अब ‘ब्रांड मोदी’ की बजाय ‘ब्रांड भाजपा’ पर काम करने का समय

भारतीय क्रिकेट टीम हमेशा बड़े नामों से भरी रही है। कपिल देव, सुनील गावस्कर, संदीप पाटिल, दिलीप वेंगसरकर, मोहिंदर अमरनाथ, मनिंदर सिंह, सैयद किरमानी जैसे खिलाड़ियों को 60-70 के दशक में जन्में अनेक लोगों ने खेलते देखा है।

लेकिन उस समय भारतीय टीम को ‘कागज़ के शेर’ कहा जाता था क्योंकि कागज़ के ये शेर अक्सर मैदान पर उस समय ढेर हो जाते थे जब उनसे पूरे देश को बेहद उम्मीदें होतीं थीं। उसका कारण केवल एक ही था एक टीम की तरह न खेलते हुए स्वयं के लिए खेलना, स्वयं के रिकॉर्ड पर ज़्यादा ध्यान देना या स्वयं को खेल से ऊपर मानकर चलना।

फिर अस्सी के दशक में भारतीय टीम में प्रवेश होता है सचिन तेंदुलकर का, महज़ 16 वर्ष की उम्र, दुबली पतली कद काठी, ऊँचाई भी कम और सामने पाकिस्तान के तेज़तर्रार गेंदबाज़ जैसे इमरान खान, वकार यूनुस, वसीम अकरम।

अपने करिश्माई खेल से सचिन ने न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया को आश्चर्यचकित करके रख दिया। समय बीतते बीतते सचिन की स्थिति ऐसी हो गई कि लोग तभी तक टीवी पर मैच देखते जब तक सचिन क्रीज़ पर है, कई लोग तो स्टेडियम से भी सचिन के आउट होते ही निकल आते थे।

सचिन.. सचिन… की आवाज़ से मैदान गूँज उठता था, लेकिन यहीं से भारतीय टीम में एक और बड़ी कमज़ोरी पैदा हो गई, वो थी सचिन तेंदुलकर पर पूरी तरह से निर्भर होना।

सचिन का मैदान पर लंबे समय तक टिके रहना दर्शकों के अलावा दूसरे खिलाड़ियों में भी उत्साह का संचार करता था। कितने ही मैच मित्रों को याद होंगे जब सचिन के आउट होते ही पूरी टीम आयाराम गयाराम की तरह आउट होकर पैवेलियन लौट जाती थी। यहाँ तक कि जीतने जैसी स्थिति वाले मैचों में भी भारतीय टीम हथियार डाल देती और ताश के पत्तों की तरह बिखर जाती थी क्योंकि सचिन आउट हो चुके हैं।

फिर आया सौरव गांगुली का दौर, और ये सौरव गांगुली ही थे जिन्होंने भारतीय टीम को एकसूत्र में बांधा, हर खिलाड़ी को उसकी ज़िम्मेदारी का एहसास कराया, हर खिलाड़ी में जीत का जज़्बा पैदा किया और भारतीय टीम एक नई और खतरनाक टीम के रूप स्थापित कर दिया।

लगभग हारे हुए मैच भी भारतीय टीम जीतने लगी थी। सचिन के जल्दी आउट होने के बावजूद बाकी खिलाड़ी अपनी ज़िम्मेदारी बखूबी निभाते। 300 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए सबसे ज़्यादा मैच भारतीय टीम ने ही जीते हैं, कागज़ के शेर अब मैदानी शेर भी बन चुके थे।

सौरव गांगुली की इस परंपरा को महेंद्र सिंह धोनी ने भी आगे बढ़ाया, सौरव के आक्रामक तेवर के ठीक विपरीत शांत लेकिन बेहद चतुर धोनी अपनी कीपिंग, थर्ड अंपायर के फैसलों और फील्डिंग जमावट के लिए जाने जाते हैं। अनेक विश्व कीर्तिमान गांगुली और धोनी की अगुआई में भारतीय टीम ने स्थापित किये हैं।

इसी तरह भारतीय जनता पार्टी में भी अनेक बड़े नेता हुए, स्व. अटल बिहारी वाजपेयी, प्रमोद महाजन, कुशाभाऊ ठाकरे, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे अनेक नेताओं ने ‘कमल’ को सींचने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। लेकिन राजनीति के परिणाम बहुत ज़्यादा परिश्रम, धैर्य, निरंतर प्रयासों के बाद बहुत लंबे अंतराल के बाद दिखाई देते हैं।

आज़ादी के बाद से देश पर सबसे लंबे समय तक राज करने वाली और सत्ता के लिए साम, दाम, दंड, भेद की हर नीति को अपनाने वाली कांग्रेस ने अपने अलावा किसी भी सरकार को टिकने नहीं दिया। लेकिन जब नरेंद्र मोदी की अगुआई में 2014 में भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार अपने बूते पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई तो देश में एक नई राजनीति की शुरुआत हो गई।

जहाँ मोदी का लक्ष्य विकास और देश की सुरक्षा था वहीं कांग्रेस का लक्ष्य केवल सरकार को अस्थिर करने और दुबारा सत्ता में लौटने पर केंद्रित था। कांग्रेस को हर हाल में सत्ता चाहिए थी लेकिन मोदी के कार्य, उनकी वाकपटुता, भाषण शैली और अमित शाह की बारीक से बारीक रणनीति, ज़मीनी स्तर पर कार्य और चुनावी मैनेजमेंट ने 2014 के बाद 2019 में भी सत्ता से दूर कर दिया।

राहुल गांधी को अमेठी में हराना और पश्चिम बंगाल में 18 सीटें जीतना ये कोई अचानक नहीं हुआ था या कोई चमत्कार नहीं था, बल्कि सोची समझी रणनीति, ज़मीन पर कार्य और अनेक कार्यकर्ताओं के बलिदान के बाद हासिल हुआ है।

सचिन… सचिन… की ही तरह देश, विदेश में मोदी… मोदी… की गूँज भी सुनाई दे रही है लेकिन सचिन की ही तरह केवल मोदी पर निर्भरता से अब बचना होगा। पिछली बार की ही तरह इस बार भी अनेक नेता केवल इसीलिए जीतकर आए हैं क्योंकि मोदी ने भी अपने नाम पर वोट मांगे थे और देश की जनता ने दिल खोलकर दिये भी, वरना ऐसे कई नेता थे जो शायद ज़मानत भी नहीं बचा पाते लेकिन आज लाखों वोटों से जीतकर संसद में पहुँचे हैं।

मोदी शाह की निर्भरता से बचने के लिए खुद मोदी शाह को ही आगे आना होगा। 2019 से 2024 के इस कार्यकाल के दौरान विकास और अन्य गतिविधियों को आगे बढ़ाने के साथ साथ अपने उत्तराधिकारी भी तय करने होंगे, उन्हें तैयार करना होगा, उन पर ज़िम्मेदारी डालनी होगी। सिर्फ नाम नहीं पार्टी को मज़बूत बनाना होगा।

अमेठी से राहुल गांधी, गुना से ज्योतिरादित्य सिंधिया, कन्नौज से डिंपल यादव, बिहार से लालू यादव की पार्टी की हार ने बताया है कि जनता अब केवल काम चाहती है, वादों और नामों के दिन अब लद चुके, काम है तो नाम है वरना सब बेनाम हैं।

बाक़ी सांसदों को भी ये समझना होगा कि मोदी शाह हमेशा साथ नहीं होंगे, क्रिकेट की तरह ही राजनीति से भी सन्यास लेना ही पड़ता है। इसलिए स्वयं को स्थापित करना, प्रमाणित करना होगा। यही बात मोदी शाह को भी समझनी होगी।

एक इंटरव्यू में किसी पत्रकार ने सचिन से कहा था कि – आप तो क्रिकेट के भगवान हैं, आप क्रिकेट से भी बड़े हैं.. तब सचिन ने जवाब दिया था – “ये खेल सबसे बड़ा है और ये खेल है तो सचिन है, सचिन नहीं था तब भी ये क्रिकेट था और सचिन नहीं रहेगा तब भी क्रिकेट रहेगा”

पार्टी है तो मोदी और शाह हैं और नहीं होंगे तब भी पार्टी रहेगी, चुनाव हों या क्रिकेट मैच हो, जीतने के लिए हर बार रणनीति बदलनी पड़ती है। एक ही रणनीति हर बार कारगर नहीं होती।

अब ब्रांड मोदी की बजाय ब्रांड भाजपा पर काम करना होगा तभी लंबे समय तक सत्ता में रहा जा सकता है… और वास्तव में काम करना होगा वरना क्रिकेट हों या राजनीति अच्छे अच्छे धुरंधर जल्दी आउट हो जाते हैं और टीम गर्त में चली जाती है।

ताकि सनद रहे…

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