जब सच पर पर्दा डालने में जुट जाए मीडिया तो बहुत ही भयावह होता है परिणाम

13 सितम्बर 2007 को बिहार के वैशाली जिले के ढेलपुरवा गांव में सुबह सूर्योदय से पहले गांव वालों ने 11 बाहरी व्यक्तियों को पकड़ लिया।

उन दिनों गांव में चोरी की ताबड़तोड़ वारदातें हो रहीं थीं। अतः गांव वालों ने उनलोगों को पकड़कर पूछताछ शुरू की। लेकिन वो 11 लोग कोई स्पष्ट और संतोषजनक उत्तर नहीं दे सके क्योंकि वो सब एक शादी समारोह से वापस लौट रहे थे। उन्होंने भरपूर शराब पी हुई थी और नशे में धुत्त थे।

परिणामस्वरूप गांव वालों ने उनको चोर समझकर पीटना शुरू किया। गांव वालों की भीड़ ज्यों ज्यों बढ़ती गई त्यों त्यों उनकी पिटाई भी बढ़ती गई। परिणाम यह हुआ कि उन 11 में से 10 लोगों की उसी जगह मौत हो गई थी।

गांव वालों ने 11वें व्यक्ति को मरा समझकर पीटना छोड़ दिया था। पुलिस द्वारा अस्पताल ले जाए जाने पर उसकी जान बच गयी थी। मारे गए सभी 10 व्यक्ति दलित समुदाय (नट/बंजारा) जाति के थे।

बाद में हुई जांच से यह स्पष्ट हो गया था कि भीड़ की हिंसा का शिकार हुए लोग चोर नहीं थे। जिस 11वें व्यक्ति की जान बच गयी थी उस 11वें व्यक्ति ने ही बताया था कि गांव वालों द्वारा की गई पिटाई का कारण हम 11 लोगों को चोर समझ लेना था।

उपरोक्त घटना मात्र एक हत्याकांड नहीं बल्कि सैकड़ों लोगों की भीड़ द्वारा किया जघन्य नरसंहार था।

आज़ादी के बाद देश में हुई मॉब लिंचिंग की घटनाओं में यह सर्वाधिक वीभत्स घटना थी। लेकिन कभी इस नरसंहार पर कोई हंगामा सुना गया क्या? क्या दिल्ली वाली दलाल मीडिया ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और केंद्र सरकार के खिलाफ क्या उस तरह का हुड़दंग और हंगामा किया था, जिस तरह एक चोर तबरेज की मौत पर कर रही है?

ध्यान रहे कि जिस गांव में उन 11 लोगों को पीटा गया था वो गांव 90% यादव आबादी वाला यादव बहुल गांव था। लेकिन उन 10 लोगों के साथी ने ही साफ कर दिया था कि उस नरसंहार के मूल में केवल एक गलतफहमी मात्र थी। कोई जातीय ज़हर नहीं था। भीड़ ने उन 10 लोगों को किसी जातीय विद्वेष या पूर्वाग्रह के कारण नहीं बल्कि चोर समझकर मार डाला था।

जबकि इस 16 जून को झारखंड में भीड़ की पिटाई से जिस तबरेज की मौत हुई है वो एक चोर ही था। स्वयं तबरेज के द्वारा नामजद किये गए उसके 2 साथी अभी तक फरार हैं। गांव वालों द्वारा की गई पिटाई के बाद उसे थाने लेकर गयी पुलिस जब उसे थाने लेकर गई थी तो उसके पास से बरामद हुआ सामान भी साथ लेकर गयी थी।

ज्ञात रहे कि पकड़े जाने से पूर्व तबरेज और उसके 2 साथी तीन घरों में हाथ साफ कर चुके थे और चौथे घर में चोरी करने की कोशिश में पकड़े गए थे।

तबरेज की पिटाई और गिरफ्तारी के कारणों का सच बताती खबर : Police cast doubt on Tabrez video, villager speaks of ‘Jai Shri Ram’ chant

रही बात श्रीराम के नारे की तो… ध्यान रहे कि जो भीड़ मरने मारने पर उतारू हो जाए वो पागल भीड़ अपने मुंह से क्या क्या बोलती कहती है? यह बताने की आवश्यकता नहीं। सम्भव है कि भीड़ में किसी ने ‘जय श्रीराम’ बुलवाया होगा लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि गांव वालों ने तबरेज की हत्या उससे ‘जय श्रीराम’ कहलाने के लिए की?

यह जहरीला दुष्प्रचार कर रहे नेताओं और मीडिया के एक वर्ग विशेष को देश से यह बताना चाहिए कि रात को 2 बजे तबरेज और उसके दोनों साथी उस गाँव मे क्या कर रहे थे? यदि मामला तबरेज को मुस्लिम होने के कारण मारे जाने का ही है, तो तबरेज को 16 जून की रात ही पुलिस द्वारा हिरासत में ले लिए जाने के बावजूद उसके दोनों साथी अभी तक फरार क्यों हैं?

दरअसल उपरोक्त सवालों का जवाब देने के बजाय एक आपराधिक घटना को सांप्रदायिक रूप देकर मोदी विरोधी राजनीति की राजनीतिक रोटियां सेंकने का एक खतरनाक लेकिन आत्मघाती खेल पिछले 5 वर्षों से कांग्रेस सरीखा राजनीतिक विक्षिप्त हो चुका राजनीतिक गैंग खेल रहा है। उसके इस खेल को दिल्ली की दलाल मीडिया के कुख्यात दलालों द्वारा जमकर प्रचारित किया जाता रहा है।

2014 में दिल्ली में कुछ स्मैकियों द्वारा पत्थर मारकर तोड़ी गई एक चर्च की कांच की खिड़कियों की एक छोटी सी सामान्य घटना को इसी कांग्रेसी गैंग और दिल्ली के मीडियाई दलालों ने “हिन्दुओं द्वारा चर्चों पर किये जा रहे हमलों” का जहरीला साम्प्रदायिक लेकिन शत प्रतिशत झूठा हल्ला मचाकर किया था। (ध्यान रहे कि CCTV कैमरों की मदद से वो स्मैकिए बाद में पकड़ लिए गए थे) तबरेज की मौत पर हुड़दंग उसी षड्यंत्र की ही ताज़ा और नवीनतम कड़ी है।

ध्यान रहे कि अपराधियों के प्रति जनता में बढ़ रहे आक्रोश के हिंसक प्रकटीकरण की सामाजिक समस्या की जड़ें लुंजपुंज जर्जर लाचार और महाभ्रष्ट हो चुकी पुलिस एवं न्यायिक व्यवस्था के कारण जमी और मजबूत हुई हैं। जनता का विश्वास दोनों पर कम होता जा रहा है। परिणामस्वरूप अवसर मिलते ही भीड़ तत्काल फैसला करने पर उतारू हो जाती है।

पिछले ढाई तीन दशकों के दौरान यह प्रवृत्ति लगातार बढ़ती गयी है। लेकिन इस समस्या की जड़ों पर प्रहार करने के बजाय राजनीतिक गिद्धों की तरह साम्प्रदायिक जातीय आधार पर हंगामा और हुड़दंग करके अपना घृणित स्वार्थ सिद्ध कर रही राजनीतिक और मीडियाई जमात को निकट भविष्य में इसके खतरनाक परिणाम भोगने पड़ेंगे।

क्योंकि यदि चोरों हत्यारों लुटेरों बलात्कारियों को मज़हबी जातीय आधार पर निर्दोष सिद्ध करने का यह खेल शुरू हो गया तो अराजकता की जो आग समाज में फैलेगी उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। मीडिया जब सच पर पर्दा डालने में जुट जाता है तो परिणाम बहुत भयावह ही होता है।

ढेलपुरवा में सितम्बर 2007 में हुए नरसंहार की पूरी खबर : 10 thieves lynched in Bihar

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