उलाहने दे-दे कर ही ये पाँच साल भी गँवाने हैं क्या?

प्रधानमंत्री मोदी को लेकर फिलहाल जो रण मचा हुआ है वो संक्षेप में यह है कि आप को वोट तो हम ने दिये। तो आप उनको सुविधाएं क्यों दे रहे हैं जिन्होने आप को वोट दिये ही नहीं?

कुछ बातें समझ लेते हैं –

देश के प्रधानमंत्री हैं, हर नागरिक के प्रति उनका कर्तव्य है, भले ही वो नागरिक इनकी हार को ही समर्पित क्यों न हो। और यह भी समझ लीजिये कि यही जो उनको हराने के लिए पूरी नफरत के साथ समर्पित हैं, वे ही मोदी के जीतते ही उनके सामने अपनी मांगें लेकर जाते हैं कि ‘हमारे लिए ये कीजिये, हम भी आप के देश के नागरिक हैं, आप हमारे काम करें यह हमारा संवैधानिक हक़ है’।

हमें वही अखरता है कि मोदी उनकी सेवा क्यों करते हैं जिन्होंने मोदी को अपना शत्रु घोषित किया है? और हम यही हल्ला मचाये रहते हैं – तुष्टिकरण से लेकर टुच्चीकरण – क्रिएटिविटी की कोई कमी नहीं।

लेकिन मोदी जी हमारे लिए क्या करें इसके लिए हमारे पास कोई योजना नहीं।

हम क्या हैं इसपर भी हम स्पष्ट नहीं। हम में से किसे सरकारी योजनाओं के लाभ मिले इसपर भी हमारे पेट के मरोड़ ज़बर्दस्त हैं, और नतीजा यही है कि कोई पारंपरिक व्यवसाय हिंदुओं से हथिया जाता है तो हम थोड़ी गाली गलौज करते हैं, और जिन्होंने वह उद्योग हथियाया है उनसे सेवा लेना शुरू करते हैं। कुछ समय बाद अपने हिन्दू बंधुओं को ही गालियां देते हैं कि ‘उनके हाथों से वो उद्योग गया तो ठीक ही हुआ, ये वैसे काम नहीं करते जैसे वे करते हैं’।

इसका एक कारण है कि हमने सामूहिक तौर पर हमेशा यह मानने से इन्कार ही किया है कि हमारी मर्जी हो या न हो, हम युद्धरत हैं। एक युद्ध हम पर लादा गया है जहां हम पर और इस देश पर कब्जा करना जिनका मनोदय है उन्होने हमको अपना शत्रु माना है और वे बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से काम कर रहे हैं।

सामूहिक तौर पर हम इसे मानते ही नहीं बल्कि अपने ही धर्मबंधुओं से निपटने के लिए इनकी सहायता भी लेते रहते हैं। जिसकी कीमत क्या वसूली जाती है ये ना हम सोचते हैं और ना ही हमारे हश्र से दूसरे सीखते हैं।

देश की सरकार इस युद्ध में निष्पक्ष रहने को बाध्य है। दुर्भाग्य यह भी है कि कोई भी राजनीतिक पक्ष इन बातों पर अपनी भूमिका नहीं बना सकता। ओवैसी बंधु तक अपने भाषणों में हिंदुओं को लेकर सीधा कुछ नहीं कहते। हिन्दू नेताओं की खिल्ली उड़ाना अलग बात है, आप एक व्यक्ति और उसके विचारों की आलोचना कर रहे होते हैं, एक समुदाय या धर्म की नहीं। फर्क है और बड़ा है।

सरकार में आने पर भी वे अगर हिन्दू हित का कोई काम न करें तो उसके लिए कोई कारण देंगे जिसका ठोस प्रतिवाद नहीं किया जाता। या कभी कभी ठोस प्रतिवाद की जगह भी नहीं होती। पक्षपात करेंगे तो वह भी नियमों की चौखट में ताकि पक्षपात का आरोप न लग सकें।

लेकिन क्या हम ये सब समझते हैं? हम पर जिन्होंने युद्ध लादा है वे योजनाबद्ध तरीके से काम कर रहे हैं। उन्होंने देख रखा है और सोच रखा है कि किस व्यक्ति को फोड़ना है, किस पार्टी को फोड़ना है, कौन सा व्यवसाय छीनना है, कहाँ पलायन करवाना है, कहाँ कब्जा करवाना है। उसके लिए लोग समर्पित होते हैं, पैसे देते हैं।

हम क्या करते हैं? क्या हम ये जानते भी हैं कि हमारे कितने व्यवसाय छीने गए? क्या हम ये सोचते हैं कि हम इनमें से कितने वापस ले सकते हैं और उसकी क्या कीमत देनी होगी? ये कीमत कौन देगा, कितने समय में रक़म खड़ी होगी, कितने लोगों का सपोर्ट कैसे और किस लेवल पर होगा – इससे अधिक लिखना फिज़ूल है इसलिए नहीं लिख रहा।

बाकी ज़कात का एक हिस्सा सरकारी अधिकारियों को अपनी तरफ करने इस्तेमाल करना है, अपने लोगों को छुड़ाने के लिए खर्च करना है, मुल्क की सत्ता पलटने की जो कोशिश कर रहे हैं उनके खर्चे के लिए हिस्सा है यह सब मौदूदी साहब अपनी तफ़सीर में लिख रखे हैं। और ज़कात तो फर्ज़ है। इतनी प्लानिंग, 1400 सालों से है।

और हमारी नज़र में धर्म और दान, फर्जीवाड़ा है।

देश की लड़ाई दूसरे देश से होती है। जब सरकार की अधिसत्ता या देश की संप्रभुता को चुनौती दी जाये तभी देश के नागरिकों पर सरकार कार्रवाई कर सकती है। आपका पाला अजगर आप को निगल रहा हो तो आप को या आप के घरवालों को ही उसे मारना होगा, सरकार आप का घर फोड़कर अंदर घुसकर उसे नहीं मार सकती।

‘आर्ट ऑफ वॉर’ पढ़ने की हिमायत मैं इसीलिए करता रहता हूँ। इंग्लिश में कई अनुवाद मुफ्त उपलब्ध हैं। इंग्लिश में हाथ तंग हो तो हिंदी अनुवाद कृपया खरीदकर पढ़ें। ’33 strategies of war’ भी अगर हिन्दी में उपलब्ध है तो उसे भी पढ़ें।

लोगों का प्रबोधन करें, संकट का सामूहिक रूप से मुक़ाबला कैसे हो इसपर विमर्श करें। अपनी इकोसिस्टम कैसे बने इसपर यथार्थपरक विमर्श करें। और यह बात कभी न भूलें कि जहां भी धनसंचय होगा उसके रक्षण के लिए योग्य जनसंचय नहीं करेंगे तो वह लुटेरों को आकर्षण और न्योता है। धन की रक्षा पर खर्च का हिसाब कर के ही धन संचय करना चाहिये।

योजना बनाइए और सरकार से मांगिए। केवल तुष्टीकरण टुच्चीकरण के उलाहने देकर ही ये पाँच साल भी गँवाने हैं क्या?

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यवहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति मेकिंग इंडिया (makingindiaonline.in) उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार मेकिंग इंडिया के नहीं हैं, तथा मेकिंग इंडिया उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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