लाशों पर मंडराने आते गिद्धों को भी पहचानिए

गर्मियां बढ़ते ही जिस गति से बिहार में मौतें हो रही हैं, वो असामान्य तो लगती ही हैं। मौतों का एक बड़ा कारण गर्मी की चपेट में आना और लू बताया जा रहा है। मौतों का दूसरा कारण ‘चमकी बुखार’ या जापानी इन्सेफेलाइटिस (japanese encephalitis) बताया जा रहा है।

लू जैसी चीज़ों से बचने के लिए खुद अपना ख़याल रखना होता है। अधिकांश स्कूलों में छुट्टी घोषित कर दी गयी है इसलिए बच्चों को लू से कम खतरा होगा। उनके लिए भीषण खतरा जापानी इन्सेफेलाइटिस है।

जापानी इन्सेफेलाइटिस मच्छरों के जरिये फैलने वाली एक बीमारी है। इसका वायरस उसी श्रेणी का होता है जिसमें डेंगू, येलो फीवर या वेस्ट नील वायरस आते हैं। मुख्यतः एशिया के देशों में होने वाली इस बीमारी के करीब 68 हज़ार मामले हर साल सामने आते हैं। कई अरब की आबादी वाले इलाके में इतने कम मामले आने पर भी इस बीमारी को मामूली समस्या मानना मूर्खता होगी।

इस बीमारी में होने वाली मौतों की दर 30% है और करीब 30-50% बच्चे अगर बच भी गए तो उनका मस्तिष्क क्षतिग्रस्त हो चुका होता है। इसके लक्षण पहचानना और भी मुश्किल है, क्योंकि वो ना के बराबर होते हैं। आमतौर पर इसे उल्टियों और पेट दर्द के साथ होने वाले बुखार से पहचाना जाता है। अभी तक इस बीमारी का कोई इलाज नहीं मिला है। हाँ इससे बचने के लिए टीकाकरण उपलब्ध है।

फ़िलहाल इसके चार मुख्य टीके लगाए जाते हैं। इनमें से चीन में बनने वाला एक टीका (SA14-14-2) सबसे ज्यादा प्रचलित है। इसे डब्ल्यू.एच.ओ. ने 2013 में ही प्रीक्वालीफाई कर दिया था। नवम्बर में जहाँ ज़रूरत हो उनके लिए डब्ल्यू.एच.ओ. (गावी) के जरिये फंडिंग भी शुरू हो गयी थी। जिन इलाकों में इस बीमारी से मौतें हुई हैं, वहां सरकार ने अब तक ये टीके लगवाने शुरू किये हैं या नहीं, ये ज़रूर पूछा जा सकता है।

इस बीमारी में ज्यादा संभावना इस बात की है कि बच्चा अगर बच भी जाए तो वो पक्षाघात, मानसिक रूप से कमज़ोर, या फिर बोलने में असमर्थ हो जायेगा। मच्छरों के जरिये फैलने वाली इस बीमारी के शिकार भी गरीबों के बच्चे हो रहे हैं, जिनके जीने-मरने से संभवतः सरकार बहादुर को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। अभी तक इस बीमारी की कोई दवा नहीं है और डॉक्टर सिर्फ लक्षणों से बचाने की कोशिश कर सकते हैं।

आपकी खुद की सावधानी ही ऐसे मामले में बच्चे की सुरक्षा होगी। आस पास जमा होते पानी में पनपने वाले मच्छरों की रोकथाम खुद भी कीजिये और इसके लिए स्थानीय नगरपालिका/ नगरनिगम इत्यादि विभागों को भी सचेत कीजिये।

अगर खुद कुछ नहीं कर रहे तो मान कर चलिए कि आपका जन प्रतिनिधि (सांसद-विधायक) भी बिलकुल आप जैसा ही है। जब आप अपने बच्चों की कीमत पर भी एक चिट्ठी लिखने तक का कष्ट नहीं कर रहे तो वो किसी को आदेश क्यों लिखकर भेजेगा? उसके बच्चे दाँव पर लगे हैं क्या?

यहाँ कुछ मासूम से क्यूट लोग ये भी कहने आयेंगे कि ‘सोशल मीडिया पर लिखने से क्या होगा? इसे व्हाट्स-एप्प पर भेज देने से क्या होगा? अरे ज़मीन पर उतर कर काम करना होता है, ज़मीन पर!’

ये सब वही लोग हैं जो मौका पाते ही पलटकर कहेंगे कि आजकल लोग बुद्धिजीवियों की नहीं सुनते, वो तो व्हाट्स-एप्प यूनिवर्सिटी में पढ़ते हैं! उन्होंने खुद इस दिशा में प्रयास करने के लिए अपने एनजीओ के जरिये प्रपोज़ल भेज भी दिया होगा। लाशों पर मंडराने आते गिद्धों को भी पहचानिए।

जानकारी को जहाँ तक हो सके आगे जाने दीजिये। जानकारी ही बचाव है!

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