गुलामी में सोये हुए थे, आज़ादी के बाद तो आंखें खोल कर सो रहे बुद्धिजीवी!

कई बार सोचता हूँ कि हिंदुस्तान के ये प्लांटेड बुद्धिजीवी और फेक इतिहासकार, क्या थोड़ी सी भी बुद्धि नहीं रखते? या फिर कहीं ये पढ़ने वालों को मूर्ख तो नहीं समझते?

जो कुछ भी हो मगर एक बात तय है कि ये सभी अपने मालिक के एजेंडे पर निरंतर काम करते रहते हैं।

इनके हर शब्द पक्षपातपूर्ण और भ्रमित करते हैं और बौद्धिक सत्यता से मीलों दूर होते हैं।

लेकिन फिर शायद यही कारण है जो इनकी बातों को बड़ी आसानी से सामान्य तर्कों और तथ्यों के साथ काटा जा सकता है।

रामचंद्र गुहा अपने ताज़ा लेख में एक बार फिर अपना एजेंडा परोसते नजर आ रहे हैं।

यह तो सभी जानते हैं कि उन्हें भारत के उभरते राष्ट्रवाद से बेहद कष्ट है। अगर कोई उनसे पूछे कि क्यों है तो वे कोई जवाब नहीं दे पाएंगे। लेकिन एक आमजन भी यह जानने लगा है कि इस गिरोह की असली परेशानी क्या है।

सरल शब्दों में कहें तो इन सब की बौद्धिक और भौतिक विलास की सभी संभावनाएं सीमित होती जा रही हैं।

बहरहाल ये अभी समाप्त नहीं हुई हैं वरना ये आज भी बड़े बड़े अखबारों में अपना एजेंडा नहीं परोस रहे होते।

तभी तो ये महोदय अपना लेख लिखते हैं जिसका शीर्षक है ‘लेखक और राष्ट्रवाद’… और उदाहरण दे रहे हैं फ़्रांस के रोमां रोलां के साथ हिंदुस्तान के टैगोर का, समय संदर्भ है 1919।

श्रीमान गुहा साहेब की माने तो प्रथम विश्वयुद्ध की भीषण अमानवीयता से तंग आकर फ़्रांस के रोमां रोलां ने आत्मा से मुक्ति का घोषणापत्र तैयार किया था।

जिसमें रोमां रोलां ने राजनीतिक – सामाजिक वंश, एक राज्य एक पितृभूमि और एक खास वर्ग के जुनून और अहंकार, जिसने युद्ध की भूमिका बनाई, के विरोध में विश्व स्तर पर एक बौद्धिक जागरूकता को सक्रिय करने का प्रयास किया था।

उपरोक्त प्रयास को समझा जा सकता है। क्योंकि फ़्रांस उन दिनों ही नहीं आज भी अधिनायकवाद और श्रेष्ठ होने के अहंकार से बीमार है। और प्रथम विश्वयुद्ध और बाद में द्वितीय विश्वयुद्ध के लिए जवाबदार भी था।

लेकिन इसमें भारत की भूमिका कहां और क्या थी?

क्या रोमां रोलां यह नहीं जानते थे कि भारत गुलाम है (उन दिनों)। रोमां रोलां की शायद अपनी समझ रही होगी, लेकिन क्या टैगोर नहीं जानते थे कि भारत गुलाम है अतः उनके इस बौद्धिक मसौदे को स्वीकार करने का ना तो कोई औचित्य है ना ही संदर्भ।

Rabindranath Tagore with Romain Rolland

क्या यह हास्यास्पद नहीं है कि शोषित राष्ट्र का लेखक किसी शासक राष्ट्र के लेखक के राष्ट्रवाद की परिभाषा में हाँ में हाँ मिलाये।

मुझे नोबेल (!!??!!) से सम्मानित टैगोर के उन पत्रों का विश्लेषण यहां नहीं करना, जिनको महिमामंडित करने का प्रयास आज के तथाकथित लेखक गुहा कर रहे हैं।

मैं नहीं जानता कि टैगोर का क्या मत रहा होगा जो उन्होंने उन दिनों की भारतीय राजनीतिक उथल-पुथल पर आलोचनात्मक टिप्पणी करते हुए रोमां रोलां के मसौदे पर हस्ताक्षर किये, लेकिन यह आसानी से समझ सकता हूँ कि गुहा द्वारा राष्ट्रवाद को लेकर आज की जा रही उनकी अप्रत्यक्ष आलोचना का क्या उद्देश्य है।

गुहा साहेब, आपका सवाल तो यह होना चाहिए था कि रोमां रोलां ने टैगोर से उपरोक्त राष्ट्रवादी मसौदे पर क्यों हस्ताक्षर के लिए आग्रह किया?

आप तो इतिहासकार बनते हैं, आप का सवाल इतिहास में जाकर यह होना चाहिए था कि रोमां रोलां ने उपरोक्त राष्ट्रवादी मसौदे के स्थान पर अंग्रेज फ़्रांस पुर्तगाल के बढ़ते साम्राज्यवादी राष्ट्रवाद पर क्यों नहीं प्रश्न खड़े किये?

और अंत में आप से कुछ एक सवाल…

इतिहास के किस कालखंड में भारत का राष्ट्रवाद विस्तारवादी रहा है?

क्या भारत ने कभी किसी पर कब्जा करने का प्रयास भी किया?

क्या भारत दुनिया का एकमात्र देश नहीं जो विश्व के हर राष्ट्रवाद का शिकार हुआ है?

क्या आज भारत विश्वस्तर के दो धर्म के विस्तारवाद का शिकार नहीं?

क्या भारत को एक राष्ट्र के रूप में अपना अस्तित्व बचाने का कोई हक़ नहीं?

गुहा साहेब, भारत का राष्ट्रवाद प्रतिक्रियावादी है जो अपने ही राष्ट्र की सुरक्षा के लिए एक निर्णायक संघर्ष से अधिक कुछ नहीं।

यकीन मानिये आज अगर रोमां रोलां ज़िंदा होते तो फ़्रांस में बढ़ रहे इस्लाम के अपने तरह के विस्तारवादी राष्ट्रवाद की परिभाषा से चिंतित नजर आते, लेकिन दुर्भाग्य है कि भारत के तथाकथित लेखक बुद्धिजीवी गुलामी से पहले भी सोये हुए थे और आज़ादी के बाद तो आंखे खोल कर सो रहे हैं।

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