दोषी कौन?

कभी सोचा है आप सबने कि एक अल्पसंख्यक की हत्या जितनी तूल पकड़ती है, उतनी किसी बहुसंख्यक की हत्या सुर्खी नहीं बटोर पाती है।

गुजरात के दंगों में हलाक हुई आबादी का दर्द, गोधरा स्टेशन पर रेल के डब्बों में जली लाशों की वीभत्सता को ऐसे ढँक देता है जैसे डब्बे में इन्सान नहीं पीवीआर में फ़िल्म शो के इण्टर्वल के लिये पॉपकार्न भूने गये हों।

रोहिंग्या शरणार्थियों की दुर्दशा पर छलकती बरसाती आँखें, कश्मीरी पंडितों के विस्थापन पर इस तरह तोताचश्म होकर आँखें फेरती हैं जैसे वे पण्डित या तो अपने हिन्दू होने के गुनाहों के एवज़ में अफ़्सपा के तहत तड़ीपार हुए हों या 6 दिन 7 रातों के हनीमून पैकेज पर थाइलैंड गये हों।

एक पैगम्बर का कार्टून बनने पर शार्ली एब्दो के खिलाफ़ आतिशबाज़ी पर पूर्ण समर्थन वाली भीड़ तो दिखती है पर हुसेन साहब की एक डूडलिंग को सरस्वती नाम देने पर उस कदर हंगामा क्यों नहीं बरपा जाता?

और यही वज़ह है कि आज तक फिर से वैसा कार्टून फिर कोई कलात्मक आज़ादी का हिमायती नहीं बना पाया जबकि दस हाथों वाली एक लड़की के हाथों जाम सर्व करते हुए एक विदेशी मदिरा का एड आता रहा…

और ज़्यादा क्या कहना, कई देशभक्तों के घर में Hindware का हिन्द लिखा हुआ पश्चिमी कमोड है या वाश बेसिन, जिस में रोज़ थूकते और नित्य क्रिया करते हैं और देशभक्ति पर लम्बा व्याख्यान भी देते हैं।

क्यों निर्भया या दामिनी का असली नाम नारी अस्मिता के नाम पर छिपाया जाता है, पर आसिफ़ा के नाम पर मोम बत्तियाँ असली नाम से ही जलाई जा रही हैं? क्यों ए ई एस के नाम पर हंगामा बरपाने वाली भीड़ के जाँबाज़ सर दर्द और खाँसी बुखार की गोली मेडिकल स्टोर वाले भैय्या से लेकर राज्य की चिकित्सा व्यवस्था को रोते हैं?

तो जवाब पाने से पहले एक कहानी सुनिये…

एक बार एक मनोचिकित्सक ने एक बर्तन में एक मेंढक को डाला और धीरे धीरे उस बर्तन को अंगीठी पर चढ़ा कर गर्म करना शुरू किया। पहले तो मेंढक थोड़ा बहुत हिलता डुलता रहा पर उसने बाहर छलाँग लगाने की कोशिश नहीं की, लेकिन जब पानी ज़्यादा गर्म होने लगा तो देखते ही देखते मेंढक पानी में उबल कर मर गया।

अब मनोचिकित्सक ने पूछा कि मेंढक की मौत की वज़ह क्या थी? कुछ दर्शकों ने पानी की गर्मी को कारण बताया तो कुछ ने मेंढक के दुर्भाग्य को।

आखिर में मनोचिकित्सक ने बताया कि मेंढक अपनी मौत की वज़ह खुद था। कारण – जब वह छलाँग लगा सकता था तब तो उसने अपनी ऊर्जा गर्म पानी के साथ एडजस्टमेण्ट में लगा दी। और जब मामला नाकाबिल ए बर्दाश्त हो गया और उसने छलाँग लगाने की सोची भी, तब तक काफ़ी देर हो चुकी थी।

ताकत तो बर्बाद होगी, चाहे आप बर्दाश्त करें या मुसीबत को खत्म करने की कोशिश। मेंढक ने सोल्युशन के बदले टॉलरेन्स या एडजस्टमेण्ट में ताकत लगाई इस लिये वह अपनी मौत का जिम्मेवार खुद हुआ।

कभी मेंढक के बदले हिन्दू को रख कर देखिये, आपको ऊपर के सभी मामलों की वज़ह मालूम हो जायेगी। हमारा हिन्दू समाज सहिष्णु बनने में बड़ा गर्व अनुभव करता है क्योंकि सहिष्णु बनने में कुछ करना नहीं पड़ता है जबकि अपना ऐतराज़ जताने के लिये जान की बाज़ियां तक लगानी पड़ती हैं।

किसी मंदिर को बनाने की शपथ खाकर आयी पार्टी के मुखिया को अपने संसदीय क्षेत्र में सौन्दर्यीकरण के वास्ते टूटते मन्दिरों की कोई चिन्ता नहीं होती और चुनाव के समय जाग्रत हिन्दू समाज भी उदासीनता की प्रतिमूर्ति बन कर बैठा रहता है जबकि मन्दिर के भग्न होने या जीर्णोद्धार होने की स्थिति में मूर्तियों की पुनरस्थापना की धर्मसंगत व्यवस्था है पर हम उदासीन, आलसी और एडजस्टेवल बिहेवियर के सनातनी को इस बात से क्या लेना।

मंदिर टूटे, पर मूर्तियों और शिवलिंगों का क्या हुआ कौन बताये और कोई क्यों पूछे? हम तो आरामतलबी की वज़ह से वक्त आने पर “मन चंगा तो कठौती में गंगा” के वाहक हैं और गुस्सा आये तो वामपन्थी बनकर सरकार से “नमामि गंगे” प्रोजेक्ट की बैलेन्स शीट माँगने की ज़िद में तूफ़ान उठा देते हैं।

जबकि अन्य मतावलम्बी अपनी छोटी समस्या को भी राष्ट्रीय मुद्दा बनाना नहीं भूलते। यही वज़ह है कि हमें अटारी याद नहीं है पर बाघा बॉर्डर जानते हैं। वे अपनी हर एक छोटी बड़ी पहचान को राष्ट्रीय पटल पर रखते हैं जबकि हम “मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना” गाते गाते एक जुलूस की वज़ह से अपनी विजया दशमी की मूर्ति विसर्जन यात्रा की राह बदल देते है या स्थगित कर देते हैं।

हम दर असल मेंढक बन चुके हैं जो पानी की गर्मी के साथ अपने को एडजस्ट करने में उम्र खपा देता है और जब प्रतिकार या प्रतिक्रिया का मौका आता है तो अपनी निष्क्रियता का रोना रोते हुए वक्त को कोसने लगते हैं।

कुछ समुदाय तो अपने रिवाज़ के मुताबिक स्वपत्नी-परित्याग-प्रक्रिया या परित्यक्ता-पत्नी-पुनर्ग्रहण-प्रक्रिया की अमानवीयता के खिलाफ़ उठी संवैधानिक पहल के खिलाफ़ भी कोर्ट में आस्था का मुद्दा लिये डटे हुए हैं पर हम तो शिखा तिलक को पिछड़ेपन की पहचान मानते हुए ये उम्मीद करते हैं कि कोई और धर्मनिरपेक्षता को निभाते हुए मस्ज़िद की टूटी मीनारों पर राम लला का दर्शन करा दे।

हर सभ्यता अपनी जड़ों की ओर बढ़ने का प्रयास करती है। इस्लाम फ़ारसी को, अरबी को जिलाये बैठा है तो यहूदी हिब्रू को पुनर्जन्म दिलाकर अपने राष्ट्रभाषा बनाये हुए हैं। अंग्रेज़ी के पैरोकार लैटिन के खजाने से शब्दों के मोती चुन कर ईसाइयत का खज़ाना भर रहे हैं पर हम हिन्दू हिन्दी को पिछड़ी ज़ुबान मान कर अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों में अपने वंशजों की शिक्षा दीक्षा करवा रहे है और संस्कॄत को शादी और श्राद्ध की भाषा बनाये बैठे हैं।

मज़े की बात यह है कि पश्चिम के सभी विश्वविद्यालयों में संस्कृत विभाग गर्वान्वित छात्रों से अटा पड़ा है और हम तो रसोई घर को भी किचन बनाये बैठे हैं। वे अपनी कामयाबी की उम्मीद में ‘इन्शाअल्लाह’ और ‘ओ माय गॉड’ कहते हैं जबकि हम ‘टच वुड’ कह कर पर भरोसा जताते हैं।

आपको बता दिया जाना ज़रूरी है कि कर्ण को दुर्योधन की दोस्ती या द्रौपदी के अपमान या अर्जुन की वीरता की वज़ह से हारना या मरना नहीं पड़ा था बल्कि इसका कारण कीड़े के द्वारा काटने पर भी अपनी निष्क्रियता दिखाने की वज़ह से उसकी मृत्यु की पटकथा उसके अपने हाथों से ही लिखी गई थी।

मेरा यही मानना है कि अगर उस समय कर्ण दर्द से छटपटाया होता तो शायद गुरु भी उसकी वज़ह जानकर उसे माफ़ करते और महाभारत का भी कोई और निष्कर्ष निकला होता… कम से कम 18 अक्षौहिणी सेनायें मौत के घाट न उतरतीं। भीष्म, द्रोण, विदुर आदि के मौन ने चीरहरण की पृष्ठभूमि तैयार की तो कौशल्या, सुमित्रा, राम, हनुमान और दशरथ के मौन ने सीता की जीवित समाधि का रंगमंच सजाया।

समय पर मौन रहना, अपनी कायरता को सहिष्णुता की चादर उढ़ाना है और कुछ नहीं। मौन की नीरवता ही शान्ति का नाश कर देती है। हमारे प्राचीन ग्रन्थ कहते हैं कि “नास्ति जागरिते भयम्” अर्थात् जगे हुए को भय नहीं होता है और आप भी ये मानेंगे कि जो अपनी आवाज़ हो रहे अन्याय के खिलाफ़ नहीं उठा सकता उसे सोया हुआ ही मानिये। और सोये हुए इन्सान को तो सपने का शेर भी डरा सकता है। आखिरी वक्त पर उठने वाली आवाज़ और आखिरी हिचकी में ज्यादा फ़र्क नहीं होता है।

इस लिये बस फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की एक नज़्म से इस आलेख का समापन करता हूँ…

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे

बोल ज़बाँ अब तक तेरी है

तेरा सुत्वाँ जिस्म है तेरा

बोल कि जाँ अब तक तेरी है

देख कि आहन-गर की दुकाँ में

तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन

खुलने लगे क़ुफ़्लों के दहाने

फैला हर इक ज़ंजीर का दामन

बोल ये थोड़ा वक़्त बहुत है

जिस्म ओ ज़बाँ की मौत से पहले

बोल कि सच ज़िंदा है अब तक

बोल जो कुछ कहना है कह ले।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यवहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति मेकिंग इंडिया (makingindiaonline.in) उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार मेकिंग इंडिया के नहीं हैं, तथा मेकिंग इंडिया उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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