राजनाथसिंह की बगल में बैठे उस भाउडे के मन में न जाने क्या पक रहा है?

मैं जिस दुकान से किराना खरीदता हूँ, वहाँ एक परिवार आया, कुछ सामग्री लेने। ठेट, देहाती और रूढ़िवादी लहजे में, पुरूष 55वर्ष के आसपास, पैरों में दोनों हवाई चप्पल, अलग अलग रंग के, अत्यंत घिसे हुए, जिनको कपड़े की चिन्दियों से बांध कर रखा हुआ है, उसकी पत्नी हाथ भर घूँघट काढ़े, किसी कठपुतली जैसी, चीथड़ों में लिपटी हुई, एक 14वर्ष का पुत्र, जो कि बोल नहीं सकता, और पुत्री 16-17साल की, अपने फ़टे अंगिये से बेखबर, लाज से भरी, हर चीज को कौतुक और चकित भाव से निहारने वाली।

ये लोग सुदूर बॉर्डर से आये थे। दुकान का लड़का सामान तौल रहा था, मैं दुकानदार से इनके बारे में धीरे से पूछने लगा।

“आज की तारीख में इनका कोई धणी धोरी नहीं है, क्रयशक्ति के नाम पर इनके पास महीने के 1000रुपये भी नहीं होते! न कोई सरकारी सहायता, न ही कोई योजना। ये जनरल कास्ट हैं न!!”

उन्होंने समान क्या लिया?

लड़के के लिए पारले G, वह बहुत खुश हो गया। चूड़ा रंगने का मंजीठ कलर, धागे की दो गटियाँ, 20रुपये की सौंठ, चाय-शक्कर, एक डिटर्जेंट पाउडर थैली, थोड़ी सी लहसुन….. और लड़की के लिए कुछ भी नहीं।

वह बेचारी मुग्ध भाव से, दुकान का सामान देख कर ही खुश हो रही थी। “अम्मा चॉकलेट!” एक बरनी की ओर संकेत कर, सकुचाते हुए उसने कहा।

“अभी नहीं, भाउडा आएगा न, तब वह लाएगा।”

भाउडा यानि इसका बड़ा भाई, जो मद्रास चला गया है, इन्हीं सेठ की किसी दुकान पर वहाँ है। सेठजी ने बताया “12 वीं की है, वैसे भी नौकरी तो लगेगी नहीं, इसलिए हमने वहाँ भेज दिया।”

सेठजी के दादा और इन महाशय के पिता में बड़ी गहरी मित्रता थी। जब जमीन का सेटलमेंट करने वाले अधिकारी इनकी ढाणी गये तो दानसिंह को घी से भरा घड़ा देने को कहा, और बदले में सात पुश्तों जितनी भूमि उनके नाम करने की बात कही। खेती वहाँ कभी होती ही नहीं थी।
पशुपालन था, गुजरात में बैल बिकते थे और जमीन की बात ही हास्यास्पद लगती थी।

खैर, दानसिंह के खानदान का ये हाल होगा, किसने सोचा था? दूध बेचकर गुजारा करते हैं। ऊन बिकती नहीं। ऊंट बिकते नहीं। बैल की कोई पूछ नहीं। अत्यंत विपन्न और दयनीय हालत है… कहते हुए सेठ की आंख भर आईं।

आंखें मेरी भी नम हो गई!! वह कन्या, शायद पहली बार दुकान देख रही है, दुकान निहारते निहारते उसकी दृष्टि बरनी पर आकर ठहर जाती।

मैं भी तो भाउडा ही हूँ। मैंने (दुकानदार से) मेरी ओर से कुछ टॉफियां उनकी थैली में डालने को कहा। पर उन्होंने देख लिया।
“हम बाम्भनों और चारणों का एक दाना भी नहीं खा सकते!”

उनकी ढाणी में कोई बारहठजी शिक्षक थे, जिनकी शक्ल मुझसे मिलती थी। मैंने बहुत आग्रह किया, मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, पर वे नहीं माने।

शाम की ठिठुरन में, दूधवाले की गाड़ी की ट्रॉली में बैठते उस परिवार के वैभव विलास को देख मन हाहाकार कर उठा।

लोकसभा में 10%रिजर्वेशन बिल पास होने के अंतिम क्षणों में, राजनाथसिंह जी की बगल में तटस्थ भाव से मोदी जी बैठे थे।
चुपचाप!!

मेरे बहुत सारे जनरल कास्ट के मित्र हैं जो 2013 से ही तेली_तेली, संघी, चड्डी वाले, नेकरिये, के जोक्स बनाते रात दिन मुझे चिढ़ाते हैं।

दुकान पर टॉफी के लिए तरसती, उस बहिन का भाउडा मैं तो नहीं बन सका। दूसरा हज़ारों km दूर मद्रास में बैठा है। तीसरा गूंगा है।

आशा की एक किरण, वह चौथा भी है, जिसके, लोग जॉक्स बनाते हैं, राजनाथसिंह की बगल में बैठे उस भाउडे के मन में न जाने क्या पक रहा है?

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