उसे पता था पिता होने का मतलब, पैसे भले ना हो पर वह रखता था औकात

हम सबने देख लिया है कि बलात्कार व पैशाचिक अपराधों की शिकार हर उम्र की लड़कियाँ बन रही है। छह महीने की, ढाई साल की, पचास साल की।

अपराधियों की उम्र भी घटती जा रही है। निर्भया के बलात्कारियों में से एक नाबालिग था। आप पन्द्रह-सोलह साल के पुरुषों पर भी आंख बंद करके भरोसा नहीं कर सकते।

सालों पहले की घटना है। हमारे स्कूल के चारों तरफ बाउंड्री वॉल नहीं थी। घास काटने के लिये अक्सर गाँव की छोटी-छोटी लड़कियाँ आती रहती थी कैंपस के आस-पास।

एक दुपहरी एक बच्ची को नौवीं के लड़के ने दबोच लिया। उसे गलत तरीके से छुआ फिर जब लड़की शोर मचाने लगी तो उसे छोड़ दिया।

लड़का रसूखदार परिवार का था तो उसे घास काटने वाली का डर नहीं था। पर उसी शाम लड़की के पिता आये, लोहे की तार लेकर। बेटी को साथ लाये।

हॉस्टल के एक-एक कमरे में घुस कर लड़के को पहचान कर निकाला और फिर डेढ़ सौ बच्चों की भीड़ थी और लड़के की चीख थी। कोई शिक्षक भी सामने नहीं आया रोकने। फिर जब लड़का अधमरा हो गया तो डर से किसी तरह हाथ-पैर जोड़ कर उस पिता को रोका शिक्षकों ने।

वह धमकी देते हुये गये कि उस लड़के की हत्या कर देंगे और उस लड़के को भागना पड़ा रातों-रात। वह महीनों बाद वापस आया था।

उस गरीब आदमी के पास तो क्या ही रसूख होगा जिसकी बेटी घास काटती हो और जो खुद मजदूरी करता हो? क्या वह इतना बड़ा आदमी था कि एक सेंट्रल गवर्नमेंट के इंस्टिट्यूट में घुस कर किसी की जान इतने गवाहों के बीच लेने की कोशिश करने के बाद अंजाम से बच जाता? नहीं।

पर उस व्यक्ति को पिता होने का मतलब पता था। साहस का मतलब पता था। पैसे भले ना हो पर वह औकात रखता था।

नेशनल क्राइम ब्यूरो के अनुसार हर दिन देश में सौ बलात्कार की रिपोर्ट है पर उसके बाद पीड़ित के परिवार द्वारा हथियार उठाये जाने और बलात्कारी के टुकड़े-टुकड़े करने की दस रिपार्ट भी नहीं है। बस यही गैप जब तक नहीं भरेगा तब तक हैवानों से समाज नहीं लड़ सकता।

बॉलीवुड को कोसने से क्या होगा? सोनम प्लैकार्ड लेकर खड़ी हो भी गयी तो क्या होगा? मेरे सहानुभूति से क्या होगा? या आपका आक्रोश ही क्या करेगा? क्या हमारी औकात है कि हर हैवान को सजा दिला पाये? समाज सपोर्ट कर सकता है। पर समाज तब तक हथियार नहीं उठाएगा जब तक पीड़ित के अपने आर-पार की लड़ाई के लिये तैयार नहीं हो।

इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं इस देश में स्वाभिमान के लिये जान लेने-देने वाले वीरों और वीरांगनाओं से। देश-दुनिया के लिये ना सही तो भी कम से कम अपने परिवार के लिये जो बलात्कारी और इनके आस-पास के हर समर्थक की चमड़ी उधेड़ने की हिम्मत ना रखता हो, उनका सर्वाइवल मुश्किल है। ऐसे समाज का भी।

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