ज़रा गुजरात वालों से तो पूछ लें कि 2002 में किया क्या था मोदी ने

कुछ लोगों को लगता है कि 2002 में नरेंद्र मोदी ने फोन करके पुलिस को ही भेजा था पूरे गुजरात के शांतिप्रिय सम्प्रदाय के लोगों को मारने के लिए… और अब मोदी जी बदल गए हैं!

जिनको नहीं पता है वो ज़रा गुजरात वालों से पूछ तो लें कि 2002 में नरेंद्र मोदी ने किया क्या था?

कल एक मित्र कह रहे थे कि चांदनी चौक जैसी घटनाओं का विरोध हिन्दू इसलिए नहीं करते हैं… क्योंकि जब हिन्दू प्रतिउत्तर देने निकलता है तो प्रशासन कर्फ्यू लगा देता है और पुलिस हिंदुओं को ही पकड़ लेती है…

बिल्कुल सही बात है। प्रशासन ऐसा ही करता है क्योंकि प्रेमपूर्ण व्यवहार के प्रदर्शन की शुरुआत तो शांतिदूत ही करते हैं… पुलिस को जब तक सूचना मिलती है और वो घटनास्थल पर पहुँचती है तब तक घटना हो चुकी रहती है… अब प्रतिक्रिया देने वाले सामने होते हैं और क्रिया करने वाले घटनास्थल से गायब हो चुके होते हैं।

पुलिस को जो सामने दिखाई देता है उसको ही पकड़ कर ले जाती है खाना पूर्ति करने।

परिणामस्वरूप दोनों तरफ की मार हिंदुओं को ही पड़ती है।

2002 में अहमदाबाद में दंगे के समय नरेंद्र मोदी स्वयं डंडा ले के नहीं निकले थे… उन्होंने वही किया जो दशकों पहले भैरोसिंह शेखावत करके बता चुके थे।

पुलिस को असली उत्पातियों को पकड़ने का निर्देश दिया… परिणाम ये रहा कि हिंदुओं को भी प्रतिक्रिया देने का अवसर मिल गया।

हिन्दू इससे ही प्रसन्न हो गए और शांतिदूतों के अंदर पकड़े जाने का भय समा गया… बस इसके बाद हर दूसरे दिन होने वाले दंगों से अहमदाबाद को मुक्ति मिल गयी।

आज भी सरकार वही कर रही है पर आप लोगों को तो जनरल डायर या हिटलर चाहिए!

आप 2002 वाले उस मोदी को ढूंढ रहे हैं जो मीडिया ने बताया, और मीडिया सच को अपने झूठ के आवरण में लपेट कर कैसे परोसता है… जानते तो हैं ही पर समय पर पहचानते नहीं हैं।

2014 के पहले गुजरात से प्रवासी मज़दूर जब यूपी-बिहार, उड़ीसा या एमपी जाते थे न… तो वहाँ ये नहीं बताते थे कि मोदी मुल्लों को डंडा ले कर दौड़ाते हैं और गुजरात से बाहर खदेड़ देते हैं… वो कहते थे कि गुजरात में क्राइम नहीं है, बिजली नहीं जाती है, सड़कें अच्छी हैं… सरकारी काम आसानी से हो जाते हैं… संक्षेप में कह सकते हैं कि गुजरात में प्रशासन अच्छा है… विकास हो रहा है।

गाँव वालों ने प्रशंसा सुनकर अच्छे प्रशासन और विकास की आशा में ही वोट दिया था।

2019 में भी गांवों के अधिकांश वोट मोदी सरकार की अच्छी योजनाओं से प्रभावित हो कर ही मिले हैं।

जिन लोगों को लगता है कि यदि नरेंद्र मोदी विश्वास जीतने का प्रयास करेंगे तो भारत पाकिस्तान या बांग्लादेश बन जाएगा… उन लोगों को याद रखना चाहिए कि मोदी जैसे अभी हैं वैसे ही गुजरात में भी थे…

मोदी 12 वर्ष मुख्यमंत्री रहे पर गुजरात तो बांग्ला देश नहीं बना, ममता बनर्जी ने 8 वर्षों में ही बना दिया है… यदि हिंदुओ को बचाना है तो बंगाल और केरल के मुख्यमंत्री के विरुद्ध आंदोलन शुरू करिए न… उनकी आलोचना कीजिये, उनको ट्रोल करिए… उनको दिखाइए न अपने लेखनी की शक्ति…

जिसने अपने को प्रमाणित किया है उसके प्रति आपको संदेह है… जो प्रत्यक्ष दिख रहा है उससे आपको कोई शिकायत नहीं है!

इसको समझदारी की पराकाष्ठा ही कहा जा सकता है।

अपने घरवालों को इसलिए गरियाते हैं ताकि वो बिगड़ न जाए… मोहल्ले के बिगड़े हुए से दस हाथ की दूरी बना कर रखते हैं, वो हिन्दू नहीं-नहीं कट्टर राष्ट्रवादी हिन्दू कहलाते हैं।

समझदारी के ढेर पर बैठे देश के ऐसे शुभचिंतकों को सवा सेर नमन तो मेरा प्रतिदिन रहता ही है… आगे भी रहेगा क्योंकि न ये बदलेंगे, न मैं।

इन लोगों ने पाँच महीने भी नरेंद्र मोदी पर भरोसा नहीं किया और मैं पिछले सत्रह वर्षों से उनपर भरोसा किए बैठी हूँ।

मैंने बारह वर्षों तक गुजरात को बदलते देखा है… पिछले पाँच वर्षों में देश में भी बदलाव देखा है पर नरेंद्र मोदी को कभी बदलते नहीं देखा है।

गृहणी हूँ, भोजन के लिए जब भात बनाती हूँ तब चावल के एक-एक दाने को चेक नहीं करती हूँ… इसलिए नरेंद्र मोदी के एक-एक ट्वीट के आधार पर उनको जज नहीं करती हूँ।

2002 के ‘मीडियाकृत’ मोदी को ढूँढने वाले निराश थे, हैं, और रहेंगे।

जिस मोदी के प्रति आपको शंका है कि भारत को वो काश्मीर बना देंगे… उसी मोदी के शासनकाल में काश्मीर का वातावरण बदलने लगा है… कश्मीरी पंडितों की वापसी शुरू हो चुकी है।

विडंबना ही है कि जो काश्मीर में हिंदुओं को बसा रहा है… उस पर ही मुल्लापरस्ती का आरोप लगाया जा रहा है।

हद है… मने हद ही है।

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