सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रोहिंग्याओं को शरणार्थी दर्जा देने की याचिका का स्वीकारना और हिंदुओं की उदासीनता

हम हिन्दुओं की, विशेषतः जो कट्टर व हिंदुत्व पर मर मिटने की प्रतिज्ञा करते हैं, उनकी सबसे बड़ी समस्या यही है कि वे अपनी ऊर्जा या तो कूप मंडूप बने दूसरों को ज्ञान देने में या फिर हर बात पर अपने ही नेतृत्व की विषमताओं को समझे बिना, आलोचना में व्यर्थ करते हैं।

हम हिन्दू, अपनी आज की स्थिति के लिए सबको दोष देते हैं लेकिन कभी भी स्वयं में झांक कर अपनी ही अकर्मण्यता, नपुंसकता व उदासीनता की विवेचना नहीं करते हैं। मैं समझता हूँ कि हमारी नस्ल ही अभिशप्त है, जो 800 वर्ष की दासता में पूर्णतः निर्लज्ज, आलोचक और स्वार्थी हो गयी है।

यदि ऐसा नहीं है तो फिर क्या कारण है कि जब कोई व्यक्ति आगे आकर, भारत और उसके हिन्दुओं के हित के लिए, आगे बढ़ कर, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के विरुद्ध पीआईएल करना चाहता है और ज्यादा से ज्यादा लोगों से, बिना किसी धन के, उसमें सहभागी होने का आह्वान करता है, तो लोग विमुख क्यों है?

अपनी बात को समझाने के लिए मैं आपको इसकी पृष्ठभूमि समझाता हूँ। मुझे आशा है कि सभी कट्टर हिंदूवादियों के संज्ञान में यह तो होगा ही कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने रोहिंग्याओं की एक पीआईएल स्वीकार की है, जिसमें कहा गया है कि भारत में अवैध रुप से घुसे रोहिंग्याओं का भारत से प्रत्यर्पण न किया जाय बल्कि उन्हें शरणार्थी का दर्जा दिया जाय ताकि उनकी अवैधता समाप्त हो सके।

इस पीआईएल के पीछे वही लोग हैं जिन्हें हम हिंदुत्व व भारत के सबसे बड़े विरोधी और शत्रु के रूप में चिह्नित करते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय के इस कदम पर पूरे भारत में या तो मौन धर्म का पालन हो रहा है, या फिर भारत की मोदी सरकार की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा की जा रही है। लगता हमने अपने अस्तित्व की रक्षा व उसके स्वार्थपूरिता का भी भार, अपनी अंतरात्मा से निकाल कर, अपने दिए गए वोट की कीमत के खाते में डाल दिया है।

ऐसे में विभोर आनंद ने, इस याचिका के स्वीकार किये जाने पर सर्वोच्च न्यायालय के विरुद्ध पीआईएल करने का निर्णय लिया और उन्होंने 2 दिन पूर्व सर्वोच्च न्यायायलय को भारत के नागरिकों के आक्रोश से अवगत कराने के लिए, आह्वान किया था कि कम से कम 1 लाख भारतीय उन्हें अपना नाम व पता दें ताकि वे भी उनकी पीआईएल के सहभागी बन सकें।

भारत के लोगों की मानसिकता को देखते हुए, विभोर ने अपने आह्वान में यह भी स्पष्ट कर दिया था, कि जो सहभागी बनेंगे उन्हें कोई धन नहीं देना होगा और न ही उनको सर्वोच्च न्यायालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का कोई कष्ट करना पड़ेगा।

विभोर ने यह आह्वान, फेसबुक और ट्विटर के माध्यम से किया था।

अब मैं आता हूँ, अपनी कही बात पर।

भारत के लोगों को, विशेषतः हिन्दुओं को तो अवैध घुसपैठियों की समस्या का तो पूरा ज्ञान है। इसको लेकर लोग नित्य प्रतिदिन अवैध रूप से रह रहे बंगलादेशियों और रोहंगियाओं को लेकर चिंतन और सरकार की आलोचना भी करते है।

एक तरफ मोदी सरकार इस समस्या से निपटने के लिए प्रयासरत है तो दूसरी तरह, उसके विरुद्ध पूरा लिबरल वामी इस्लामी गिरोह भी पूरी तरह सक्रिय है। यह सब, हिंदुत्व व राष्ट्रवादी विचारधारा को तोड़ने के लिए, भारत में घुसे अवैध घुसपैठियों को धर्म व मानवता के आवरण में समर्थन देने को कटिबद्ध है।

आपको क्या लगता है कि ऐसे वातावरण में, विभोर के आह्वान पर हिंदुओं द्वारा उनसे बिना किसी धन की आशा व कष्ट की अपेक्षा के, समर्थन की मांग करने पर, समर्थन की बाढ़ ज़रूर आ गयी होगी?

दु:ख से यही कहना है कि यदि ऐसा हुआ होता तो मैं यह लेख ही नही लिखता। विभोर के आह्वान के 48 घण्टे के बाद उनको 1300 लोगों का समर्थन प्राप्त हुआ है। एक अरब 30 करोड़ के भारत मे सिर्फ 1300 लोग? है न, हमारे लिए शर्मिंदगी की बात?

बात सिर्फ इतनी ही होती तो मैं हिंदुओं के कर्णधारों के लिए इतनी आलोचना नहीं करता लेकिन इस शर्मिंदगी से आगे, हम लोगों के लिए सबसे लज्जित होने वाली बात यह है कि इन 1300 भारतीयों में रोहिंगियाओं के विरुद्ध विभोर आनंद को समर्थन देने उतरे लोगों मे 550 मुसलमान है! यदि यह सांख्यकी भी हम लोगों मे अपमानित होने का भाव नहीं जगा रहा है तो वाकई हिन्दुओं को विलुप्तप्राय समझ लेना चाहिए।

इन 550 मुस्लिमों को अवैध रोहिंगियाओं के भारत में वैधता प्राप्त हो जाने पर, भविष्य की आशंकाओं को लेकर ज्यादा जागरूकता है। ये जानते हैं कि सरकार जिन संसाधनों को इन्हें दे रही है, उस पर कल ग्रहण लगेगा और उनका ही हक मारा जाएगा। वे यह भी जानते है कि रोहिंगियाओं के रहते, भारत मे धर्माधारित संघर्ष बढ़ता जाएगा और भविष्य में टकराव का कारण रोहिंग्या बनेंगे। रोहिंग्या उनके लिए दोधारी तलवार हैं।

आप लोग रोहिंगियाओं के विरुद्ध इन 550 मुसलमानों के कारणों की मीमांसा भविष्य में करते रहिएगा लेकिन वर्तमान तो यही बता रहा है कि हिन्दुओं की स्थिति के लिए भारत की सरकार नहीं बल्कि स्वयं हिन्दू ही उत्तरदायी हैं।

मैंने तो विभोर आनंद की पीआईएल को अपना समर्थन दे दिया है लेकिन मैं आप लोगों से अपनी आने वाली पीढ़ी के अस्तित्व को बनाये रखने के लिए आह्वान करता हूँ कि सर्वोच्च न्यायालय के विरुद्ध इस पीआईएल में सहभागी बनें और अपनी संगठित शक्ति का प्रदर्शन करें।

इसके लिए अपना पूरा नाम व पता पिनकोड सहित, विभोर आनंद के फेसबुक एकाउंट, ट्विटर हैंडल @Vibhor_anand और व्हाट्सएप नम्बर 9599918722 पर दे सकते है।

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