‘भागीदारी’ और ‘विश्वास’ की नींव पर राष्ट्र निर्माण कर रहे हैं मोदी, न कि बाज़ारू ‘कॉन्ट्रैक्ट’ पर

25 मई को एनडीए के नए सांसदों को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि 2014 से पहले का चुनाव कॉन्ट्रैक्ट टाइप बन गया था, जिसमें लोग 5 साल के लिए सिर्फ किसी को चुन लेते थे और अगर वह ठीक काम नहीं करता तो उसे हटा देते।

इसका उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि 2014 में देश भागीदार बना। लेकिन ये कोई कॉन्ट्रैक्ट नहीं है, ये हमारी संयुक्त जिम्मेवारी है। सबका साथ, सबका विकास और अब सबका विश्वास ये हमारा मंत्र है।

फिर आगे प्रधानमंत्री ने कहा कि जो हमारे साथ थे, हम उनके लिए भी हैं और जो भविष्य में हमारे साथ चलने वाले हैं, हम उनके लिए भी हैं।

अर्थात प्रधानमंत्री ने देश की जनता को समर्थन और विरोध के दायरे से परे कर दिया है और यह विश्वास व्यक्त किया कि जो आज विरोध में खड़े है, वे भविष्य में उनको समर्थन देंगे।

मैं पहले लिख चुका हूँ कि राजनीति शास्त्र में ऐसा माना जाता है कि राज्य (राष्ट्र) की उत्पत्ति और उसकी वैधता का आधार प्रत्येक व्यक्ति के मध्य social contract या सामाजिक अनुबंध है। सभी व्यक्तियों ने अपनी स्वयं की और संपत्ति की सुरक्षा, एवं अपने मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए आपस में, अपनी स्वेच्छा या वास्तविक इच्छा से यह करार किया कि हर व्यक्ति एक-दूसरे के अधिकारों का हनन नहीं करेगा, एक-दूसरे की जान नहीं लेगा और इस करार को लागू करने ले लिए वह अपने कुछ अधिकारों का त्याग कर देगा।

इसी कॉन्ट्रैक्ट ने संविधान का रूप लिया। लेकिन भारत तथा अन्य लोकतांत्रिक देशों के सन्दर्भ में यह अनुबंध एक तरह से बाज़ारू या लेन-देन का कॉन्ट्रैक्ट हो गया।

लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने यह कहकर कि सत्ता कोई कॉन्ट्रैक्ट नहीं है, बल्कि ये सबकी भागीदारी है, संयुक्त जिम्मेवारी और सबका विश्वास है, इस कॉन्ट्रैक्ट का आधार नैतिक बना दिया है।

प्रसिद्ध फ़्रांसिसी विचारक जाँ जाक रूसो का मानना था कि लोगों को अक्सर अपनी ‘वास्तविक इच्छा’ पता नहीं होती और कहा कि एक यथोचित समाज तब तक नहीं बन सकता जब तक एक महान नेता जनता के मूल्यों और प्रथाओं को बदलने के लिए तैयार नहीं होता।

इसी बात से ही तो छुटभैये नेता डरते हैं। उनका डर सत्ता या अपने अरबों के काले धन को खोने का नहीं है। उन्हें भय तो इस बात का है कि प्रधानमंत्री तो हर व्यक्ति के घर में प्रवेश कर गए हैं, उन्होंने हर व्यक्ति को उसकी ‘वास्तविक इच्छा’ या real will का प्रयोग करने को प्रोत्साहित किया।

प्रधानमंत्री मोदी ने हमें अपनी और राष्ट्र के मूल्यों और प्रथाओं को बदलने के लिए प्रोत्साहित किया। अब हमारे राष्ट्र की नींव एक ऐसी सामाजिक आधार पर रखी जाएगी, जो नैतिक होगा क्योंकि उसमें हम सब की पहली बार सौ प्रतिशत भागीदारी होगी।

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