्योंकि मुगलकाल की हरम और कोठे वाली परम्परा बनते देर नहीं लगेगी।

यही भारत की सच्चाई है। जिन पुत्रियों के बाप ‘प्यार’ और ‘प्रेम-विवाह’ के नरेटिव पर लहालोट हो रहे हैं, उन्हें जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए। तनिक 50वां वर्ष बीत जाने दो, फिर मुझसे बात करना। इज्ज़त और बिटिया आपकी है। घात लगाए भेड़िए घूम रहे हैं। भोगेच्छाओं को भड़काने वाली आंधी भी चल रही है और दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। वे तो प्रकरण को सुनकर, एक आँख दबा कर साइड में से निकल जाने हैं।

स्वामी विवेकानंद ने कहा था “महिलाओं के विषय में पुरुषों को इतना ही अधिकार है कि वे उन्हें ‘अच्छी महिला’ बनने का अवसर प्रदान कर दे, उन्हें इतना योग्य बनाओ कि वे अपना निर्णय ठीक से ले सकें। शेष पंचायती उन्हें ही करने दो।”

फिलहाल जब ऐसा माहौल है कि कहाँ प्यार हो रहा है, कहाँ वासना का खेल है, कहाँ ज़बर्दस्ती हो रही है, और कहाँ मात्र छेड़छाड़ है, इसका ही निर्णय नहीं है।

जैसे प्यार वाले मामले में भ्रम है वैसे ही, जो इस घटना में बीजेपी का ‘ब्राह्मण’ विधायक और ‘दलित की जीत’ जैसी फिल्मी स्टोरी ढूंढ रहे हैं वे तो बौद्धिक धरातल पर अत्यंत निम्न स्तर पर खड़े हैं, उनसे तो बहस ही क्या करना?

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