मोदी और आध्यात्मिक गड़बड़

ये लेख सामान्य जन की समझ और गरीब गुरबे विचार वालों के लिए है जिन्हें हर बात में परमात्मा का चमत्कार ढूंढने का प्रयत्न भी रहता है और उत्सुकता भी रहती है।

उसी दृष्टि से आगे बढ़ने की चेष्टा रहेगी। मेरा अपना एक तरीका रहता है, सो उसी हिसाब से चलूंगा।

नरेंद्र मोदी शून्य से ही निकल कर, मतलब, उन्हें कोई जानता नहीं था, गुजरात राजनीति में आते हैं, अपना प्रभावी काम करते हैं (अच्छा या बुरा नहीं लिखा, जानबूझकर), आगे आगे बढ़ते जाते हैं, दो बार पीएम बन जाते हैं। जनता पसन्द करती है, विजयी बनाती है, विपक्ष ध्वस्त होता है।

ये सब कहानी सबको पता है। सामने घट रही है। और चमत्कार रूप से इसलिए कहा जा सकता है कि विगत तीन दशकों से जो वैक्यूम बना था राजनीतिक परिदृश्य में, उसकी पूर्ति हो गयी।

अब गरीब गुरबे विचार इस तरह से आने लगते हैं – महामानव है, देवदूत है, इसकी कृपा है, उसकी कृपा है… मस्त मामला। मुझे खतरा या बुरा तो नहीं लगता, पर भोलेपन में भी अन्य बातें रह जाती हैं। बिल्कुल कृपा वगैरह सब है।

पर ये सब बातें पहले कोई क्यों नहीं ‘सोच’ पाता था, जब मोदी जी गुमनामी के संसार में थे? जिसका सिक्का चलने लगता है, उसी समय ये सब बातें याद आती हैं। पहले क्यों नहीं रहती ?

कृपा ऐसे ही प्राप्त नहीं होती, उसे मेंटेन करना होता है। दुर्भाग्य से हममें से अधिकांश, नेतृत्व वाले किसी भी फील्ड के लोगों से नहीं जुड़े हैं, या जो जुड़े हैं वो केवल अभिभूत होकर प्रभाव को देखते हैं। प्रभाव होता है। ये व्यक्तिगत कला किसी किसी में प्रकट होती है जो समाज के उच्च पद या अति प्रभाव वाले स्थान को दिलाने में सक्षम होती है।

ये कला सबमें होती है, पर व्यक्तिगत लक्ष्य के साथ एकाकार होने पर ही अधिक से अधिक मात्रा में प्रकट होती है। जैसे सब जानते हैं, मन से काम करने पर उसी कार्य की सिद्धि सबमें होती है। और सबमें नहीं भी होती है, क्योंकि मन उसमें एकाकार नहीं होता।

वो सुना होगा, कार्य के बारे में सोचने वाले को सफलता इसलिए नहीं मिलती कि करने वाला सोचता है कि कैसे करेंगे, दिक्कत बहुत है। ऐसा हो जाएगा वैसा हो जाएगा। जिसने इसे पार कर लिया, वो निश्चिंत होकर काम शुरू कर देता है, पचास परसेंट वैसे भी काम हो गया, ऐसा समझना चाहिए।

उसके बाद भी कई कार्य को छोड़ देते हैं, समस्याएं आने पर, धैर्यवान लगा रहता है सुलझाने पर, तो, अधिकांश छोड़ देते हैं, कुछेक और मनोयोग से लगे रहते हैं। सत्तर परसेंट अचीव हो जाता है।

उसके बाद सफलता मिलने लगती है, तो उसे क्रिएटिविटी के साथ आगे कोई कोई बढ़ा देता है, नब्बे परसेंट अचीव। उसके बाद बचे दस परसेंट भोग का कार्य होता है। ऐसा समझ सकते हैं। कोई बिरला ही निकलता है।

यही कारण है कि सभी सफल आईएएस, आईपीएस, सफल बिजनेसमैन, सफल नेता, या कोई अन्य फील्ड ही, ये सफल शब्द के साथ वाला तमगा हासिल नहीं कर पाते। बस नाम रहता है कि अमुक अमुक हैं, बस हैं।

इनका प्रभाव भी, यथा पद, यथा धन, यथा शक्ति के अनुरूप होता है। ये छीन लिया जाए तो इनका कोई प्रभाव नहीं रहता। कई कई सफल हो चुके लोगों के दुर्योग आते हैं, तब यही कहानी देखने सुनने को मिलती है। बॉलीवुड हॉलीवुड एक्टर एक्ट्रेस के कई किस्से इसी कारण यूट्यूब आदि में मौजूद हैं।

मोदी इनसे अलग हैं। सभी हो सकते हैं, पर सभी का वो लक्ष्य नहीं, वो चेतना नहीं, एकनिष्ठ स्वभाव नहीं, सबसे बड़ी बात, कार्य को निश्चित मानकर पूर्ण करने की वो शक्ति नहीं। अरन्तु परंतु बिजली के प्रवाह के रेसिस्टेन्स जैसे हैं… रोक देते हैं।

नेता तो कई हैं, जो प्रभावी भी हैं, पर मोदी इनसे अलग कैसे निकला? और अध्यात्म की जो कृपा आदि लोग मानने लगते हैं, वो अलग (सही या गलत नहीं!) कैसे है?

अन्य नेता एक स्थापित राजनीति के माहौल से पैदा हुए हैं, उनकी जोड़तोड़ भी वैसे ही रहती है। जितने उनके लोग होंगे, उतना वो प्रभाव कायम रख सकने में सफल होंगे।

अब आ गया मोदी, ये उस हिप्पोक्रेसी से नहीं चला। उसे अलग चलना था। लोग जिसे चमत्कार रूप जान रहे हैं, असल में काफी नॉर्मल बात है, जो होनी चाहिए थी, पर सामने थी ही नहीं! बस इतनी सी बात है। एक रूटीन आदत को चीरकर मोदी अपने सहयोगियों के साथ सामने आ गए।

यही अनुमान लगाइए कि मोदी जी प्रेस कॉन्फ्रेंस भी जनता और अन्य को धन्यवाद ज्ञापन करने को करते हैं। जनता चुनाव लड़ रही है। इतनी निश्चिंतता से आजतक किसी अन्य नेता ने नहीं कहा होगा।

ये श्योरिटी कहाँ से आती है? निश्चित रूप से – चरित्र से। एकनिष्ठ चरित्र, समय पर अपना काम कर देना, रातदिन लगे रहना।

और ऐसे कई व्यक्तित्व को जानता हूँ पर्सनल तौर पर, मानकर चलिये, दिन प्रतिदिन इनकी आंतरिक ऊर्जा कई सौ गुना बढ़ती जाती है। ये अपने मार्ग के इतने पक्के होते हैं कि नींद से कोई उठाकर भी इनसे कोई बात डिस्कस कर ले, वो और उत्साह से अपने काम के बारे में, आगे की दृष्टि के बारे में बाते करने लगेंगे। ये समर्पण का उत्कर्ष होता है। मोदी जी से तो नहीं मिला, पर उसी चरित्र के कई लोगो को जानता हूँ।

और मेरा अनुमान है, जितना लिखा है, मोदी जी उससे कहीं ज्यादा हैं।

दैविक कृपा है या नहीं, ये पाठकों पर छोड़ते हैं, आकर्षक तो लगता ही है कि महादेव की कृपा है, हनुमान जी का कृपा है, भवानी माई का कृपा है। और है भी। क्यों न हो?

जब समर्पित मन से कार्य किया जाए, कोई नाटक चेटक न हो, वो बात व्यक्तिगत आदत के साथ एकाकार होकर स्वभाव ही बन जाये, ऐसे सभी के साथ कृपा सतत साथ चलती है। जैसे जैसे समय बीतता है वैसे वैसे ये अधिक से अधिक बढ़ती है। ये पर्सनेलिटी डेवलपमेंट का नियति का अपना प्रोग्राम है।

ये लेख क्यों लिखा, निश्चित रूप से ऊपर प्रवचन करने को नहीं लिखा। इसलिए लिखा कि सामान्य जन जिसे चमत्कार रूप मानते हैं, बहुत सारी कृपा मानते हैं, वो समझें कि ऐसे सभी सफल जन के पीछे वास्तविक स्थिति क्या है, उनके काम करने, और सोचने के तरीके क्या हैं, काम और सोच के पीछे निष्ठा समर्पण कितना है।

और मुझे लगता है अज्ञात से ज्ञात, वो भी भारतीय राजनीति में, लोगों के सामने मोदी के उदाहरण से बढ़िया उदाहरण और कोई नहीं होगा। अलग अलग व्यक्तित्व की अलग अलग फील्ड में, अलग अलग सफलता की रेंज होती है। मोदी एक्सट्रीम सफलता हासिल किए व्यक्ति हैं।

(व्यक्तिगत तौर पर इतना लिख सकता हूँ कि ‘संकल्पशक्ति की नियति’ की, अतिरिक्त सहायता अवश्य ही मोदी के साथ है। इस बात को जानता हूँ। उसके प्रमाण मुझे तो पर्सनल तौर पर मिलते रहे हैं, हुआ वही है। लक्ष्य जनकल्याण होता है, कभी कभी पर्दे के पीछे से भी होता है।)

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