तमिल कैसे हो सकती है अलग नस्ल!

आज के तमिल क्षेत्र को प्राचीनकाल में द्रमिल कहते थे। द्रविड़ शब्द का उद्भव इस द्रमिल शब्द से ही हुआ है।

द्रमिल एक स्थानवाची शब्द है। ठीक उसी तरह से जिस तरह से कुरु, पांचाल, विदर्भ, मैथिल, मत्स, मद्र, कैकेय, पौंड्र, तैलंग आदि नाम के क्षेत्र रहे हैं। जो वहां के निवासियों के लिए प्रयोग में लाये जाते थे।

यह परम्परा आज भी भारत में मिल जाएगी। कोल्हापुरे सरनेम एक उदाहरण हो सकता है। पंजाब और हरियाणा में गाँव का नाम व्यक्ति के नाम के साथ जुड़ा होना आम है। यही प्रचलन साहित्य ने भी उठाया, और आज भी अनगिनत नाम मिल जाएंगे कोई लुधियानवी है, कोई गोरखपुरी है, कोई इंदौरी है।

उपरोक्त नामों में से क्या कोई भी नाम नस्लवादी या जातिवादी या किसी रेस से संबंधित है? नहीं। तो फिर तमिल अलग से रेस या नस्ल कैसे हो सकती है।

सनातन इतिहास में नस्ल के आधार पर सोचने की कभी कोई परम्परा नहीं रही। आर्य शब्द भी गुणवाचक है। और वर्ण भी कर्म आधारित रहे हैं। ये सभी नाम वाले शब्द व्यक्ति की पहचान के लिए हुए हैं। इन क्षेत्रों के राजा भी इन्ही नाम से पहचाने जाते थे। इनमें आपस में संघर्ष भी होता रहा है, भीषण युद्ध भी हुए। मगर ये सब कहलाते भारतीय ही थे। क्यों?

क्योंकि सभी सांस्कृतिक रूप से जुड़े हुए थे। गुंथे हुए थे। एक समान और एक रस थे। ब्राह्मण जब कभी किसी यजमान से संकल्प लेता तो फिर चाहे वो कैकेय में हो या हस्तिनापुर में या फिर द्रमिल में, कहा यही जाता कि ‘जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे…’ अमुक अमुक राज्य नगर और आगे समय कालखंड का वर्णन आता। जो फिर आदिकाल से हमारे सांस्कृतिक राष्ट्र के होने का प्रमाण है।

यह एकजुटता विदेशी शासक को कैसे पसंद आ सकती थी। और फिर धर्म परिवर्तन गिरोह के लिए अपना काम करना असम्भव था। इसलिए यह क्षेत्रवाद, भाषावाद और नस्लवाद का बीज बोया गया। और फिर इसे एजेंडा लेखकों व प्लांटेड समाजसुधारकों द्वारा पाला पोसा गया।

जैसे जैसे यह विषबेल फैलती गई वैसे वैसे इसने सनातन के विशाल वृक्ष की शाखाओं को कमज़ोर किया। पेड़ की कोई भी शाखा सूखते ही निर्जीव हो जाती है फिर उसे काटना तोड़ना आसान हो जाता है। कानूनी और सामाजिक रूप से भी। इस कटे हुए तने को काटपीट कर लकड़ी का फर्नीचर बना कर अपने घर में सजाया जा सकता है।

धर्म परिवर्तन गिरोह ने यही किया। सनातन समाज की मुख्य धारा से पहले एक समूह को अलग किया फिर परिवर्तित करवा कर अपने घर में सजा लिया। एक निर्जीव सामान की तरह।

दुर्भाग्य से आजादी के बाद कई प्रजातान्त्रिक राजनेता यही हथकंडा अपना रहे हैं, सत्ता प्राप्ति के लिए। कोई जाति, कोई क्षेत्र के नाम पर, कोई भाषा और नस्ल के नाम पर। उन्हें ऐसा करने से राज सिंहासन तो मिल जा रहा है लेकिन वे जाने अनजाने सनातन वृक्ष को कमज़ोर करते जा रहे हैं। वे जिस डाली पर बैठते हैं उसी को काटने लगते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि डाली के कटते ही वे भी साथ गिरेंगे तथा किसी और के घर में फर्नीचर की तरह सजावट का सामान मात्र बनकर रह जाएंगे।

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