गाय ले आने और गाय पालने में बड़ा अंतर है

एक मंगनियार (एक जाति, जो मांगकर खाती है) को किसी जजमान ने गाय भेंट कर दी।

गाय, बछिया लाकर रात को खूंटे से बांध दी।

दूसरे दिन, एक प्रहर दिन चढ़े भी जब कोई न उठा तो गली में से गुज़रते सयानों ने उन्हें उठाकर लताड़ लगाई। “अरे कमीनों! उठकर गाय तो दुह लो!”

घर में गाय के क्या मायने होते हैं?

बाड़ा बनाना, गोबर उठाना, सुबह जल्दी उठना, चारे पानी की व्यवस्था करना।

मांग कर खाने पीने का मज़ा ही कुछ और है!

गाय एक बड़ी ज़िम्मेदारी और साथ ही सुव्यवस्थित दिनचर्या लेकर आती है।

मंगनियार का परिवार अपनी पुरानी लाइफ स्टाइल से खुश था। उनके लिए गाय आफत थी।

कुछ उत्साही सदस्यों ने थोड़ी बहुत पहल करनी भी चाही तो घर के बुज़ुर्गों ने डांट दिया – ‘जो मजा मांगकर लायी गई छाछ में है, वह घर वाली में नहीं, समझे? कितनी मुश्किल से तैयार होती है, जानते हो?

अतः पूरे परिवार ने एकराय होकर गली से गुजरते सयाने से कहा “एक मेहरबानी करें, यह गाय आप ही रख लें!”

जो लोग शिक्षक प्रशिक्षण में ये प्रतिज्ञाएं कर रहे थे कि जब वे शिक्षक बनेंगे, हर साल बहुत सारे चन्द्रगुप्त इस देश को देंगे और ऐसा कुछ करेंगे जो शिक्षा के क्षेत्र में आज तक कभी नहीं हुआ।

वे शिक्षक बने। दो साल, चार साल, आठ साल के बाद जब उन्हें उनकी प्रतिज्ञा याद दिलाई गई… एक दम से फट पड़े।

मानो इंतज़ार ही कर रहे थे, अपनी नाकामी को छिपाने के अब तक उन्हें जो बहाने मिल चुके थे सब सुना दिए। ‘ये नहीं हुआ, वो नहीं हुआ… ऐसा थोड़ी न होता है’।

अपनी ही प्रतिज्ञाओं से उनका मोहभंग हो चुका था।

देश की आज़ादी के बाद अनेक साहित्यकारों का मोहभंग हुआ था। ‘सपने अधूरे हैं, जैसा सोचा वैसा नहीं हो रहा और होते हुए दिखता भी नहीं। सबकुछ गलत दिशा में जा रहा है’। कई भग्न हृदय साहित्यकार गाली गलौज लिखने लगे थे।

शिक्षक बनने के बाद, धरातल पर उतरने के पश्चात जो वस्तुस्थिति थी, उसे ठीक करने का दम न होने पर खूबसूरत बहानों में असफलता छिपा कर, सामान्य कर्मचारियों की तरह रूटीन की लाइफ जीना अथवा सपने पूरे होते न देख भग्नहृदय कवि के समान विद्रोही बनना….!

मोदी – 2.0 के समय जो हाहाकार सुन रहे हैं, कुछ कुछ वैसा ही है।

मैं मोदीजी से ज्यादा उम्मीद नहीं पाले था, मुझे भग्नहृदय नहीं बनना। जो अपने बूते पूरा इलेक्शन जीत सकता है वह यदि अपनी पर आ गया न, तो कुछ भी कर सकता है। यह जितना कर सकता है करेगा, बाकी जिसकी जैसी मानसिक प्रतिज्ञा है, उस अनुरूप ही होगा। गाय ले आने और गाय पालने में बड़ा अंतर है।

रोने चिल्लाने वालों को पूरा हक है। दबाव बनाएं कुछ भी करें। 2022 तक का समय सामने वाले ने मांग रखा है।

वास्तविक चिंताएं कुछ और भी हो सकती है।

1947 में देशहित में यदि जनता से आह्वान किया जाता तो लोग काफी कुछ त्याग करने को तत्पर थे, तब हो सकता था कि मंगनियार गाय पालना स्वीकार भी कर लेता।

तत्कालीन शिक्षकों ने बहुत मेहनत की थी। नई आदतों को डालने का अच्छा अवसर था वह। मगर उनसे वैसा करवाया नहीं गया।

अब तो गाय पालन की बात करना ही हास्यास्पद है। गाय खाने की बात ज़रूर सुनते हैं। मगर ज़रूरी बात है तो आग्रह भी करना पड़ता है।

नोटबन्दी हुई थी न! वैसा ही आह्वान अब भी हो सकता है। गैस सब्सिडी छुड़वाई गई थी न…! वह तो कुछ भी नहीं, यदि कार्यालयों में इलेक्ट्रॉनिक उपस्थिति लगा दी जाए, या कि प्रॉपर्टी आधार से लिंक, और चारित्रिक इतिहास का लेखा जोखा सार्वजनिक करने जैसे कदम… नित्य जीवन में हमारी बहुत सारी कमज़ोरियां हैं जिनके हम अभ्यस्त हो गये हैं और कड़क हेडमास्टर के डंडे से पहले ही चिल्लाना संकट को कम करता है। ‘ए हेडमास्टर! तू मुझे कह रहा है, उसको कहे तो जानूं’।

हर बात में, “ये नहीं हो सकता, भारत में यह असम्भव है!” का राग अलापने वाले, विदेशों में जाते ही उससे भी कई गुना ज्यादा निर्मम नियमों का भी बड़े अदब से पालन करते हैं।

जैसा देश बनाने की प्रतिज्ञा है उसके अनुरूप ही त्याग और संघर्ष की आदत डालनी होगी।

तुम नहीं तो कोई और ले जाएगा। मौका है, मौके पर चौका लगाने वालों के हाथ ही बाज़ी लगती है।

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