ग़ाज़ीपुर का संदेश

भाजपा की इस शानदार जीत में अगर एक कसक रह गयी तो वो है, ग़ाज़ीपुर से केंद्रीय मंत्री और भाजपा प्रत्याशी मनोज सिन्हा की हार।

हम पूर्वांचल वालों के लिए और विशेष तौर से जो मनोज जी को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं, ये और भी कष्टकारी और असह्य है। ऐसा लग रहा है मानो कोई गमी हो गई हो।

मनोज जी का चुनाव दो विपरीत ध्रुवों में से एक था, देवासुर संग्राम की तरह। एक तरफ मनोज जी, हाई स्कूल और इंटरमीडिएट UP बोर्ड के टॉपर, IIT के एन्जीनियर, बेहद ईमानदार और कर्मठ, ज़मीन से जुड़े बेहद विनम्र नेता। उनके मुकाबले में हत्या और अनेक अपराधों मे संलग्न माफिया।

और फिर पिछले 5 सालों मे मनोज जी द्वारा किया गया विकास कार्य। यद्यपि सबको पता था कि जाति और धर्म के समीकरण मनोज जी के खिलाफ हैं, लेकिन मन में कहीं विश्वास था कि जनता इनसे ऊपर उठेगी और मनोज जी को ही चुनेगी क्योंकि एक सज्जन और अपराधी में चयन कोई मुश्किल नहीं होगा।

जब नतीजा आया तो लोग स्तब्ध रह गए। लोग ग़ाज़ीपुर की जनता को दोष दे रहे हैं लेकिन वो ठीक नहीं। दरअसल ग़ाज़ीपुर की सामान्य जनता ने तो मनोज जी को भरपूर वोट दिया और 2014 से ज्यादा दिया।

मनोज जी को वोट करीब 1.5 लाख ज्यादा मिले और वोट शेयर भी बढ़ा। लेकिन सांप्रदायिक और जातिवादी राजनीति करने वालों, यानि सपा और बसपा के वोटर ने नहीं दिया…

ग़ाज़ीपुर में मुस्लिम, यादव और मायावती की समर्थक कुछ दलित-जातियों (दलितों की सब जातियां नहीं) की संख्या 50% से अधिक होती थी। इन लोगों ने साम्प्रदायिकता और जातिवाद के चलते मनोज जी को वोट नहीं दिया और बाकि सबके वोट देने के बाद भी मनोज जी हार गए।

ग़ाज़ीपुर के नतीजे से ये साफ़ है कि भाजपा की शानदार जीत के बावजूद, मुस्लिम कम्युनल और सपा, बसपा की जातिवादी राजनीति बरकरार है। ये बात और है कि आम जनता ने इन दोनों का पूर्ण बहिष्कार कर रखा है इसलिए जहाँ इनका वोट बैंक, यानि मुस्लिम, यादव और दलितों की कुछ विशेष जातियां, 50% या 40%से कम है, वहां तो ये हार गए लेकिन ग़ाज़ीपुर जैसी जगह जहाँ ये मिलकर 50% से भी ज्यादा है, ये जीत गए।

मुस्लिम का अफज़ाल अंसारी को वोट देना समझ में आता है लेकिन दलित और यादवों का? वो तो इनकी जाति का नहीं है। ये जातिवाद की पराकाष्ठा है। ये सामान्य जातिवाद नहीं है, जहाँ व्यक्ति अपनी जाति के व्यक्ति को वोट देता है। ये एक क्रिमिनल जातिवाद है जहाँ कुछ जातियां मिल कर सत्ता पर कब्ज़ा करती हैं और फिर सिर्फ अपनी जाति के हित में सत्ता का दुरुपयोग।

मुस्लिम-यादव, मुस्लिम–दलित समीकरण इसी राजनीति का विद्रूप चेहरा है। कभी कभी इसमें किसी अन्य जाति का भी सहारा लिया जाता है जैसे 2007 में मायावती ने ब्राह्मणों और बिहार में लालू ने राजपूतों को लेकर किया था. तब लालू ने नारा दिया था MY(यानि मुस्लिम–यादव)।

MY को मिल गए राजपूत, MY बन गया MYR, मिल कर लेंगे सारा बिहार। इस गन्दी राजनीति का मकसद सिर्फ सत्ता प्राप्त करना और फिर भ्रष्टाचार करना और सत्ता का दुरुपयोग करना है। समाज में जातिगत विद्वेष फैलाना इनका मुख्य काम है।

मायावती का ‘तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार’ और लालू का ‘भूरा बाल साफ करो’ इसी सोची समझी नीति का हिस्सा था। ज़ाहिर है इन नेताओं का विकास से कोई लेना देना नहीं क्योंकि इनका वोटर विकास के नाम पर नहीं, जाति के नाम पर वोट देता है।

मुस्लिम-यादव गठबंधन के आधार पर लालू ने 15 साल बिहार में राज्य किया और पूरे बिहार को बर्बाद किया। उत्तरप्रदेश में सपा ने मुस्लिम–यादव, और बसपा ने मुस्लिम-दलित के समीकरण पर बारी–बारी 15 साल राज किया।

इनका ऐसा राज चलता रहता अगर मोदीजी ना आते। दरअसल त्रिकोणीय या चौतरफे मुकाबले में 25-30% वोट पाने वाला जीत जाता था और सपा, बसपा और लालू ने कभी 30% के ऊपर वोट नहीं पाए, कम ही पाए। लेकिन अब मुकाबला दो पार्टी के बीच में है जहाँ 30% वोट पर 5% सीट भी नहीं मिलती। यही कारण है कि बिहार में लालू की RJD ज़ीरो सीट पा सकी और UP में सपा, बसपा को महागठबंधन करना पड़ा।

किन्तु इस चुनाव में प्रदेश की जनता ने इन्हें सबक सिखाया। इनके वोट बैंक के सिवा किसी ने इन्हें वोट दिया ही नहीं और ये गठबंधन सिर्फ 16 सीट पा सका। वो भी उन सीटों पर जहाँ इनका वोट बैंक 50% से ज्यादा है जैसे ग़ाज़ीपुर।

बिहार में लालू की मुस्लिम–यादव राजनीति मर चुकी है किन्तु UP में ये सपा–बसपा की मुस्लिम-यादव–दलित की ज़हरीली राजनीति अभी ज़िंदा है। यही ग़ाज़ीपुर का संदेश है।

इस ज़हरीली राजनीति का दोमुंहा सांप सिर्फ घायल हुआ है मरा नहीं। इस सांप को अगले विधान सभा चुनाव में पूरी तरह कुचलना होगा। अगर प्रदेश को बचाना है तो हमें ये करना ही होगा। ये हमारा कर्तव्य है।

आइये आज ही संकल्प लें कि इस मुस्लिम–यादव–दलित राजनीति करने वालों को हम एक भी वोट नहीं देंगे। इनको राजनीतिक रूप से अछूत बना देंगे। मेरा यादव और दलित भाइयो से भी अनुरोध है कि इस गन्दी मानसिकता से बाहर निकलें। प्रगति का रास्ता विकास का रास्ता है, मनोज जी और मोदी जी का रास्ता है। इस पर चलिए, नहीं तो आप भी बिहार की तरह राजनीतिक मुख्य धारा से बिलकुल कट जायेंगे। अपना भी नुकसान करेंगे और प्रदेश का भी।

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