मर्दे मुजाहिद से दर्दे मुजाहिद तक

चुनाव के पहले इस बात को लिखना मेरी नज़र में योग्य नहीं था इसलिए नहीं लिखा।

जफ़र सरेशवाला को लेकर बहुतों ने बहुत टिप्पणियाँ की, मैंने भी एक बार चिंता जताई थी। लेकिन समय रहते योग्य कदम लिया गया।

गुजरात दंगों को ले कर लंदनवासी सरेशवाला तब बहुत उद्वेलित थे और मुख्यमंत्री मोदी पर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में मुकदमा करने का मन बना चुके थे।

उन दिनों नरेंद्र मोदी किसी सरकारी काम से लंदन आए हुए थे तो सरेशवाला के किसी मित्र ने कहा कि केस करने से पहले एक बार मिल तो लो। दस मिनट की मुलाक़ात लंबी हुई और बाद में मुलाक़ातों का सिलसिला बढ़ा।

दंगों के बाद गुजरात के मज़हबियों को जल्द ही मुख्य धारा में लाने में उनसे संवाद साधने में सरेशवाला की भूमिका रही। बड़ा NRI बिज़नेस मैन है, NRIs में भी उसकी पैठ काम आयी।

बाकी हमें यह भी समझना चाहिये कि बिज़नेस मैन काम से काम रखते हैं। उनको अपने काम की बात समझ में आयी, गुजरात और मोदी जी से सीधा जुड़ गए।

लेकिन सरेशवाला की उपयुक्तता खत्म नहीं हुई थी। प्रधानमंत्री होने पर खाड़ी देशों के साथ अच्छे संबंध बनाने में भी वह काम आया। उसके बाद वही बात, उन देशों को भी अपने काम से काम रहता है। लेकिन उसकी प्रारम्भिक भूमिका रही यह भी है।

लेकिन यह सब चीजें मुफ्त में नहीं होती, कीमत चुकानी पड़ती है। मोदी जी से निकटता को सरेशवाला किस तरह से भुना रहे थे, यह भी चर्चा में रहा।

एक चैनल को दिये इंटरव्यू में मोदी जी को ‘मर्दे मुजाहिद’ कहना, कुछ लोगों को लेकर जान बूझकर अपमानजनक बातें कहना और बाकी जो बातें सरेशवाला की तरफ से महज़ प्रस्तावित थी उनको इस तरह प्रचारित करना मानों हो ही गया है – काफी नुकसान हो रहा था जो फायदे से अधिक था।

फिर एक दिन सरेशवाला, अरफा खानम शेरवानी को दिये हुए इंटरव्यू में मोदी जी की आलोचना करते नज़र आये। बाद में छिटपुट यहाँ वहाँ। फिर अपने काम में लग गए होंगे। अगर मोदी जी न जीतते तो जरूर कहीं लंबा इंटरव्यू देते।

सरेशवाला को लेकर सब से अधिक मोदी समर्थक ही बिफरे थे। और कोई भी ज़रा सी उंगली छुआ देता तो और भड़क उठते। केजरीवाल भी न मांगे इतने सबूत तो समर्थक ही मांगते थे। सीता को अग्निदिव्य करना पड़ा ही होगा इस बात का मैं विश्वास करता हूँ।

लेख समाप्त। मेरे पास इसपर अधिक कुछ लिखने जैसा नहीं, शायद बाद में कोई बड़ा insider इसपर किताब भी लिखे।

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