बताया ही जाना चाहिए, भारत के भाग्य विधाता बने व्यक्ति का सच

साध्वी प्रज्ञा भारती भोपाल से 8 लाख 66 हज़ार 482 मत पा कर विजयी हुईं। उन का नथुराम गोडसे को देशभक्त बताने वाला बयान आलोचना के घेरे में रहा है। मीडिया के स्वयंभू पितामहों, काँग्रेसियों, वामपंथियों ने ख़ूब कालबेलिया नृत्य किया।

दबाव में भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व भी आ गया। नरेंद्र भाई पुराने प्रचारक हैं। वो भी उसी प्रक्रिया से तैयार हुए हैं जिससे हम सब हुए तो उन्होंने साध्वी प्रज्ञा के बयान पर आपत्ति क्यों जताई होगी? वे साध्वी के विरोधी होते तो उनको टिकिट तो पक्का नहीं मिल सकता था। उनकी वर्षों बाद ज़मानत ही नहीं हो सकती थी।

साध्वी को पड़े वोट बता रहे हैं कि समाज इन के हिसाब से नहीं सोचता। इसकी छानफटक करनी चाहिये कि समाज और हाहाकार मचा रहे लोगों में इतनी वैचारिक दूरी क्यों है?

इसका कारण भारत के तथाकथित व्हाइट कॉलर लोगों की सैट की हुई विचारप्रणाली या नैरेटिव है। यह नैरेटिव इतना प्रभावी है कि भाजपा के सर्वप्रिय वक्ता स्व. अटल बिहारी वाजपेयी भी प्लासी के युद्ध को देश के भविष्य का युद्ध बता गए।

कृपया यू ट्यूब पर ‘अटल बिहारी बाजपेयी ऑन प्लासी’ सुनिये। राष्ट्रवादी वक्ताओं में से सबसे प्रिय तक यह ध्यान नहीं कर पाये कि प्लासी की लड़ाई में एक ओर रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना थी तो दूसरी ओर घोर धर्मविरोधी इस्लामी नवाब सिराज़ुद्दौला की सेना थी। तथ्य यह है कि नया डकैत पुराने डकैत से लड़ रहा था। राष्ट्र का मूल स्वर इसमें कहीं था ही नहीं।

23 जून 1757 प्लासी की लड़ाई हारने के बाद लगभग 200 वर्ष बाद कोलकाता में सार्वजनिक रूप से दुर्गा पूजा हो पायी थी। नवाब के दैत्य हमें पूजा नहीं करने देते थे। मंदिर तोड़ दिए गए थे। चैतन्य महाप्रभु को कोड़ों से पीटने के विवरण उपलब्ध हैं। फिर भी स्व. अटल जी के प्लासी की लड़ाई के ग़लत निरूपण का दोष उन पर नहीं रखा जा सकता चूँकि भारत में यही इतिहास पढ़ाया जाता है।

1857 के दिल्ली में चले इस्लामी जिहाद को भारत का स्वतंत्रता संग्राम पढ़ाया जाता है। कारतूसों को चिकना बनाने में इस्तेमाल की जाने वाली ब्रिटिश क़त्लख़ानों प्राप्त गौ की चर्बी में सूअर की अनुपलब्ध झूठी चर्बी घुसेड़ी जाती है। ख़ैर यह चर्चा किसी और समय अभी बस इतना ही कि राष्ट्र के मूल स्वर के विपरीत ऐसा मिथ्या नैरेटिव कैसे सैट हुआ?

19 जुलाई 1905 को वाइसराय कर्जन द्वारा बंगाल विभाजन की घोषणा की गयी। बंगाल को दो भागों में बाँट दिये जाने का निर्णय एक अलग मुस्लिम बहुल प्रान्त बनाने के उद्देश्य से किया गया था। इसके विरोध में 1908 ई. में सम्पूर्ण देश में ‘बंग-भंग’ आन्दोलन शुरू हो गया। जनता के प्रचंड दबाव में 1911 में अंततः बंगाल का विभाजन रद्द किया गया। तब काँग्रेस का नेतृत्व लोकमान्य तिलक और उनके साथी कर रहे थे। जो गर्मदल कहलाते थे।

बंग भंग रद्द होने के 4 वर्ष बाद 1915 में गाँधी भारत लौटे। 1920 में तिलक जी का स्वर्गवास हो गया। काँग्रेस में उनके बाद कोई उतना प्रभावी नेता नहीं था। इस शून्य को गाँधी ने लपक लिया। गाँधी के 1915 में भारत में आने से केवल चार वर्ष पूर्व हिंदू, अंग्रेज़ों और इस्लामियों को पराजित कर विजयी हुए थे। फिर केवल 32 वर्ष में ऐसा क्या हो गया कि हिन्दू पौरुष नष्ट हो गया।

जिस विभाजित पूर्वी बंगाल में एक करोड़ अस्सी लाख मुस्लिम और एक करोड़ बीस लाख हिन्दू थे, वहाँ इस्लामियों से कम संख्या में होते हुए भी जो हिंदू विजयी हुए वही हिन्दू केवल 32 वर्ष बाद 1947 में इस्लाम के हाथों भारत माता के हाथ कटते देखते रहे। 1947 में इसी पूर्वी बंगाल से करोड़ों हिन्दुओं ने अपना सब कुछ छिनवा कर, बर्बाद हो कर, धर्म बचाने के लिये खंडित भारत में शरण ली। लाखों स्त्रियों पर भीषण बलात्कार हुए, लाखों मारे गए। यह पौरुष नष्ट कैसे हो गया?

बंधुओं! इसका कारण गाँधी और गाँधी की मृत्यु के बाद काँग्रेस द्वारा फैलाया गया गाँधीवाद है। बहुत से बंधु जानते हैं कि यह सत्य है मगर केवल कह देने से तो सिद्ध नहीं होगा। प्रमाण तो देने होंगे। क्या आप चाहेंगे कि गाँधी साहित्य, उनके समकालीन लोगों की पुस्तकों के आधार पर ‘गाँधी और गाँधीवाद यानी अहिंसा और उनकी असफल राजनीति’ पर संक्षिप्त लेखों की एक सीरीज़ लिखी जाये?

यह इस लिये भी आवश्यक है कि 2014 और 2019 की विजय ने काँग्रेस से मुक्ति दिलाई है मगर राष्ट्र में जनमत बनाने वाले संस्थानों का नैरेटिव अभी भी असत्य के पक्ष में है। इस्लमियों के हाथों देश के टुकड़े करवा चुके पापियों की करतूतें आज तक छिपी हुई हैं।

समाज मोहन दास को बैन किंग्सले की फ़िल्म ‘गाँधी’ के हवाले से, ‘दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल’ जैसे फ़िल्मी गानों के माध्यम से जानता है। काँग्रेसी सरकारों के काल में दूरदर्शन ने इस हेतु गाँधी पर बहुत सी झूठी फ़िल्में बनायीं थीं। बदलाव आना शुरू हो चुका है मगर यह बदलाव भावनात्मक अधिक, तथ्यात्मक कम है।

नई पीढ़ी के पास न तो गाँधी साहित्य पढ़ने का समय है न रुचि, मगर जब तक नैरेटिव नहीं बदलेगा राष्ट्र अपने मूल स्वरूप को प्राप्त नहीं कर पायेगा। परम वैभव का पथ तभी आलोकित होगा। भगवती भारत माता तभी विश्व गुरू बनेगी। विश्व में हमारा भाल तभी चमचमायेगा।

आपके उत्तर की प्रतीक्षा में,
तुफ़ैल चतुर्वेदी

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यवहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति मेकिंग इंडिया (makingindiaonline.in) उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार मेकिंग इंडिया के नहीं हैं, तथा मेकिंग इंडिया उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY