किस का कैसा कितना दबाव… बता रही है बंगाल के सांसदों की सक्रियता

हाल ही में सम्पन्न लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में भाजपा के 18 सांसद जीते हैं।

क्या उनमें से कोई एक भी सांसद यह दावा कर सकता है कि मैं प्रधानमंत्री मोदी के नाम और काम के बजाय अपने दम पर चुनाव जीता हूं?

शायद नहीं। लेकिन पश्चिम बंगाल के वो 18 सांसद बंगाल में ममता बनर्जी की तुगलकी नीति और नीयत के खिलाफ भीषण राजनीतिक सामाजिक संघर्ष कर रहे हैं। इसके लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। ममता बनर्जी की राजनीतिक प्रशासनिक बौखलाहट स्वयं इसका प्रमाण दे रही है।

संसद के भीतर गरज रहे बंगाल के उन 18 सांसदों की रणभेरी बंगाल के गांवों तक गूंज रही है। जो जनता पिछले 7-8 वर्षों से ‘कटमनी’ सरीखे राजनीतिक अत्याचार/ महापाप को मौन रहकर सह रही थी। हिन्दू पर्वों त्योहारों पर भांति भांति के औरंगजेबी प्रतिबंधों का कहर चुपचाप झेल रही थी। वही जनता अब ममता बनर्जी के उन अत्याचारों के विरुद्ध गांव-गांव में सैकड़ों जत्थों में खुलकर बगावत कर रही है। मुखर होकर मीडिया में ममता गैंग के उन कुकर्मों की पोल खोल रही है।

बंगाल की खबरें बता रहीं हैं कि ममता बनर्जी द्वारा TMC की स्थानीय इकाइयों के नाम पर तैयार की गई गुण्डों की फौज के अधिकांश गुंडे चुनाव के बाद अचानक आक्रामक और बगावती हुए जनता के तेवरों के कारण आजकल अपना घरद्वार छोड़कर भागने के लिए मजबूर हो रहे हैं।

ज़रा सोचिए कि आखिर क्या कारण है कि जो जनता पिछले 7 सालों से डरी दबी सहमी हुई थी, वही जनता चुनाव के बाद अचानक इतनी आक्रमक कैसे हो गयी है? उसे शक्ति और साहस कौन प्रदान कर रहा है?

जवाब बहुत सीधा और सरल है। प्रधानमंत्री मोदी या राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह वहां जाकर ताल नहीं ठोक रहे। इसके बजाय बंगाल के वो 18 सांसद और भाजपा के स्थानीय संगठन के नेता लोकसभा चुनाव जीतने के बाद यह सोचकर शांत हो कर नहीं बैठ गए हैं कि “अब जो करेगा मोदी करेगा। हम तो अब मौज लेंगे।”

सांसदों समेत बंगाल की इसी भाजपाई फौज ने ममता बनर्जी की हिन्दूद्रोही मुस्लिम परस्ती के खिलाफ भी खुलकर मोर्चा खोल रखा है। उनकी इसी सक्रियता का परिणाम है कि वो ममता बनर्जी अब वंदेमातरम मातरम, जय काली, जय जगन्नाथ और “भारत माता की जय” का नारा सार्वजनिक मंचों से चिल्ला चिल्लाकर लगा रही है, जिन्हें इन नारों से सख्त एलर्जी थी।

‘जय श्रीराम’ के नारे के खिलाफ हिरण्यकश्यपी मुद्रा बना लेनेवाली ममता बनर्जी परसों सम्पन्न जगन्नाथ यात्रा में ‘जय श्रीराम’ के नारों की गूंज में भी मुस्कुराते हुए खड़ी रही। ममता बनर्जी अब खुद को सबसे बड़ा हिन्दू घोषित करने में जुटी हुई है। यह बंगाल की भाजपाई फौज के संघर्ष का ही परिणाम है।

बंगाल की खबरों पर थोड़ा ध्यान केंद्रित करेंगे तो मेरी बात की पुष्टि हो जाएगी। दरअसल बंगाल के वो 18 सांसद और स्थानीय नेता यह बहाना बनाकर मौज उड़ाने में नहीं जुट गए कि… ‘क्योंकि मोदी ने मना किया है इसलिए ममता बनर्जी की हिन्दू द्रोही मुस्लिम परस्ती के खिलाफ ना बोलेंगे ना लड़ेंगे।’ दरअसल मोदी ने ऐसा कुछ कहा भी नहीं है। यदि यह सच होता तो क्या बंगाल में भाजपा सांसदों/ नेताओं/ कार्यकर्ताओं की सक्रियता प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ विद्रोह कर के जारी है?

नहीं, ऐसा नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा “विश्वास जीतने” की बात का अर्थ यह नहीं था कि दंगाइयों बलवाइयों के खिलाफ भी चुप्पी साध लो। यदि ऐसा होता तो यूपी में दंगाइयों बलवाइयों की खोपड़ी और पीठ पर योगी सरकार की पुलिस का लट्ठ नगाड़ा नहीं बज रहा होता।

संसद की कार्रवाई देखिए या बंगाल में आंदोलित जनता से सम्बंधित खबरें पढ़िए। आप पाएंगे कि बंगाल के उन 18 सांसदों में जो 2 महिलाएं हैं। तीसरी राज्यसभा सदस्य रूपा गांगुली ने अपनी सक्रियता से ममता बनर्जी की नाक में सर्वाधिक दम कर रखा है। इनके अलावा बहुत कम अन्तर से चुनाव हारी श्रीरूपा चौधरी सरीखी महिलाएं भी ममता बनर्जी की तानाशाही के खिलाफ ईंट से ईंट बजा रही हैं।

अतः अति संवेदनशील अवसर पर निर्लज्जता और नकारे निकम्मेपन का कुत्सित कीर्तिमान बना रहे दिल्ली के नकारा सिद्ध हो रहे सांसदों का बचाव इस बहाने से मत कीजिये कि… वो मोदी के दबाव में हैं। उन्हें मोदी ने मना किया है।

और किसी से नहीं, तो कम से कम बंगाल की इन 4 महिला भाजपा नेताओं से ही कुछ सीख लें दिल्ली के सातों नाकारा सांसद…!!!

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