दो से दोबारा : जीत के निहितार्थ

नरेन्द्र मोदी की दुबारा जीत दो चार ज्वलंत कारकों से हमें दो चार करवाती है जिनमें कुछ एक हैं… मतदाताओं का बदलता मिजाज़, बहुदलीय जनतंत्र के माध्यम से वंशवाद और भाई-भतीजावाद के बैकडोर एन्ट्री का रहस्योद्घाटन, राजनैतिक आरोपों का न्यायालय द्वारा बेबुनियाद साबित होना, कांग्रेस का नेहरु के नाभिनाल संरक्षण की अतार्किक और लगातार कोशिश और आखिर में भारतीय बुद्धिजीवियों का आम भारतीयों को लगातार बुद्धू मानकर अपमानित करने की पंच वर्षीय योजना का मतदान द्वारा समयानुकूल प्रत्युत्तर।

आज तक राजनेता जनता को पप्पू और लल्लू बनाते रहे हैं पोस्ट पोल अलायेन्स के नाम पर (अटल की 13 दिनी सरकार का विश्वास प्रस्ताव पराजय, चरण सिंह, चंद्रशेखर, देवगौडा, गुजराल आदि को याद करें) पर इस बार जनता ने राजनेताओं को पप्पू लल्लू बना दिया।

कुछ नेताओं को कभी हिंदू तो कभी सेकुलर दिखने की बीमारी हो गई थी उसका पक्का वाला इलाज हो गया, 5 साल की गारंटी के साथ। केंद्रीय विश्वविद्यालय के परिसर में भारत विरोधी नारे लगा कर या उनका समर्थन कर जो युवा बुद्धिजीवी दिखने का प्रयास कर रहे थे या विश्वपटल पर भारतीय सत्ता को असहिष्णु साबित कर रहे थे वे सब सहिष्णु हिन्दुस्तान की धूल चाटते नज़र आए।

बोफोर्स घोटाले और एण्डरसन के पलायन के आरोप से दग्ध पार्टी के ध्वजवाहक ने जब राफेल घोटाला और माल्या, नीरव, चौकसी जैसे के सेफ पैसेज का दाग सत्ता पर लगाने की कोशिश की तो सत्ता के नौसिखिए प्रवक्ताओं ने सरकार का बचाव तो ठीक से नही किया, पर मतदाताओं को ये समझते देर नहीं लगी कि ये आरोप बस बरसाती मेंढक की तरह चुनावी बारिश के मौसम में टर्र टर्र करेंगे और ऋतु बीतते ही शीत निद्रा में चले जायेंगे अगली बारिश तक।

कुछ निष्पक्ष पत्रकार, विरोधी दल की भूमिका से दस कदम आगे बढ़ कर भारतीय संस्कृति विरोधी और भारतीय संप्रभुता विरोधी तक बन गये तो कुछ सत्ता का समर्थन करते हुए चमचत्व को प्राप्त होते दिखे। परिणामस्वरूप जनता ने मीडिया रिपोर्टो (प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक) को तवज्जो देना छोड़कर स्वविवेक से मतदान किया। यह मतदाताओं के स्वस्फूर्त जागरण का प्रमाण बना।

एक और मार्के की बात हुई… मतों का ध्रुवीकरण, वह भी जाति से ऊपर उठ कर देश हित में। पुलवामा हमले के बाद सरकार की एयर स्ट्राइक ने 72 हजारी सालाना सुनिश्चित आय के चुनावी प्रलोभन की हवा निकाल दी। राष्ट्रहित के मुकाबले आरक्षण और दलित विमर्श टिक नहीं पाए। अभिनव अम्बेडकर बनने की राहें दुश्वार होती चली गईं।

एक बात रह गई…

कांग्रेस क्षेत्रीय दल की भूमिका में आ गई है, शेष दल खुद को वन टाइम वंडर मानकर संतोष कर सकते हैं कि एक थे हम किंग मेकर।

निश्चित रुप से प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष की मेहनतकश जोड़ी ने शीर्ष स्थिति को अक्षुण्ण रख कर अपने कार्यों की ईदी, रमजान और रोजे के महीने में हासिल कर ली वह भी ईद से पहले।

पर उन्हें विषमता रहित भारत बनाना है ये बात रखनी पड़ेगी जैसे कश्मीर से 370 और 35 ए का लोपन या शिथिलीकरण, समान नागरिक संहिता, दल बदल कानून की तरह संप्रदाय बदल कानून, गो हत्या रोकने के साथ गोपालन कानून भी… ताकि सड़क पर भटकती पॉलिथीन गटकती गायों और बूढ़ी गायों को भी सुरक्षा मिल सके।

सत्ता के लिए दो सुझाव कि इस सूचना प्रौद्योगिकी के काल में अपने स्थान से दूर रह रहे मतदाता को भी मतदान की सुविधा दी जाए, चाहे आधार से लिंक कर इंटरनेट की सहायता ली जाए।

और दूसरा कि हिंदी या किसी भी भारतीय भाषा को राष्ट्र भाषा बना कर उससे अंग्रेजी की राजमाता वाली गद्दी खाली करवाई जाए अर्थात् हर संविधान नियमावली का हिंदी अनुवाद ही मानक हो। विश्व संपर्क भाषा के रूप में अंग्रेजी को स्वीकार्यता है और रहे।

आरक्षण पर कुछ नहीं कहना पर सबको शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा मुफ्त मिले साथ ही शिक्षा के दौरान एक कौशल जरूर सिखाया जाये जो हर व्यक्ति को आजीविका दिलाए, नौकरी नहीं।

अगर ऐसा करने की कोशिश भी इस सरकार ने की तो उसे किसी भी चुनाव में अपदस्थ करना कठिन होगा और ऐसा नहीं हुआ तो हर दोबारा में ‘दो’ तो छिपा ही है।

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