प्रधानमंत्री मोदी ने बदल दी जातिवाद की परिभाषा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीजेपी मुख्यालय में अपने संबोधन में कहा कि “अब देश में सिर्फ दो जातियां बचेगी और देश सिर्फ इन दो जातियों पर केंद्रित होने वाला है। ये दो जातियां हैं – गरीब और दूसरी जाति है देश को गरीबी से मुक्त कराने के लिए कुछ न कुछ योगदान देने वालों की। इन दोनों जातियों को सशक्त करना है ताकि देश से गरीबी का कलंक मिट सके।”

यह एक महत्वपूर्ण वक्तव्य है।

ध्यान दीजिये। प्रधानमंत्री ने गरीब और अमीर, या निर्धन और धनी नहीं कहा. बल्कि उन्होंने धनाढ्य वर्ग को देश को गरीबी से मुक्त कराने वाली “जाति” के रूप में परिभाषित कर दिया।

इस वर्गीकरण के दूरगामी परिणाम होंगे। क्योंकि, एक तरह से प्रधानमंत्री मोदी ने जाति का आधार आर्थिक बना दिया है, न कि किसी वर्ण-विशेष में जन्म को।

अब, सभी निर्धन लोग एक ही जाति के है, क्योंकि समाज में उनकी समस्याएं और चुनौतियां एक समान हैं; आगे बढ़ने के अवसर में बाधाएँ; सरकारी सेवाओं से वंचित रखना; असुरक्षा की भावना; और शोषण इत्यादि से हर निर्धन व्यक्ति को जूझना होता है, चाहे वह किसी भी वर्ण से हो।

विभिन्न राजनीतिक दलों ने इस मूलभूत समस्या को इग्नोर करके विभिन्न वर्णो का गरीबी हटाने के नाम पर शोषण किया, उनका वोट बटोरा।

साथ ही इन राजनीतिक दलों ने धनाढ्य वर्ग के लोगों को गरीबी का जिम्मेवार ठहराया। इस एक चाल से उन्होंने अपनी अकर्मण्यता, चोरी, भ्रष्टाचार और परिवारवाद से ध्यान हटाकर सभी उद्यमियों को अन्य लोगों की निर्धनता का दोषी ठहरा दिया। भारत में अमीर होना एक कलंक हो गया था।

मज़े की बात यह है कि ये नेता इन्ही उद्यमियों को लाइसेंस-परमिट राज (जब बिना घूस के बिज़नेस के लिए लाइसेंस नहीं मिलता था) के नाम पर कण्ट्रोल करते थे और अपनी जेबें गरम।

उदाहरण के लिए, सोनिया परिवार, मुलायम परिवार, लालू परिवार, पवार परिवार, मायावती कुनबा इत्यादि की समृद्धि ले लीजिये। एक ही पीढ़ी में ये सभी खरबपति बन गए।

लेकिन यह भी एक तथ्य है कि बिना उद्यम और उद्यमियों के गरीबी नहीं मिटायी जा सकती। सरकार सभी लोगों को सरकारी नौकरी नहीं दे सकती; न ही खाना खिला सकती है, न ही इलाज कर सकती है। किसी भी संपन्न राष्ट्र में निजी क्षेत्र सरकार से अधिक रोजगार के अवसर प्रदान करता है; उस रोजगार से लोगों को भोजन और इलाज मिलता है।

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि एक सशक्त निजी क्षेत्र और उद्यम के बिना भारत से गरीबी नहीं मिटाई जा सकती। हम गरीबी तभी मिटा सकते हैं जब भारत में समृद्धि बढ़ा सकें और उस समृद्धि को हर व्यक्ति के साथ शेयर कर सकें।

प्रधानमंत्री मोदी के पहले के राजनेता गरीबी ही बढ़ाते थे और उसी को शेयर करते थे। समृद्धि वे अपने परिवार, मित्रों और चुने हुए उद्यमियों के लिए रखते थे।

लेकिन यह भी आवश्यक है कि यह निजी क्षेत्र एक पारदर्शी व्यवस्था में कार्य करे। सरकार को घूस देकर लाइसेंस न ले। तथा, निर्धन से निर्धन व्यक्ति को भी बैंकों से लोन तथा तकनीकी सहायता के आधार पर उद्यम लगाने का अवसर मिले।

लेकिन ऐसा निजी क्षेत्र केवल पारदर्शिता के आधार पर नहीं विकसित हो सकता। अगर हम निजी उद्यम को संदेह की निगाह से देखेंगे तथा धनाढ्य वर्ग और धन बनाने को कलंक मानेंगे, तो कभी भी भारत में उद्यम नहीं पनप सकता।

ऐसी परिभाषा समय की भी मांग थी क्योंकि अमेरिका, चीन, जापान और जर्मनी के बाद अब भारत विश्व में पांचवा सबसे धनी देश हो गया है।

आर्थिक आधार पर आरक्षण मिलने की सीमा आठ लाख रुपये प्रति वर्ष है। क्रीमी लेयर की परिभाषा भी लाखों रुपए प्रतिवर्ष है। भारत में बहुत तेजी से समृद्धि बढ़ रही है। क्या उन समृद्ध लोगों को एक कलंक के रूप में लेना चाहिए? गरीब से गरीब व्यक्ति भी समृद्ध होना चाहता है और प्रधानमंत्री ने एक तरह से हर गरीब की ऐसी आकांक्षांओं को सम्बोधित किया है।

अतः प्रधानमंत्री मोदी को यह क्रेडिट जाता है कि अब देश को गरीबी से मुक्त कराने वालों को – दूसरे शब्दों में, उद्यमियों को – भी उन्होंने एक जाति के रूप में प्रस्तुत किया है। पहली बार उद्यमियों से, परिश्रम करके धन कमाने वालो से कलंक मिट जाएगा।

और इसके साथ ही जातिवाद के आधार पर अपनी दूकान सजाये राजनीतिक दलों और बुद्धिपिशाचों का अस्तित्व भी समाप्त हो जाएगा।

भारत को अब एक समृद्ध राष्ट्र की श्रेणी में खड़े होने से कोई नहीं रोक सकता।

क्योंकि भारत में अब उद्यम करने वालों की “जाति” को बढ़ावा मिलेगा।

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