क्या मोदी को देश नहीं चलाने देना है- किसी भी कीमत पर?

अमेठी में सुरेन्द्र सिंह की हत्या हाइलाइट इसलिए हुई क्योंकि वे स्मृति ईरानी के प्रमुख कार्यकर्ताओं में से थे। हाइ प्रोफ़ाइल चुनाव क्षेत्र और प्रत्याशी के कार्यकर्ता होने से उनकी हत्या भी हाइलाइट हुई।

हत्या में कोई रामचन्द्र नाम के काँग्रेस समर्थक व्यक्ति का नाम पढ़ा। उन्होंने चार लोगों को यह काम सौंपा था। सभी हिरासत में हैं।

लेकिन उसके साथ साथ ही महाराष्ट्र के अकोला डिस्ट्रिक्ट में मोहल्ला नामक गाँव में मतीन पटेल नाम के एक मुस्लिम की मृत्यु, उसी के समाज के हिदायत पटेल और दस लोगों द्वारा की मारपीट के कारण हुई। मतीन पटेल के बड़े भाई भी घायल हैं और मौत से जूझ रहे हैं। यहाँ बात ये है कि मतीन पटेल भाजपा के माइनॉरिटी विंग के कार्यकर्ता थे और हिदायत पटेल काँग्रेस समर्थक। वो भी हिरासत में है।

अब मुद्दे पर आते हैं। ऐसी हत्याएँ दहशत फैलाती हैं। यह आपसी रंजिशों में की गयी हत्याएँ नहीं होती, इनके पीछे एक संदेश होता है कि यह भाजपा का समर्थन करने का दंड है। और दु:ख की बात यही है कि इन हत्यारों को कानून उतनी ही सज़ा दे सकता है जितना उसके नियमों में लिखा है।

देखते जाइये, सुरेन्द्र सिंह की हत्या का कारण कुछ और बताया जाएगा, बिलकुल उस तरह जैसे इसाप नीति के भेड़िये ने मेमने को बताया था। उसे झूठ ठहराने के लिए सुरेन्द्र सिंह तो हैं नहीं, तो वही कारण अधिवक्ता और मीडिया द्वारा स्थापित किया जाएगा कि यह हत्या सुरेन्द्र सिंह की हुई है, स्मृति ईरानी के कार्यकर्ता की नहीं। मतीन पटेल का मामला तो कहीं आयेगा ही नहीं।

हत्याएँ और भी कई होंगी, रोकी नहीं जा सकती। कितने लोगों को बिना कोई आधार के संरक्षण देंगे और कितनों को बिना कोई आधार अरेस्ट करेंगे? यह संभव ही नहीं है। साधारण कार्यकर्ता को कौन सा संरक्षण मिलेगा?

कोई धमकी भी नहीं मिलेगी, और हत्यारा कोई बाहरी व्यक्ति होगा या फिर एक्सीडेंट तो आसान है। बस खुन्नस से देखते जाओ, आदमी का मनोबल ऐसे ही टूट सकता है जब उसे पता है कि वह कुछ कर नहीं सकता। अवसाद, अवसादजन्य रोग, इन सब की कोई सज़ा नहीं होती। अनाम आतंक की भी।

और एक-दो सामान्य और असंरक्षित लोगों की हत्याओं की कीमत ही क्या होती है? कौन से सुपर स्पेशलिस्ट हत्यारों को विदेश से लाना है? हत्यारे भी साधारण गुंडे हैं जिनकी ज़िंदगियां महंगी नहीं हैं।

वैसे भी ये लोग कोई करियर वाले तो नहीं होते जो कुछ सालों की जेल उनकी ज़िंदगी खराब कर दे। और जितना कमा सकते थे उससे कई गुना मुआवज़ा मिले तो बात ही क्या है। सज़ा कम तो हो जाएगी, जेल में व्यवस्था भी हो जाएगी और बाहर आने पर दबदबा बढ़ेगा, वो बोनस।

क्रूर सज़ाओं से इस पर रोक लग सकती है लेकिन उन सज़ाओं को घृणित और जंगली वहशी आदि बताकर कानून ने ही गुनहगारों को सरकारी मेहमान बना दिया है।

जब No Modi at any cost की तैयारी थी, तो मोदी को देश नहीं चलाने देना है – at any cost महंगा थोड़े ही है ऐसे लोगों के लिए? चिल्लर खर्चा है।

इसका इलाज आसान नहीं है और वैसे भी काफी विनाशकारी ही है। ‘एनकाउंटर’ को समाज ने मान्यता क्यों दी थी (अदालत ने नहीं) इसे याद कीजिये। लेकिन पता ही नहीं चला कि एनकाउंटर कब सुपारी बन गया।

माँ काली रक्षा करें। जय हिन्द।

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