मोदी विरोधी नहीं हो, मतलब मोदी समर्थक हो! क्या यही हैं पत्रकारिता के मायने?

मोदी समर्थक पत्रकारिता और मोदी विरोधी पत्रकारिता का एक भयंकर झूठ फैलाया जा रहा है।

जो लोग यूपीए काल में सरकार द्वारा पोषित पत्रकार रहे, वह उस मानसिकता से कभी बाहर निकल ही नहीं पाए।

फिर तत्कालीन सरकार के कार्यकर्ताओं ने उन्हें हाथों-हाथ लिया और मोदी विरोधी मानसिकता के फॉलोअर्स के वह हीरो बन गए।

आज वही लोग मोदी के खिलाफ लिखने को बुद्धिजीवी पत्रकारिता का पैमाना बता रहे हैं।

मुझसे कहा गया कि आप मोदी के समर्थन में बातें क्यों लिख रहे हैं? मैं पूछता हूं मैं मोदी का बेवजह विरोध क्यों करूं? क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि कथित बुद्धिजीवी पत्रकारों ने मोदी विरोध को ही अच्छी पत्रकारिता का पैमाना बना दिया है।

ऐसे कथित पत्रकार इतना नीचे गिर गए हैं कि वह सिवाय नकारात्मकता के अपने इर्द-गिर्द और कुछ नहीं देख पा रहे हैं। जनता का फैसला आ चुका है अब उसमें हिंदू-मुस्लिम पोलराइज़ेशन, जातिगत समीकरण, ईवीएम और जाने क्या-क्या खोजने में लगे हुए हैं।

जब यह फैसला नहीं आया था तब भी मैं उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल पर अपने अनुभव लिखता रहा था। मैंने कहा ‘उज्ज्वला’ और ‘घर-घर शौचालय’ जैसी योजनाओं से ग्रामीण महिलाएं खुश हैं और फर्स्ट टाइम वोटर ‘स्किल डेवलपमेंट’ और ‘स्टार्टअप इंडिया’ से उम्मीद लगाए बैठा है।

यह बातें मैंने उत्तर प्रदेश के 40 से ज्यादा जनपदों और गांव में जाकर लोगों से बात करने के बाद कही थीं। इसे मोदी का प्रचार कह दिया गया।

कमियों की बात करें तो इन्हीं योजनाओं का ठीक तरीके से क्रियान्वयन एक बड़ी चुनौती है। मोदी के मंत्रियों से हुए मेरे इंटरव्यूज़ में आप देख सकते हैं मेरा पूरा ध्यान इन्हीं सवालों पर था कि योजनाएं अच्छी हैं लेकिन इनका क्रियान्वयन ज़मीनी स्तर पर इतनी मज़बूती से नहीं हो पा रहा है जितना होना चाहिए।

आज भी ज़रूरत है इस बड़े मैंडेट का सम्मान करते हुए ज़िम्मेदारी को समझा जाए। अभी मोदी पर जनता ने विश्वास जताया है यह समय ठीक नहीं कि फौरन उनकी आलोचना पर उतर जाएं। उनके कामों की समीक्षा की जाए और सही कामों के लिए अपने सुझाव भी रखे जाएं।

मुझे पत्रकारिता के यह मायने समझ में आते हैं। जहां बात गलत है उसे पुरज़ोर तरीके से उठाया जाए। जहां जानबूझकर चीज़ों को मोदी या सरकार से जोड़ने का सश्रम प्रयास किया जा रहा है उसे खारिज किया जाए और उससे बचा जाए। खास तौर पर हर बात को हिंदू-मुस्लिम से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं ऐसा लग रहा है विपक्ष ने अभी से अगले चुनाव के लिए अपनी कोशिशें जारी कर दी है।

दरअसल कांग्रेस की सबसे बड़ी कमज़ोरी यही रही कि उसने भेदभाव की राजनीति की। यह उस पर कितनी भारी पड़ी है इसका अंदाज़ इस बड़े बहुमत से लगाया जा सकता है। भारत नफरत की राजनीति को खारिज करता है इसी को पालने पोसने का काम अपनी तुष्टिकरण की राजनीति से कांग्रेस ने किया।

अब कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह सिर्फ मुस्लिम मतदाताओं में ही नहीं बल्कि देश के हर मतदाता में अपनी लोकप्रियता को साबित करे। प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ मुस्लिम विरोधी होने के आरोप निराधार हैं। जो लोग यह दावे कर रहे हैं कि मुस्लिम प्रधानमंत्री मोदी के साथ नहीं वह इसी नफरत की राजनीति को पालने पोसने का काम कर रहे हैं।

देश में जितनी भी योजनाएं लागू हुई हैं उनमें हिंदू मुसलमान का कोई भेद नहीं है। अलबत्ता मुस्लिम समुदाय के लिए कुछ बेहतर योजनाएं ही लागू की गई हैं जैसे उस्ताद योजना।

यह बात भी सच है कि आने वाले समय में देश की अन्य चुनौतियों के साथ साथ मुस्लिमों के भीतर जो नफरत कांग्रेस और विपक्षी दलों द्वारा भरी गई है उसे निकालने का भी प्रयास प्रधानमंत्री मोदी को ही करना है हालांकि यहां तुष्टीकरण की उसी राजनीति से बचने की जरूरत होगी जो कांग्रेस को ले डूबी।

इसी तरह हिंदू और हिंदुत्व को ज़रा भी ना समझने वाले हिंदुत्व के डंके बजाने से भी बचें। जिन्होंने वेदांत अद्वैत, विवेकानंद और शंकराचार्य की तरफ कभी झांका नहीं, वह ईश्वर के लिए हिंदुत्व का राग न अलापें। किसी मज़हब से नफरत करना हिंदुत्व नहीं होता है।

(तस्वीर नौजवान हिंदुस्तान कार्यक्रम की है। देशभर के मुस्लिम युवा आईएएस आईपीएस बन कर देश के सांगठनिक ढांचे में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं ऐसे ही कुछ युवाओं के साथ जो वर्तमान सरकार के कामकाज से खुश भी हैं और मुस्लिमों की स्थिति को सुधारने के पैरोकार भी हैं)

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