सोचियेगा, फ़िलहाल सोचने पर जीएसटी नहीं लगता

राजनैतिक व्यवस्था जब सामाजिक व्यवस्था से छेड़-छाड़ करने लगती है तो क्या होता है? इसका एक अच्छा सा उदाहरण दक्षिण बिहार की अहर-पैन व्यवस्था में नजर आ जाता है।

परंपरागत रूप से ये एक ऐसी व्यवस्था थी, जिसके जरिये बाढ़ के पानी को इकठ्ठा कर लिया जाता और बाद में वो सिंचाई जैसी ज़रूरतों के लिए इस्तेमाल होती थी।

ज़मींदारी व्यवस्था के खात्मे के साथ ही इस व्यवस्था को भी नष्ट कर दिया गया। जी नहीं, ग़लतफ़हमी मत पालिए! ज़मींदारी व्यवस्था का खात्मा आज़ाद भारत में नहीं हुआ था।

काफी पहले जब अंग्रेजों ने नहरें बनवानी शुरू कीं तो उन्हें दिखा कि जब तक अहर-पैन की सी व्यवस्थाओं से किसान अपने लिए पानी खुद ही इकठ्ठा कर सकता है, तबतक भला उनकी नहरों से पानी की खरीद कैसे होगी?

भारतीय लोगों का खून चूसने की इसी प्यास का नतीजा था कि इस व्यवस्था को ख़त्म किया जाने लगा। उनकी मान्यताओं के हिसाब से कोई दूसरा जन्म तो होता नहीं था, जो अपने किये कुकर्मों का फल भोगने की चिंता होती। उनकी अगली पीढ़ियों को भी यहाँ रहना ज़रूरी नहीं था, इसलिए 10-20 या पचास साल बाद क्या होगा, इसकी चिंता भला वो क्यों करते?

फिरंगियों के जाने के बाद जो भूरे साहब आये, वो रूप-रंग और शरीर से तो मैकॉले के हिसाब से हिन्दुस्तानी रहे, मगर उनकी आत्मा फिरंगी हो चुकी थी। चुनावों के फ़ौरन बाद ही सिंधिया के अपने बेटे को डिग्री मिलने पर विदेश जाना, या कश्मीरी अलगाववादी नेताओं के बच्चों का विदेशों में होना अब हमें चकित भी नहीं करता।

पन्त की 2004 में आई रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण बिहार में 1930 में जहाँ 0.94 (एम एचए – मिलियन हेक्टेयर) ज़मीन इस तरीके से सींची जाती थी, वहीँ 1971 में ये घटकर 0.64 (एम एचए) पर आई और 1976 में ये और घटकर 0.55 (एम एचए) ही रह गयी। यकीनन पिछले पचास वर्षों में ये और कम ही हुई होगी।

ऐसी परियोजनाओं के खो जाने से एक तो हमारे परंपरागत ज्ञान का नुकसान हुआ। आज शायद ही कोई यकीन कर पाए कि रुड़की का इंजीनियरिंग कॉलेज एक ऐसी नहर के रखरखाव करने वाले लोग तैयार करने के लिए बना था, जिस नहर को ग्रामीण, तथाकथित अनपढ़ लोगों ने बिना पढ़े-लिखे अभियंताओं की मदद के ही बनाया था। इस परंपरागत ज्ञान को कॉपी करके विदेश ले जाया जा सके इसलिए कॉलेज बनाया गया।

भारत के आज़ाद होने के बाद भी पानी की ज़रूरत पर ध्यान देना उतना ज़रूरी नहीं माना गया। तालाब जैसे परंपरागत पानी के स्रोत जिनके बारे में धार्मिक मान्यता थी कि इन्हें बनाने से पुण्य मिलता है, उनसे लाभ लेने की सरकार बहादुर को कोई ज़रूरत नहीं लगी।

बिहार का हाल देखें तो पटना शहर में आज जहाँ एक तारामंडल दिखता है, वहां कभी एक तालाब हुआ करता था। विरोध के बाद भी उसे भरकर उसपर तारामंडल बना दिया गया था।

सचिवालय के पीछे बने इको-पार्क का तो नाम ही एक विडंबना है। यहाँ भी कभी एक बड़ा तालाब हुआ करता था जिसे भरकर उसका नाम इकोलॉजी से आधा शब्द लेकर इको-पार्क रख दिया है।

अगर बिहार में किसी क्षेत्र में तालाबों की गिनती, उनका आकार, या उसमें कैसे जीव मिलते हैं, इससे सम्बंधित जानकारी लेनी हो तो कोई ऐसा विभाग नहीं जहाँ ये जानकारी इकठ्ठा होती हो। आज बिहार में पानी की कमी हो रही हो तो चौंकने जैसी कोई बात नहीं।

ऊपर प्रदर्शित तस्वीर पटना के करीब बीच में स्थित अदालतगंज के तालाब की है, जो सामाजिक और प्रशासनिक अनदेखी से सूख चुका है। प्रधानमंत्री के महत्वाकांक्षी स्मार्ट सिटी योजना के तहत इसपर काम चल रहा है। ठेकेदारों ने बताया कि तली के बचे खुचे कीचड़ को पहले साधारण रेत से ढंका जायेगा। फिर उसपर ग्रेवल और फिर रेड सैंड की परत डाली जाएगी। मानसून आने से पहले ये काम पूरा होगा या नहीं, ये हमें मालूम नहीं।

इस राजनैतिक व्यवस्था के सामाजिक व्यवस्था में घुसने का नतीजा उत्तर बिहार में भी अच्छा नज़र आता है। यहाँ नदियों के किनारे कुछ तटबंध ऐसे हैं जो ज़मींदारों ने बनवाए थे। अब जब बाढ़ में उनके टूटने की हालत होती है तो सरकारी विभाग उनकी मरम्मत नहीं करवाते। उनका कहना होता है कि जो ज़मींदारों ने बनवाया, वो उनकी ज़िम्मेदारी है हमारी नहीं। अधिकार सारे चाहिए मगर कर्तव्य एक भी नहीं, इसका भी ये एक अच्छा नमूना है। “साड्डा हक़ एत्थे रख” वाले कूल डूड के अब्बू की पीढ़ी ने ज़मीन-जायदाद के हक़ तो लिए मगर ज़मींदारों की ज़िम्मेदारी लेने से इनकार कर रखा है।

बाकी आँखें खोलिए और देखिये कि आपके आस पास कोई तालाब बन भी रहा है या नहीं? क्योंकि आँखें बंद रखने पर भी ये पता तो चल ही जाता है कि अब पानी के लिए ढाई सौ फीट से ज्यादा बोरिंग करनी पड़ती है। सोचियेगा, फ़िलहाल सोचने पर जीएसटी नहीं लगता।

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