राष्ट्रवाद और उसका चीरहरण

भारत के इतिहास में वर्ष 2014 से ज्यादा 2019 एक अतिमहत्वपूर्ण शिलापट है। यूं देखा जाय तो इन 5 वर्षो में बहुत कुछ बदला है लेकिन फिर भी इसमें एक समानता भी है।

यह समानता है – धैर्य की शून्यता लिए राष्ट्रवादियों का विरोधियों के साथ साथ, स्वयं के नेतृत्व पर उपहास, कटाक्ष और तिरस्कार से भरे शस्त्रों से, विशुद्ध रूप से असमय आक्रमण।

मुझ को अच्छी तरह याद है कि 2014 में भी, 16 मई को चुनाव जीतने के बाद, एक तरफ जहां मोदी समर्थक एक तरफ विरोधियों की खबर ले रहे थे, वहीं आपस में मर्यादाहीन स्तर तक, मोदी जी द्वारा गठित होने वाली कैबिनेट और वरिष्ठ नेताओं को लेकर भिड़ गये थे।

यह जो आपस की मारा मारी थी इसको लोगों ने बड़े गर्व से अपनी विचारधारा की विशेषता बताई थी, जो उन्हें नेतृत्व की अतार्किक, धैर्यहीन व संशयात्मक आलोचना का पूरा अधिकार देता है।

हम राष्ट्रवादी 2014 से कर क्या रहे थे? हम पिछले 5 वर्षों से वामपंथियों, कांग्रेसियों, आपियों, इस्लामियों, लिबरलों, धर्मनिरपेक्षता-वादियों और चर्च से अलग अलग या फिर उनके सामूहिक गिरोहों से लड़ते रहे है। अब यह लड़ना लोगों के चरित्र में इतना घुस गया गया कि इस लड़ने ने, उन्हें ज्ञान व श्रेष्ठता के अहंकार के नागपाश में जकड़ लिया है। लोगों ने अपनी प्राथमिकताओं से अपना ही मन बांध लिया है।

इनके पास भारत व हिन्दुओं की विकराल समस्याओं का सारा समाधान होता है लेकिन वे मूर्त रूप में उस समाधान तक पहुंचने की व्यवहारिकता को किनारे कर, दूसरे के कर्तव्यों व दायित्वों की झोली में डाल आते है।

बात यही तक नहीं रुकती है, समस्याओं के समाधानों के लिए जो रास्ते वे अपनी परिकल्पना में खींचते है, उन्हें केवल सिर्फ उसी में उजाला दिखता है और इन रास्तों को बनाने के लिए जिन्हें वे चुनते है, उनके रास्ते अंधकारमय लगते है।

यही वह कारण है कि लोगों के समाधान, भारत की 130 करोड़ की भिन्नता लिए समाज की चुनौतियों की विषमताओं के आगे, उन्हें असहिष्णु, अविवेकी व अधैर्यशील बना देते हैं।

यही वह सब कुछ है जो पिछले तीन दिनों से राष्ट्रवाद को अतिरेकी राष्ट्रवादी, अत्यंत राष्ट्रवादी, नवागन्तुक राष्ट्रवादी, बुद्धिजीवी राष्ट्रवादि, हिंदुत्ववादी राष्ट्रवादी मनीषियों से ही लड़ा रहा है। ये सब इतने स्वयंभूतत्व से ग्रसित है कि इन्हें वाकई यह प्रगट है कि वे अपने द्वारा चुने व पिछले 5 वर्षों में भारत की जनता की दृष्टि में सफल और आशा की पुंज बने प्रधानमंत्री से ज्यादा बुद्धिमान, श्रेष्ठ, निष्कपट और दूरदर्शी हैं।

जब हमने पिछले 5 वर्षों में यही किया है और अंत में यही पाया कि हमारा चुनाव सही था, तब यह पूर्वाग्रही आलोचना या बाल की खाल निकलना क्यों? क्यों, व्यर्थ की बातों में ऊर्जा व्यर्थ करना? जिस कथानक को आपका विरोधी बढ़ाना चाहता है उसी में सहयोग क्यों? हम जब हृदय से विरोधियों से घृणा करते हैं तो उनकी अपने नेतृत्व व लक्ष्य के प्रति आस्था से, जीवंत संघर्ष करने की क्षमता से सीखते क्यों नही?

राष्ट्रवाद में न मैं है, न हम तुम, इसमें सिर्फ राष्ट्र निहित है और राष्ट्र का नवनिर्माण करना कोई हवाई किला बनाना नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी नव सांसदों के साथ, हम सभी को एक शिक्षा दे चुके हैं कि प्रतिक्रिया देने में जल्दीबाज़ी न करें क्योंकि ब्रेकिंग न्यूज़ की तर्ज़ पर अभिव्यक्ति देने की जल्दी, हमें सिर्फ ठोकर देती है।

यह बहुत सम्भव है कि उनकी कई बातें पसन्द नहीं आ रही होंगी लेकिन जब तक दिशा नहीं देख लेते तब तक तो धैर्य रखा ही जा सकता है! यदि यह सम्भव नहीं है तो 2024 के लिए विकल्प या तो खुद बनिए या ढूंढिए क्योंकि 2024 में भी आना तो इसी को है।

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