मोदी, गांधी, धिम्मीपन और तुष्टिकरण

वामपंथ का साथ छोड़कर जो लोग दक्षिणपंथ/ राष्ट्रवाद की तरफ आए उनमें मधु पूर्णिमा किश्वर का नाम शुरुआती लोगों में से है।

वे नरेंद्र मोदी की बड़ी समर्थक बनीं, वह भी उन दिनों में जब मोदी के बारे में ज़रा भी अच्छा बोलना अपने करियर की अपने ही हाथों हत्या करने के बराबर था।

मदर इटालियानी की अनिर्बंध सत्ता थी और पूरा प्रबुद्ध वर्ग, बुद्धिजीवी वर्ग हर सुबह उसकी चरणवंदन करता था।

फिर भी, मधु किश्वर में यह आत्मशुद्धि का भाव जागा और उन्होंने सत्ता का पक्ष छोड़कर उस पक्ष को अपना लिया जहां मानो तो कारावास अटल था और जिसपर हिन्दू आतंकवाद का ठप्पा पूरे हनक से लगाया जा रहा था। मोदी भी कई आरोपों से लड़ रहे थे।

समय बीतता गया, 2014 आया और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए।

सोचिए, मधु किश्वर ने क्या अपेक्षायेँ रखी होंगी? कोई खूबसूरत सा पारितोषिक, शायद राज्य सभा की सदस्यता, या कहीं कोई सलाहकार का अच्छा सा पद?

और क्या मिला उनको? कुछ भी नहीं, बिलकुल उपेक्षा। और एम जे अकबर जैसे लोग मंत्रीपद भी पा गए।

मनदुख हो यह समझ में आता है। उन्होंने मोदी की आलोचना शुरू की, समझ में आता है।

लेकिन अचानक उनमें फिर एक परिवर्तन आया। उन्होने मोदी की आलोचना करना बंद किया और फिर से लूटियन माफिया का मुखौटा उखाड़ फेंकना शुरू किया। और अनवरत किए जा रही हैं।

इस दूसरे परिवर्तन का कारण पता नहीं। अगर मोदी के साथ कोई सुलह हुई हो तो मोदी की तारीफ करें, और अगर मधु किश्वर का यह दूसरा मत परिवर्तन वाकई आत्मिक है तो वे और भी अधिक प्रशंसा की पात्र हैं।

इस कहानी का प्रयोजन दक्षिणपंथी – राष्ट्रवादियों द्वारा मोदी पर जो दनादन हमले किए जाना है। हमले कुछ इस तीव्रता से हो रहे हैं मानो उन्होंने कलमा पढ़ लिया हो, या फिर 10 जनपथ पर पश्चाताप में दस दिन माँ इटालियानी के मेहमानों के जूते साफ किए हों।

मुद्दा सरल है, बात मोदी की थी ही नहीं। नसीब की बलिहारी थी कि वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार घोषित हुए, और उससे दुगुनी नसीब की बलिहारी थी कि 2014 में प्रधानमंत्री बन भी गए। और 2019 में उससे भी बड़ी फर्क से जीत को चमत्कार ही कहें।

मोदी एक राजनेता हैं, और बीजेपी एक राजनैतिक पार्टी है। दिल्ली में एक केंद्रीय सरकार होनी आवश्यक है तो यह अच्छा होगा कि ऐसी सरकार हो जो नुकसान न करे या कम नुकसान करे। इसके अलावा जहां तक लोकतन्त्र में संस्कृतियों का संग्राम है, कोई राजनेता या पक्ष अधिक कुछ कर नहीं सकता।

बात है, हम सनातन धर्म का पुनर्जागरण कैसे करते हैं। ‘वा क ई’ गिरोह से कैसे लड़ते हैं। उनके यूज़फूल इडियट्स जो हैं, याने कि सेक्युलर्स, नारीवादी, बॉलीवुड और मीडिया, उनसे कैसे लड़ते हैं। हमारे संस्कृति की पुनर्स्थापना कैसे करते हैं। राजनीति और अर्थव्यवस्था, दोनों ही संस्कृति की उपधाराएँ होती हैं, और संस्कृति, सरकार का विषय नहीं होता।

बीजेपी में भी धिम्मी और वामी मिल ही जाएंगे जो लूटियन माफिया से हर बात में सहमत होते पाये जाएँगे, देश के झंडे के रंग को छोड़कर। और उसपर भी सहमत होंगे तो आश्चर्य नहीं। मोदी और शाह भी धिम्मी हो सकते हैं, या मराठा और सिक्ख जैसे सत्ता में आने पर सर्वसमावेशक बने वैसे भी बन सकते हैं।

लेकिन फिर भी, माँ इटालियानी के सत्ता में होने से, मोदी का सत्ता में होना हमेशा ही बेहतर है। इसलिए ज़रा रुकिए, एक गहरी सांस लीजिये। उन्हें अपना काम करने दीजिये, उनके हाल पर छोड़ दीजिये। हिदुओं के पुनर्जागरण में अपनी ऊर्जा लगाये। इसमें भी मोदी ने काफी काम किया है – गरीब हिंदुओं को सूदखोरों और जाति के नेताओं के पंजों से छुड़ाया है, जिसके चलते वे अब्राहमियों के प्रलोभन से बच पाये हैं।

हमारा काम मोदी से इतर ही, स्वतंत्र रूप से चलना चाहिए। और माँ इटालियानी के प्रॉक्सी प्रधानमंत्री होने की बजाय मोदी प्रधानमंत्री हों यह अच्छा है, उनसे अपने लिए विधायक योजनाएँ करवा लें यह अच्छा होगा।

गांधी जैसा अंधा समर्थन देने की बात न करें, 1940 के समय में हिंदुओं ने सब कुछ गांधी पर छोड़ दिया था। हम मोदी पर कुछ न छोड़ें, बीजेपी पर भी कुछ न छोड़ें, क्योंकि हमारा संघर्ष उनके रहने पर निर्भर नहीं है, उनके न रहने के बाद भी यह संघर्ष चलता रहेगा, इसलिए मोदी पर हम निर्भर न रहें यही बेहतर है। हाँ, उनका प्रधानमंत्री होना अच्छा है, वह भी 353 सांसदों के साथ।

(copied English post का अनुवाद)

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