सोशल मीडियाई आलोचकों, ये निष्पक्षता नहीं निष्क्रियता है

2014 से ही कई मोदी-समर्थकों को भ्रम है कि सिर्फ चुनाव के समय पूरी तरह नरेंद्र मोदी का समर्थन कर देना समझदारी है और उसके बाद चार सालों तक जहाँ जो बात उनके मन-मुताबिक न हो, उसके लिए मोदी को गालियाँ देना उस चुनावी समर्थन के बदले उनका अधिकार है। कइयों को यह भी लगता है कि यही निष्पक्षता है और सोशल मीडिया पर अपनी सरकार की आलोचना कर लेने से उनका राष्ट्रीय कर्तव्य पूरा हो जाता है।

यह बहुत गलत सोच है और इसमें बदलाव होना अति-आवश्यक है। दुर्भाग्य की बात यह है कि ज्ञानी समझे जाने वाले कई लोग स्वयं भी यही बातें दोहराने की गलती करते रहते हैं और उनके हज़ारों समर्थक भी उन्हीं की बात पढ़कर उसी गलत विचार पर चलते जाते हैं।

सरकार किसी भी पार्टी की हो, वह कुछ गलत करे या निष्क्रिय रहे, तो उसकी आलोचना करना सही है और आवश्यक भी है। लेकिन केवल इतना कर लेने से न कोई समस्या सुलझेगी और न आपका कर्तव्य पूरा होगा।

हमारे देश की एक बहुत बड़ी गलती यह है कि लोग हर समस्या को सरकारी समझते हैं और इसलिए उसका हल सरकार से चाहते हैं। लगभग हर कोई यही समझता है कि समस्या हल करना सरकार का काम है और वही इसे कर सकती है, इसलिए सरकार को उपदेश दे देने से हमारा कर्तव्य पूरा हो जाएगा और हर समस्या सुलझ जाएगी।

यह सोच ही मूलतः गलत है।

हमारे देश की अधिकांश समस्याएँ ऐतिहासिक, सामाजिक या धार्मिक हैं। अधिकाँश समस्याएँ सैकड़ों सालों से चली आ रही हैं, जब न सरकारें थीं, न संविधान था और न लोकतंत्र था।

आप अपने मोहल्ले में नाली खुदवाना और सड़क बनवाना चाहते हैं, तो यह काम सरकार का है; आप अपने लिए अच्छे स्कूल और अस्पताल चाहते हैं, तो यह काम भी सरकार का है; आप दुनिया की नज़रों में भारत को सम्मानित और शक्तिशाली देखना चाहते हैं, तो यह काम भी सरकार का ही है।

लेकिन आप जिन दूरगामी समस्याओं की चिंता करते हुए दिखाई देते हैं, आप अक्सर सभ्यताओं के जिस संघर्ष की याद दिलाते रहते हैं, आप देश के बाहर और भीतर से उभर रहे जिन खतरों की ओर संकेत करते रहते हैं, आप समाज को तोड़ने वाले और लड़वाने वाले जिन कारकों का बार-बार उल्लेख करते रहते हैं, उनकी जड़े सामाजिक, धार्मिक और ऐतिहासिक हैं, सरकारी नहीं। इसलिए उनके समाधान भी आपको धर्म से, इतिहास से और सामाजिक परिवर्तन से ही मिलेंगे।

हर बात के लिए सरकार की तरफ देखते रहने से आपको कभी भी दीर्घकालिक समाधान और चिरस्थायी सफलता नहीं मिल सकती। इंजीनियर वही काम करता है, जो काम इंजीनियर का है, जो काम सर्जन का है, उसके लिए आप इंजीनियर के भरोसे मत बैठिये।

कितना ही कुशल इंजीनियर क्यों न हो, वह सर्जन का काम नहीं कर पाएगा और फिर आप उसकी आलोचना करके स्वयं को निष्पक्ष होने की तसल्ली तो दे सकते हैं लेकिन समस्या का समाधान कभी नहीं पा सकते।

केवल सरकार को कोसकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेना निष्पक्षता नहीं, निष्क्रियता है।

समस्याओं के समाधान ढूँढने की जितनी ज़िम्मेदारी सरकार की है, उतनी ही समाज की भी है। लेकिन अक्सर यही दिखाई पड़ता है कि सरकार से ज्यादा समाज निष्क्रिय है और अधिकांश समस्याओं का कारण वहीं है।

देश सरकार का नहीं है, सरकार देश की है और देश के लिए काम कर रही है। लेकिन देश समाज का है, देश आपका है। जो समस्याएं सरकारी हैं, उन्हें सरकार अपने स्तर पर और अपने तरीके से सुलझाती है। लेकिन जो समस्याएं समाज की हैं, वे समाज को सुलझानी पड़ेंगी, आपको सुलझानी पड़ेंगी।

अपने स्तर पर आप एकजुट होकर क्या कर रहे हैं, यह आपको ज़रूर सोचना चाहिए। आपको इस बात का जवाब मिल जाएगा कि इतनी सरकारें आई और गईं, लेकिन देश की अधिकतर समस्याएं सुलझती क्यों नहीं हैं।

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  1. Isliye hi hamari sanskriti manav ko apne itihaas bhartiya prampra aur grantho ka pathan pathan aur us pr manan chintan kisi shiksha deta he. Yahi bat gita ramayn aur satyarth prakashan me batao gayi he. Aaj hm pathanpathan chintan aur manan ko bhul re ja rhe he. Aaj ki nai shiksha pranali itihaas sanskriti aur gita aadi ko bakvas samjhne kisi shikshak de rhi he. Sudhar ghar se karne ki aawaskta he. Hamaare sudhar jaye to samaj sudhrega. Sarkari ke liye samsya hami paida karte he aur sudharne ka jimma sarkari pr daldena chahte he. Is choch ko badalna jaruri he. Isdisha me sarkar kuch kare to achha he.

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