भारतीय राजनीतिक फिल्म का सबसे हिट डायलॉग : मैं, नरेन्द्र दामोदर दास मोदी…

गांधीजी के अहिंसा परमो धर्म के सिद्धांत को केंद्र बिन्दु में रखकर बनी दो फ़िल्में, मुन्नाभाई जिसमें से दूसरी फिल्म का नाम था ‘लगे रहो मुन्ना भाई’.

हालांकि मैंने वो दोनों फ़िल्में देखी हैं, लेकिन लगे रहो मुन्ना भाई के कुछ सीन आपको याद दिलाना चाहती हूँ –

पहला सीन – जब संजय दत्त गुंडों से पिटता है तो, गुंडा उसके एक गाल पर तमाचा मारता है, तो संजय दत्त अपना दूसरा गाल आगे कर देता है क्योंकि गांधीजी ने कहा है कि कोई आपके एक गाल पर चांटा मारे तो दूसरा गाल भी आगे कर दो. जब बदमाश उसके दूसरे गाल पर भी चांटा मारता है तो संजय दत्त पलटकर उसे तमाचा जड़ देता है, यह कहते हुए कि गांधीजी ने यह नहीं कहा कि दो चांटे खाने के बाद क्या करना है.

दूसरा सीन – लगे रहो मुन्ना भाई में बोमन इरानी याद है? जब उसके बिगड़े दिमाग को ठीक करने मुन्ना भाई सबको उसके घर फूल भेजने को कहता है. और उसका घर फूलों से लद जाता है. मारे शर्मिन्दगी और क्रोध के वह किसी भी तरह से प्रतिक्रया नहीं दे पाता, क्योंकि फूल भेजना कोई गुनाह नहीं..

‘जय श्री राम’ कहने पर हुए ममता बेनर्जी के क्रोध को देखकर मुझे वही बोमन इरानी याद आता है. और याद आ रहे हैं वो फूल जो आजकल सोशल मीडिया में पोस्ट कार्ड के रूप में प्रचारित प्रसारित हो रहे हैं.

सोशल मीडिया पर लोग पोस्टकार्ड पर ‘जय श्री राम’ लिखकर ममता बेनर्जी के पते पर भेजने की मुहिम चला रहे हैं. बहुत सुन्दर तरीका है यह. उनके क्रोध और चुनाव के दौरान हुई हिंसा का जवाब हम अहिंसक रूप में ऐसे दे रहे हैं.

यहाँ मैं न मुन्ना भाई फिल्म की तारीफ़ करने आई हूँ, न ममता के लिए चलाए जा रहे मुहिम की प्रशंसा करने आई हूँ.

जैसे गांधीजी को केंद्र बिंदु में रखकर एक फिल्म अद्भुत सफलता पाती है, उस फिल्म के चरित्र के नाम हमेशा के लिए बॉलीवुड के रजिस्टर में दर्ज हो जाते हैं, कभी नाम, वास्तव जैसे अंडरवर्ल्ड की फ़िल्में करने वाले और वास्तविक जीवन में भी इस तरह के कृत्य के लिए जेल भुगत रहे संजय दत्त का चरित्र मात्र एक फिल्म के कारण इतना अधिक सहानुभूति को प्राप्त होता है कि लोग उनके सारे कर्मों को भुलाकर हमेशा के लिए मुन्ना भाई के रूप में ही स्वीकार कर लेते हैं.

तो अब मुद्दे की बात, गांधी कौन थे, कैसे थे, क्या किया, क्यों किया, कौन सही, कौन गलत जैसी व्यर्थ की बहस में पड़ने के बजाय एक व्यक्ति गांधीजी को केंद्र बिन्दु में रखकर एक राजनीतिक फिल्म बना रहा है, जिसमें सारे मसाले हैं. प्रेम कहानियां, सामाजिक सन्देश, विलेन की नकारात्मक भूमिका, लड़ाई, झगड़ा, पूजा पाठ, प्रार्थना, अध्यात्म, राजनीतिक कूटनीतियाँ और सबसे ऊपर राष्ट्रनीति.

जी हाँ मैं बात कर रही हूँ हमारी राजनीतिक फिल्म के हीरो प्रधानमंत्री मोदी की… जिनका शपथ लेते हुए सिर्फ अपना नाम बोलना भी अमिताभ बच्चन के डायलॉग “मैं, विजय दीनानाथ चौहान” की तरह ही हिट हो जाता है… “मैं नरेन्द्र दामोदर दास मोदी…. ”

ये भारतीय राजनीति में जितने भी बोमन इरानी की तरह बिगड़े दिमाग के हैं ना उनका थोबड़ा, पकड़कर गांधी की तरफ कर दिया है मोदीजी ने…

आपको तो पता ही है, फिल्म में संजय दत्त के अलावा गांधीजी किसी को नज़र नहीं आते.. तो यहाँ भी मोदीजी के अलावा गांधीजी किसी को नज़र नहीं आ रहे… लेकिन उनकी उपस्थिति हर कोई अनुभव कर रहा है किसी न किसी रूप में…

बहुत सारे फूल भी मोदीजी अलग अलग माध्यम से लोगों तक पहुंचा रहे हैं, चाहे तीन तलाक का मामला हो, राम मंदिर के लिए अंदरखाने में चल रही गुप्त समितियां हों, सेना को दी जा रही सुविधाएं हों, और सबका साथ सबका विकास के सबसे सुगन्धित फूल हो, विपक्षी बस कुंठा और क्रोध से कसमसा कर रह गया है…

और सबसे बड़ी बात, जब दो गाल पर चांटे खाने के बाद सर्जिकल स्ट्राइक और पुलवामा का बदला होता है तो यह दुश्मनों को पलटकर दिया गया तमाचा है यह कहते हुए कि – गांधी जी यह नहीं बता गए कि दो गाल पर चांटा खाने के बाद क्या करना है…

तो यह फिल्म तो पांच साल तक के लिए फिर हिट हो गयी है… और आने वाले पांच सालों तक विपक्षियों और विरोधियों के कानों में यह डायलॉग गूंजता रहने वाला है… “मैं नरेन्द्र दामोदर दास मोदी… ”

और हम दर्शक उनके हर डायलॉग (कार्य) पर ताली बजाएंगे और सीटी बजाएंगे… और उनकी फिल्म अधिक से अधिक देखकर उसे 2024 के लिए नई फिल्म बनाने के लिए उत्साहित करेंगे…

इसलिए गांधी को लेकर उन्हें ताने मारने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि पिक्चर अभी बाकी है दोस्त…

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