प्रधानमंत्री मोदी और 5 ट्रिलियन डॉलर की भारतीय अर्थव्यवस्था – भाग 1

बीती 6 जुलाई को वाराणसी में भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने सरल भाषा में यह समझाया कि कैसे 5 ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी भारतीयों को समृद्ध बना देगी और कैसे वह इस लक्ष्य को प्राप्त करेंगे। उनका पूरा सम्बोधन इसी विषय पर केंद्रित था।

उन्होंने पूछा कि आखिर 5 ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी के लक्ष्य का मतलब क्या है? फिर जवाब दिया कि 5 ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी का मतलब होता है 5 लाख करोड़ डॉलर। और अगर रुपयों में बात करें तो समझिए कि उसका भी 65 -70 गुना। दूसरे शब्दों में कहें तो आज हमारी अर्थव्यवस्था का जो आकार है उसका लगभग दोगुना।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि अंग्रेज़ी में कहावत होती है – size of the cake matters – जितना बड़ा केक होगा, उसका उतना ही बड़ा हिस्सा लोगों को नसीब होगा। हमने भारत की अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य तय किया है क्योंकि अर्थव्यवस्था का साइज़ और आकार जितना बड़ा होगा. स्वाभाविक रूप से देश की समृद्धि उतनी ही ज्यादा होगी। हमारे यहां गुजराती में कहावत है कि अगर कुएं में पानी है तो फिर खेत तक पानी पहुंचेगा।

यही समृद्धि हर परिवार की, हर व्यक्ति की आय और जीवन स्तर में भी परिवर्तन लाती है। सीधी सी बात है कि परिवारों की आमदनी जितनी ज़्यादा होगी, परिवार के सदस्यों की आमदनी उसी अनुपात में अधिक होगी और उनकी सुख सुविधाओं का स्तर भी उसी अनुपात में ऊंचा होगा।

आज जितने भी विकसित देश हैं, उनमें ज़्यादातर के इतिहास को देखें तो एक समय में वहां भी प्रति व्यक्ति आय बहुत ज़्यादा नहीं होती थी। लेकिन इन देशों के इतिहास में एक दौर ऐसा आया जब कुछ ही समय में प्रति व्यक्ति आय ने ज़बरदस्त छलांग लगाई। यही वह समय था जब वे विकासशील से विकसित देश बन गए।

भारत भी लंबा इंतज़ार नहीं कर सकता है। हम भी ऐसा कर सकते हैं। आज जब भारत दुनिया का सबसे युवा देश है तो यह लक्ष्य भी मुश्किल नहीं है। जब किसी भी देश में प्रति व्यक्ति आय बढ़ती है तो वह खरीदने की क्षमता बढ़ाती है। इससे मांग बढ़ती है, जिससे सामान का उत्पादन बढ़ता है। सेवा (जैसे रेस्टोरेंट, पर्यटन, होटल, टैक्सी, बैंकिंग, हेयर सैलून इत्यादि) का विस्तार होता है। और इसी क्रम में रोज़गार के नए अवसर बनते हैं। यही प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि उस परिवार की बचत या सेविंग को भी बढ़ाती है।

प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार, जब तक हम कम आय के चक्कर में फंसे रहते हैं, तब तक यह प्रगति पाना बहुत मुश्किल होता है। और पता नहीं किस कारण से हमारे दिल-दिमाग में गरीबी एक virtue (गुण या सदाचार) बन गयी है।

कभी हम सत्यनारायण कथा सुनते थे बचपन में। शुरू क्या होता था? एक बेचारा गरीब ब्राह्मण से शुरू होता था। याने गरीबी में गर्व करना हमारी मनोवैज्ञानिक अवस्था बन गई थी। देश को उससे बाहर लाना चाहिए। सपने बड़े देखने चाहिए। सपनों को पूरा करने के लिए संकल्प करना चाहिए और जी जान से जुटना चाहिए, पसीना बहाना चाहिए।

मेरा भी यह मानना है कि हम भारतीयों के मन में निर्धनता के प्रति सद्भाव कूट-कूटकर भर दिया गया था। हम दरिद्रनारायण में विश्वास करते हैं। निर्धनता को एक सद्गुण के रूप में देखते हैं।

आज मुझे इस बात का एहसास होता है कि हम निर्धन इसलिए नहीं थे कि यह हमारी किस्मत में था, बल्कि हम निर्धन इसलिए रह गए कि पहले मुगलों और अंग्रेज़ों ने लूटा, और उसके बाद अंग्रेजों के उत्तराधिकारी शासकों – कांग्रेसियों – ने हमें जानबूझकर गरीब रखा बनाए रखा। ‘गरीबी हटाओ’ के नारे का झुनझुना पकड़ा के हमारे पैसे को लूटकर अपने आप को समृद्ध किया।

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